नीचा नगर
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
समाज के ‘भगवानों’ का असली चेहरा
फिल्म ‘नीचा नगर’ की कहानी ये है कि गरीबों के एक इलाके में आने वाली साफ पानी की पाइप लाइन को वहां का एक दबंग बंद कर देता है। बस्ती में पानी को लेकर हाहाकार है। गंदा पानी पीने से लोग मर रहे हैं, बीमार हो रहे हैं। तो यही शख्स इन मरीजों के लिए एक चैरिटी अस्पताल खोल देता है और लोगों के लिए भगवान बन जाता है। इंसान की बेसिक जरूरतों पर कब्जा करके फिर उसमें फंसे लोगों को हल्की सी मदद करके भगवान बनने का ये सिलसिला पुराना है। ये किस्सा परदे तक कैसे पहुंचा और कैसे उस वक्त अंग्रेजों की नजर से बचकर फ्रांस तक जा पहुंचा, ये कहानी तो दिलचस्प रही। लेकिन, इसकी कहानी का दुखद पहलू ये रहा है कि ये फिल्म तब हिंदुस्तान में रिलीज ही नहीं हो सकी थी। 29 सितंबर 1946 को इसे कान फिल्म महोत्सव में जो पहली बार दिखाया गया, उसे ही इसकी रिलीज डेट माना गया और गूगल ने जोहरा सहगल का जो डूडल मंगलवार को बनाया है, उसके मायने तमाम हैं। इसे बनाने वाले भारत को ‘नीचा नगर’ याद दिलाना चाहता है, लेकिन अधिकतर लोगों को जोहरा सहगल से आगे कुछ खास दिखा नहीं। गोर्की और उनके समकालीन दूसरे रूसी साहित्यकारों को पढ़ने वालों से बातें करने पर पता चलता है कि उस दौर में जहां दूसरे साहित्यकारों का नजरिया थोड़ा निराशावादी था और उन्हें भविष्य अंधकारमय दिखता था, गोर्की ने हर बार अपने लेखन में उम्मीद की लौ जलाए रखी। उनके बेघर किरदारों को भी लगता था कि वो सुबह बस आने ही वाली है। देश में प्रोग्रेसिव राइटर्स की जो एसोसिएशन बनी उस पर गोर्की का गहरा असर रहा है।