मधुबाला
इम्तियाज अली के नाटक से निकला किस्सा
फिल्म मुगल- ए -आजम एक काल्पनिक कथा पर आधारित फिल्म बताई जाती है। इसका जिक्र इतिहास की किताबों में कम और किस्सों की किताबों में ज्यादा मिलता है। पहले पहल इस कहानी का जिक्र मिलता है इम्तियाज अली ताज के नाटक में। ये नाटक साल 1922 में लिखा गया। सलीम और अनारकली की इस कहानी पर अर्देशिर ईरानी ने 1928 में अनारकली नाम से फिल्म बना दी। तब तक सिनेमा बोलता नहीं था। परदे पर आवाज आई तो ईरानी ने सात साल बाद इस पर फिर से फिल्म बना डाली।
अनारकली का रोल मिला नरगिस को
अनारकली की इस कहानी ने निर्माता शिराज अली हकीम पर इतना असर किया कि उन्होंने इसके लिए के आसिफ को साथ लिया और इस पर नए सिरे से फिल्म नबाने का फैसला किया। इस फिल्म का नाम रखा गया, मुगल -ए -आजम और इसी के लिए पहली बार चार मशहूर राइटर एक साथ आए। इनमें शामिल थे, जीनत अमान के पिता अमान, वजाहज मिर्जा, कमाल अमरोही और एहसान रिजवी। हिंदी पट्टी की बोलियों, गीतों, भजनों, लोकगीतों और मुहावरों से इन लोगों ने सलीम और अनारकली की प्रेम कहानी को सजाया और के आसिफ ने तब तक अकबर के रोल के लिए अभिनेता चंद्र मोहन, सलीम के रोल के लिए डी के सप्रू और अनारकली के रोल के लिए नरगिस को तैयार कर लिया। फिल्म मुगल ए आजम की पहली शूटिंग बॉम्बे टॉकीज स्टूडियो में 1946 में यानी आजादी के कुछ ही महीनों पहले शुरू हुई।