हिंदी सिनेमा में तमाम कालजयी फिल्में बनाने वाले निर्देशक ऐसे भी रहे हैं, जो मूल रूप से तो तमिल, तेलुगू, मलयालम या दूसरी दक्षिण भारतीय भाषाओं में फिल्में बनाते रहे और वहां बड़ा नाम भी कमाया और हिंदी सिनेमा के सागर से भी नायाब मोती चुनने में कामयाब रहे। अभी लॉकडाउन के दौरान हिंदी सिनेमा के पहले ही मैन धर्मेंद्र पर फिल्माया गया एक गाना खूब वायरल हुआ, ‘दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ...!’ ये गाना है 2 नवंबर 1973 को रिलीज हुई फिल्म ‘ज्वार भाटा’ का और यही हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म भी है।
फिल्म- ज्वार भाटा
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
सुनील दत्त को भाए सुब्बा राव
फिल्म के निर्देशक ए सुब्बा राव ने तेलुगू, तमिल और हिंदी सिनेमा में बड़ा नाम कमाया है। हिंदी सिनेमा में उनकी एंट्री हुई थी सुनील दत्त और नूतन की सुपर डुपर हिट फिल्म ‘मिलन’ से जो उनकी अपनी ही निर्देशित तेलुगू फिल्म ‘मूगा मानासुलू’ की रीमेक थी। इस फिल्म से सुनील दत्त इतना अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने भाई सोम दत्त को हीरो बनाने का काम भी ए सुब्बा राव को ही सौंप दिया। सोम दत्त की डेब्यू फिल्म थी, ‘मन का मीत’। इसी फिल्म से बतौर खलनायक विनोद खन्ना ने भी हिंदी सिनेमा में अपनी अभिनय यात्रा शुरू की थी।
फिल्म- ज्वार भाटा
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जब अमीरी गुनाह थी..
आज के बाइस्कोप की फिल्म ‘ज्वार भाटा’ हिंदी सिनेमा के उस दृश्य पटल की फिल्म है जिसमें अमीर होना गुनाह माना जाता था और गरीब होने भर से इंसान को सारे गुणों से परिपूर्ण मान लिया जाता था। अमीरों को एक खास तौर के विलेन के तौर पर दिखाने का हिंदी सिनेमा का ये खांचा फिल्म ‘ज्वार भाटा’ में पूरे उफान पर है। वैसे, आगे बढ़ने से पहले ये बता देना भी यहां ठीक रहेगा कि समुद्र में उठने वाली ऊंची लहरों को ज्वार और वापस लौटने वाली लहरों को भाटा कहते हैं, जिसे इन दिनों मुंबई के अधिकतर लोग हाई टाइड और लो टाइड के नाम से पुकारते हैं। तो जीवन के ज्वार और भाटे को दर्शाती फिल्म ‘ज्वार भाटा’ में भी फिल्म का सबसे बड़ा खराब आदमी दिखाया गया उस सेठ को जो एक गरीब महिला से शादी करने पर अपने बेटे को घर से निकाल देता है। उस जमाने का सेठ निर्मम, फैक्ट्री के मजदूरों का खून चूसने वाला और सामाजिक मेल मिलाप का धुर विरोधी हुआ करता था। अमीरी और गरीबी की इसी रेखा में बंटी है कहानी फिल्म ‘ज्वार भाटा’ की।
फिल्म- ज्वार भाटा
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चर्चित फिल्मों के करिश्माई निर्देशक
फिल्म ‘ज्वार भाटा’ तक आते निर्देशक ए सुब्बा राव ने हिंदी में राजेश खन्ना के साथ फिल्म ‘डोली’, महमूद के साथ फिल्म ‘मस्ताना’, धर्मेंद्र और विनोद खन्ना के साथ फिल्म ‘रखवाला’ और रणधीर कपूर व बबीता की फिल्म ‘जीत’ बना ली थीं। फिल्म ‘जीत’ के वह निर्माता भी रहे। करिश्मा कपूर और करीना कपूर के माता पिता अभिनीय फिल्म ‘जीत’ दरअसल ए सुब्बा राव की फिल्म ‘पूला रंगाडू’ की रीमेक है, इसी की तमिल रीमेक में एम जी रामचंद्रन और जयललिता ने साथ काम किया था और साउथ सिनेमा की एक नई कहानी को जन्म दे दिया था। साल 1973 में ए सुब्बा राव निर्देशित दो फिल्में हिंदी में रिलीज हुईं। एक ‘इंसाफ’ और दूसरी ‘ज्वार भाटा’। धर्मेंद्र औऱ सायरा बानो स्टारर फिल्म ‘ज्वार भाटा’ भी ए सुब्बाराव की ही एक और तेलुगू फिल्म ‘दगुडु मूथालु’ की रीमेक है।
फिल्म- ज्वार भाटा
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धर्मेंद्र और सायरा बानो की जोड़ी
सायरा बानो का उन दिनों जमाना दीवाना था और नायकों में शोहरत के मामले में धर्मेंद्र नंबर वन हीरो थे। दोनों का ऑन स्क्रीन करश्मा तब तक लोग ‘आई मिलन की बेला’ के अलावा ‘आदमी और इंसान’ में भी देख चुके थे। 1961 में अपने समय के सबसे बड़े स्टार शम्मी कपूर के साथ फिल्म ‘जंगली’ से अपनी अभिनय यात्रा शुरू करने वाली सायरा बानो ने हीरोइन नंबर वन का तमगा पाने के साथ ही उस वक्त के हीरो नंबर वन दिलीप कुमार से 1966 में शादी कर ली थी। और, दिलीप कुमार की लोग इज्जत इतनी करते थे कि उनकी बेगम के साथ तमाम चाहने के बावजूद परदे पर अभिनय के नाम पर भी सहज नहीं हो पाते थे। इस एक दिक्कत ने सायरा बानो को बतौर अभिनेत्री अपने करियर में काफी नुकसान पहुंचाया।
फिल्म- ज्वार भाटा
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कहानी अमीर सेठ के अनाथ पोते की
फिल्म ‘ज्वार भाटा’ की कहानी शुरू होती है, रईस कारोबारी सेठ दुर्गादास के घर से। अपनी मर्जी से शादी करने पर सेठजी अपने बेटे को घर से निकाल देते हैं। युवा दंपती के एक बेटा बिल्लू होता है। ये दंपती समय के साथ बीत जाता है और बिल्लू अनाथ हो जाता है तो उसे एक नि:संतान दंपती पाल लेता है। बिल्लू यहीं जाने के असली ढंग सीखता है और ये भी सीखता है कि दुनिया में सबसे बड़ा काम है लोगों के काम आना। उधर, सेठजी का अंत समय निकट है। जैसे सबको होता है उनको भी आखिरी समय में जीवन भर की गलतियों का एहसास होता है। अपने बेटे का वह पता लगाना चाहते हैं। उनके यहां काम करने वाली गायत्री के जरिए बदले में उन्हें पोते का पता मिल जाता है। पोता लौटता है तो पाता है कि यहां तो साजिशों के सूत्रधारों ने अलग ही खिचड़ी पकाई हुई है, लेकिन बिल्लू तो दाल रोटी पकाना सीखकर आया हुआ है। वह रसोई से लेकर तिजारी तक के सारे जाले साफ कर देता है। इस कहानी में धर्मेंद्र व सायरा बानों के अलावा सेठ जी के रोल में नजीर हुसैन ने अपना असर छोड़ा है। साथ में जीवन, राजेंद्र नाथ, सुजीत कुमार भी हैं और हैं शम्मी, जयश्रीटी और मीना टी भी।
फिल्म- ज्वार भाटा
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राजेंद्र कृष्ण के गीतों ने बांधा समा
फिल्म ‘ज्वार भाटा’ लिखने में ए सुब्बा राव की मदद की उस समय के चर्चित लेखक राजेंद्र कृष्ण ने। पंजाबी पृष्ठभूमि से होने की वजह से लोग उनका नाम पुकारते थे, राजिंदर क्रिशन। जी हां, वही राजेंद्र कृष्ण जिनके लिखे ‘हम प्यार में जलने वालों को..’, ‘मैं अपने आप से घबरा..’, ‘इस भरी दुनिया में..’, ‘वो दिल कहां से लाऊं..’ और ‘ये जिंदगी उसी की है..’ हिंदी सिनेमा के संगीत के स्वर्णिम युग के नायाब हीरे माने जाते हैं। राजेंद्र कृष्ण के पास शब्दों का भंडार था और एहसासों का खजाना। गुजरात के जलालपुर में 6 जून 1919 को जन्मे राजेंद्र कृष्ण ने गीत या कहानियां लिखने की कोई ट्रेनिंग नहीं ली। मैट्रिक पास करके सरकारी नौकरी करने लगे थे। बस फिराक गोरखपुरी, अहसान दानिश, सुमित्रानंदन पंत और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ को खूब पढ़ते थे। नौकरी उनकी लगी थी शिमला में और दिल उनका लगा रहता था बंबई में। और जिस साल देश आजाद हुआ, उसी साल वह भी नौकरी के मोह से आजाद हो गए। सन 1947 में ही उनकी लिखी पहली फिल्म ‘जनता’ रिलीज हुई और इसी साल उनके लिखे गाने भी पहली बार फिल्म ‘जंजीर’ में लोगों ने सुने। राजेंद्र कृष्ण के लिखे गीतों का जमाना अब तक दीवाना है। ‘ज्वारा भाटा’ में लिखे उनके गीतों में से ‘तु रु रु तु रु रु रु, तेरा मेरा प्यार शुरू’, ‘रूठा है तो मना लेंगे’ और ‘दाल रोटी खाओ’ तो अब भी सुनने पर सामयिक ही लगते हैं। लक्ष्मीकांत प्यारे लाल ने इन गानों को बांधा बहुत चित्ताकर्षक धुनों में है।
फिल्म- ज्वार भाटा
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‘ज्वार भाटा’ से ‘ज्वार भाटा’ तक
सायरा बानो ने अपने करियर की जिन बुलंदियों पर रहते हुए अपने से उम्र में कहीं बड़े सुपरस्टार दिलीप कुमार से जिस तरह शादी करके अपने करियर को ब्रेक लगा दिया, वैसा ही कुछ बाद में डिंपल कपाड़िया ने राजेश खन्ना से शादी करके किया। हालांकि, बाद में सायरा बानो की ही तरह डिंपल ने भी फिल्मों में शादी के बाद वापसी की और सेकेंड इनिंग्स में दोनों ने खूब नाम कमाया। यहां एक दिलचस्प बात ये भी है कि यूसुफ खान ने जब दिलीप कुमार बनकर हिंदी सिनेमा के सागर में पहली डुबकी साल 1944 में लगाई तो उनकी पहली फिल्म का नाम भी ‘ज्वार भाटा’ ही था। धर्मेंद्र और सायरा बानो की ‘ज्वार भाटा’ का संगीत अपने समय में सुपरहिट संगीत हुआ था।
फिल्म- ज्वार भाटा
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चलते चलते...
फिल्म ‘ज्वार भाटा’ को टिकट खिड़की पर उतनी कामयाबी नहीं मिल पाई जितनी कि फिल्म के निर्देशक ए सुब्बा राव को रही होगी। इसमें कुछ दिक्कत तो फिल्म की फॉर्मूला स्टोरी की रही और कुछ कमी रही उन दिनों की जनता की जिसे धर्मेंद्र की जोड़ी हेमा मालिनी के सिवा किसी दूसरे के साथ भाती ही नहीं थी। साल 1973 में वैसे तो ऋषि कपूर की ‘बॉबी’ ने कमाई के मामले में पहला नंबर पाया था, लेकिन उस साल दूसरे नंबर पर कमाई के मामले में धर्मेंद्र-हेमा मालिनी की फिल्म ‘जुगनू’ ही रही थी। साल 1973 में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली 10 फिल्मों में से चार फिल्में ‘जुगनू’, ‘यादों की बारात’, ‘कहानी किस्मत की’ और ‘लोफर’ धर्मेंद्र की फिल्में हैं। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।