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बाइस्कोप: कंपटीशन जीत सिर्फ इतने रुपये में कुंदन शाह ने बनाई जाने भी दो यारो, फर्स्टकट था छह घंटे का

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जाने भी दो यारों - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
हिंदी सिनेमा में साल 1983 बड़े परदे पर श्रीदेवी के आगमन का साल माना जाता है। फिल्म ‘हिम्मतवाला’ में श्रीदेवी और जीतेंद्र की जोड़ी का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोला। आए इसी साल सनी देओल और अमृता सिंह भी थे और इसी साल मौत को हराकर वापस लौटे उस सदी के महानायक अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘कुली’ भी रिलीज हुई। लेकिन, ‘कुली’ से ज्यादा कारोबार कहते हैं कि उस साल तीन बत्ती के जग्गू दादा यानी जैकी श्रॉफ की फिल्म ‘हीरो’ ने किया था। साल 1983 की और हिट फिल्मों की तलाश करेंगे तो आपको ‘अंधा कानून’, ‘मवाली’, ‘अवतार’, ‘सौतन’ और ‘अगर तुम ना होते’ जैसी फिल्में भी मिल जाएंगी। लेकिन, नहीं मिलेगी तो सिर्फ वो फिल्म जिसके बारे में आज का बाइस्कोप है यानी ‘जाने भी दो यारो’, जो जब रिलीज हुई तो हाशिये पर रही लेकिन जब सिनेमाघरों से उतर गई तो हिंदी सिनेमा की क्लासिक फिल्म बन गई।

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जाने भी दो यारों - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
कुंदन शाह ने लिखी थी सीक्वल
फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ के निर्देशक कुंदन शाह तब जिंदा थे, जब इस फिल्म के प्रिंट को ठीक ठाक करके फिर से इसे सिनेमाघरों में रिलीज किया गया। फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ को दोबारा सिनमाघरों में रिलीज हुए भी आठ साल होने को आए। कुंदन शाह से तब खूब बातें हुई थीं। उन्होंने खूब किस्से फिल्म की मेकिंग के सुनाए थे। वह ये भी कहते थे कि उनका बड़ा मन है इस फिल्म का सीक्वेल बनाने का। लेकिन, ‘एक था टाइगर’, ‘दबंग 2’ और ‘राउडी राठौर’ के एक्शन पर झूम रहे दर्शकों को साल 2012 में भी ‘जाने भी दो यारो’ का सीक्वेल भाएगा, किसी ने यकीन नहीं किया। कुंदन शाह सीक्वेल की वह स्क्रिप्ट अपने सिरहाने रखकर महीनों सोते रहे और एक दिन अपने इस सपने को लिए हुए ही ऊपर चले गए।

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एनएफडीसी के पैसे से बनी फिल्म
साल 2012 में ‘जाने भी दो यारो’ की फिर से रिलीज होने के वक्त कुंदन शाह के चेहरे पर बच्चों जैसी खुशी दिखाई दे रही थी। ये खुशी इस बात की थी कि मीडिया की जो चमक दमक कुंदन को साल 1983 में नसीब नहीं हुई थी, वह सब उनके सामने था। फिल्म की पहली रिलीज तो कब हुई और कब पिक्चर सिनेमाघरों से उतर गई, आधे हिंदुस्तान को तो पता भी नहीं चला और ये इसके बावजूद कि फिल्म को बनाया था राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम यानी एनफडीसी ने। सरकारी दफ्तर में काम सरकारी तरीके से ही होता हैं। हालांकि, कुंदन शाह ने इस बात पर कभी गिला नहीं किया कि उनकी फिल्म को अच्छे प्रचार प्रसार के साथ रिलीज नहीं किया गया। कुंदन का मानना था कि फिल्म अपनी पहली रिलीज में भी अपने बजट के हिसाब से अच्छा कारोबार करने में सफल रही थी। फिल्म में कोई गाना नहीं था, कोई आइटम नंबर नहीं था, हीरोइन जो थी फिल्म की वह वैम्प टाइप की थी और इसके बावजूद लोगों को ये कहानी अपनी जैसी लगी।

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ईमानदार फोटोग्राफरों की कहानी
‘जाने भी दो यारो’ की कहानी थी भी उन लाखों, करोड़ों जैसी जो कुछ बन पाने की जुगत में दिन रात लगे रहते हैं। ये कहानी है एक अखबार के लिए काम करने वाले दो भोले भाले लेकिन ईमानदार फोटोग्राफरों की जिनके कैमरे में एक कत्ल कैद हो जाता है। असली कातिल को पकड़ने के चक्कर में दोनों खुद बिल्डरों के काले धंधे के दलदल में आ गिरते हैं और जितना इससे निकलने की कोशिश करते हैं, उतना ही और अंदर धसते जाते हैं। कुंदन शाह ने इन दोनो को आम आदमी का नुमाइंदा बनाकर सिस्टम मे करप्शन के कपड़े बीच चौराहे उतारने की तब कोशिश की, जब सिनेमा के दर्शक श्रीदेवी को कम कपड़ों में देखकर आहें भरने की तैयारी करने में लगे रहते थे। फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ की चुस्त कथा पटकथा कुंदन शाह ने सुधीर मिश्रा के साथ मिलकर लिखी और इसके जबर्दस्त संवाद लिखने का  काम किया बाद में कैलेंडर बनकर मशहूर हुए अभिनेता निर्देशक सतीश कौशिक ने अपने जोड़ीदार रंजीत कपूर के साथ। रंजीत और सतीश अपने कमरे पर फिल्मों के किरदार बन जाते और खूब एक दूसरे से मजे लेते। और, बाद में इसी सब को कागज पर उतारकर अगले दिन कुंदन शाह को दे आते। कुंदन शाह को ये संवाद पढ़कर मजा भी खूब आता लेकिन वह चाहकर भी इन संवादों पर ठट्ठा मारकर हंस नहीं पाते थे।

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कुंदन शाह ने गिनाई थीं मुश्किलें
खुद कुंदन शाह ने तब बातचीत में कहा था, ‘साल 1983 में ‘जाने भी दो यारो’  जैसी फिल्म बनाना और रिलीज करना आसान नहीं था। फिल्म के निर्देशन में मुझे बहुत दिक्कतें आईं लेकिन अब देखो तो लगता है कि किसी फिल्म का निर्देशक बन पाना ही अपने आप में किसी दिक्कत से कम नहीं है।’ ध्यान रखने वाली बात यहां ये है कि ये बात साल 2012 में वो शख्स कह रहा है जो हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े सितारों में से एक शाहरुख खान के साथ तब तक ‘कभी हां कभी ना’ बना चुका है और नसीरुद्दीन शाह को लेकर ‘खामोश’ बना चुका है। शादी के पहले ही गर्भवती हो जाने के मुद्दे पर फिल्म ‘क्या कहना’ कुंदन शाह साल 2000 में बना चुके थे। ऐसी फिल्मों का निर्देशक ऐसा क्यों कहता है कि अब निर्देशक बन पाना ही मुश्किल है, पूछने पर कुंदन ने कहा, ‘असली निर्देशक कभी सितारों की चापलूसी नहीं करेगा। चापलूस निर्देशक कभी अच्छा सिनेमा नहीं बना सकता और चापलूसी पसंद करने वाला सितारा कभी जमाने का नायक नहीं बन सकता।’

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जब चोरी हो गया नसीर का कैमरा
कुंदन शाह का इशारा इग्जैक्टली किसकी तरफ था, उन्होंने बताया नहीं तो मैंने भी पूछा नहीं। पूछकर करता भी क्या। ये तो मुझे तब भी पता था कि ‘जाने भी दो यारो’ पहली मर्तबा में ही बनी कैसे थी। पूरी फिल्म में जिस एक शख्स को सबसे ज्यादा पैसा मिला था वह थे नसीरूद्दीन शाह और साल 1983 में उनकी इस फिल्म के लिए फीस थी कुल 15 हजार रुपये। और, वह भी इस शर्त के साथ फिल्म की शूटिंग के लिए कपड़े वह घर से पहनकर आएंगे और अपना निकोन कैमरा भी साथ लेकर आएंगे, जिसे गले में लटकाकर उन्हें फिल्म में फोटोग्राफर दिखना था। नसीन ने तब तो उफ नहीं की लेकिन जब शूटिंग के आखिरी दिनों में उनका कैमरा चोरी हो गया तो बेचारे बहुत दुखी हुए। सबसे अपना दर्द कहते लेकिन सेट पर कोई भी ऐसा दिलदार नहीं था जो कहता, कोई बात नहीं चलो मैं दूसरा कैमरा दिला देता हूं। नसीर को अपना वह कैमरा अब भी याद दिलाओ तो चेहरे पर दर्द बनकर उभर आता है।

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शानदार सहायकों के जानदार निर्देशक
नसीर के इस फिल्म में साथी थे फक्कड़ कलाकार रवि वासवानी। दोनों की जोड़ी सुधीर- विनोद की जोड़ी के तौर पर कहानी में नजर आई। फिल्म में तब विधु विनोद चोपड़ा और सुधीर मिश्रा दोनों कुंदन शाह की टीम का हिस्सा थे। बाद में नामी प्रोड्यूसर डायरेक्टर बने विधु उन दिनों कुंदन शाह का प्रोडक्शन संभालते थे और ‘इस रात की सुबह नहीं’ व ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ जैसी फिल्में निर्देशित करने वाले सुधीर मिश्रा तब कुंदन शाह के असिस्टेंट हुआ करते थे। फिल्म एनएफडीसी का एक स्टोरी कंपटीशन जीतकर बनी थी और एनएफडीसी ने इस फिल्म को बनाने के लिए कुंदन शाह को सात लाख रुपये दिए थे। फिल्म इंस्टीट्यूट के पूरे एक झुंड को जुटाकर कुंदन ने ये फिल्म बनाई और एनएफडीसी से मिला ज्यादातर पैसा फिल्म का स्टॉक खरीदने में खर्च कर दिया। कुंदन शाह की ये फिल्म पहले कट के वक्त करीब छह घंटे की थी और इसे पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट के छात्रों ने पहली बार इसी लंबाई के साथ ही देखा था।

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अनुपम खेर का रोल पूरा कट गया
फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ में काम करने वालों के तो फाइनल एडिट वर्जन में चेहरे तक दिखाई नहीं दिए। ऐसे लोगों में एक बड़ा नाम अनुपम खेर भी हैं। अनुपम खेर ने फिल्म में डिस्को किलर का रोल किया जो लोगों का नाचते नाचते कत्ल कर देता था। फाइनल एडिट में फिल्म से उनका पूरा रोल ही काट दिया गया। हां, अनुपम खेर की आवाज जरूर फिल्म में एक जगह सुनाई देती है जहां उनसे मजदूर बने एक कलाकार की डबिंग कराई गई है। दिलचस्प बात ये भी है कि फिल्म की हीरोइन भक्ति बर्वे की डबिंग अनीता कंवर ने की है। फिल्म में बाकी रोल जो कटे वे थे उन लोगों के जो फिल्म के क्लामेक्स में दिखने वाले चीर हरण के साथी थे। ये पूरा सीन ही कुंदन शाह ने बहुत लंबा शूट कर डाला था। तब इस सीन में महात्मा गांधी से लेकर पृथ्वीराज चौहान और चंद्रगुप्त मौर्य तक का जिक्र शामिल था।


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ब्लोअप - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
फिल्म ‘ब्लोअप’ से मिला असली आइडिया
फिल्म में तमाम सीन क्लासिक बन बड़े हैं। ये तो आप जानते ही हों शायद कि फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ का मूल विचार कुंदन शाह ने ऑस्कर पुरस्कारों में दो नामांकन हासिल करने वाली 1966 में रिलीज हुई फिल्म ‘ब्लो अप’ से लिया था। फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ में जहां सुधीर और विनोद फोटोग्राफी करने जाते हैं, उसका नाम है एंटोनियोनी पार्क। फिल्म ‘ब्लोअप’ के निर्देशक का नाम है माइकेलैंजेलो एंटोनियोनी। कुंदन शाह ने इस पार्क के नाम के जरिए मूल फिल्म के निर्देशक को अपने हिसाब से श्रद्धांजलि दी थी। ‘ब्लोअप’ ने भले एंटोनियोनी को ऑस्कर और बाफ्टा फिल्म पुरस्कार समारोहों में मायूस किया हो लेकिन कान फिल्म फेस्टिवल में ‘ब्लोअप’ को पाम ए डिओर यानी कान फिल्म फेस्टिवल का सबसे बड़ा अवार्ड मिला। और, फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ ने कुंदन शाह को दिलाया था बेस्ट डेब्यू डायरेक्टर का नेशनल फिल्म अवार्ड। रवि वासवानी ने भी इस फिल्म के लिए बेस्ट कॉमेडियन का फिल्मफेयर अवार्ड जीता था।

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जाने भी दो यारों - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
हालात पर व्यंग्य का कालजयी सिनेमा
सिनेमा में व्यंग्य को कुंदन शाह की फिल्म ‘जाने भी दो यारो’ ने एक अलग ही मंजिल तक पहुंचाया है। भले मसाला फिल्मों के दौर में पहली बार रिलीज होने पर लोगों को उस समय के हालात पर इस फिल्म में किए गए व्यंग्य समझ नहीं आए लेकिन इसके कथानक ने एक बार जो धीरे धीरे असर करना शुरू किया तो जिसने भी हिंदी सिनेमा को पढ़ा, लिखा या समझा, उसने ये फिल्म जरूर देखी। आज भी ये फिल्म हिंदी सिनेमा की कालजयी कृतियों में गिनी जाती है। फिल्म के हर कलाकार और तकनीशियन के अलावा इसे देख चुके हर दर्शक के दिल के ये फिल्म काफी करीब है और आगे भी रहेगी। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।

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(बाइस्कोप अमर उजाला डिजिटल का दैनिक कॉलम है जिसमें हम उस दिन रिलीज हुई किसी पुरानी फिल्म के बारे में चर्चा करते हैं।)
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