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Indoo Ki Jawani Review: बढ़िया कहानी पर फेरा आठ निर्माताओं ने पानी, इसलिए नहीं जमी ‘इंदू की जवानी’

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इंदू की जवानी - फोटो : अमर उजाला
Movie Review: इंदू की जवानी
कलाकार: कियारा आडवाणी, आदित्य सील, मल्लिका दुआ, राकेश बेदी, अलका कौशल, राजेश जैस आदि।
निर्देशक: अबीर सेनगुप्ता
निर्माता: भूषण कुमार, दिव्या खोसला, कृष्ण कुमार, निखिल आडवाणी, मोनीषा आडवाणी, मधु भोजवानी, निरंजन आयंगार, रयान स्टीफन
रेटिंग: **


कहानी अक्सर किसी धांसू कॉन्सेप्ट या कहें कि आइडिया से जन्म लेती है। ये धांसू आइडिया एक लाइन का होता है। लेखक के दिमाग में कभी भी, कहीं भी और कैसे भी कौंध सकता है। बड़े बूढ़े कहते हैं कि हर राइटर को जेब में एक पेन और परची जरूर रखनी चाहिए, ऐसे मौकों पर चमके बल्ब की बात लिखकर रख लेने के लिए। अबीर सेनगुप्ता ने भी यही किया। ‘इंदु की जवानी’ कॉन्सेप्ट लेवल पर कमाल की फिल्म है। स्क्रिप्ट भी ढंग की है। लेकिन, अबीर सेनगुप्ता नए निर्देशक हैं। हिंदी सिनेमा में नए निर्देशकों के साथ एक निर्माता क्या क्या नहीं करता, यहां तो आठ प्रोड्यूसर्स मैं शुरू में ही गिनवा चुका हूं।
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इंदू की जवानी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘इंदु की जवानी’ देखकर गाजियाबाद के लोगों की प्रतिक्रिया क्या होगी पता नहीं लेकिन देश के इस सबसे प्रदूषित शहर में ऐसी भी कोई कहानी सेट हो सकती है, दिलचस्प लगता है। लेकिन, फिल्म की असल कमजोर कड़ी भी यही है। अबीर सेनगुप्ता ने अपने आसपास के माहौल में एक ऐसी लड़की तलाश ली, जो आम दुनिया में दिखे जाए, ऐसा होता नहीं है। अबीर ने जो बड़ा कॉन्सेप्ट यहां तैयार किया, वह था अपने दोस्त से धोखा खाने के बाद किसी लड़की का बदले के तौर पर किसी के भी साथ दैहिक रिश्ते बनाने की ठानना और उसके लिए एक एप की मदद लेना। वाकई कोई डेटिंग एप अगर इस फिल्म में शामिल हो जाता तो बात बहुत बड़ी हो सकती थी।
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इंदू की जवानी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
आदित्य सील और कियारा आडवाणी दोनों निर्देशक के एक्टर हैं। वह दोनों उतने काबिल अभिनेता नहीं है कि फिल्म की कहानी का सार समझकर अपने भीतर अभिनय का ज्वार जगा सकें। पूरी फिल्म में ये कमी समझ आती भी है और दोनों के चेहरों पर दिखती भी है कि फिल्म का कहानी में या फिर अपने अपने किरदारों में दोनों को उत्साह नहीं नजर आ रहा। कियारा आडवाणी की सारी ऊर्जा नकली लगती है और उनका मटकना, बहकना, फुदकना सब बनावटी नजर आता है। फिल्म में किसी ने असल अभिनय करके वाहवाही लायक काम किया है तो वह हैं मल्लिका दुआ। लेकिन, मल्लिका दुआ ने यहां नया क्या किया, इस बारे में सोचना पड़ सकता है।

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इंदू की जवानी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
निर्देशन और अभिनय के बाद फिल्म की तीसरी सबसे कमजोर कडी है इसका संगीत। टी सीरीज को अपने संगीत विभाग में आमूच चूल परिवर्तन करने की जरूरत है। भूषण कुमार को अपने आसपास एक दो लोग ऐसे भी रखने चाहिए जो उनकी पसंद को खराब बता सकें। सिर्फ मिलियन व्यूज से संगीत अच्छा नहीं होता। संगीत अच्छा तब होता है जब शहर, गांव, कस्बों में बजता है और रात के सन्नाटे में सुनाई देता है। गुलशन कुमार के जमाने के गाने अब भी देश के दूर दराज इलाकों में सुनाई देते है, भूषण के टाइम के भी गाने सुनाई देते हैं, लेकिन ये सब ज्यादातर रीमिक्स ही होते हैं। टी सीरीज को कम से कम अपनी बनाई फिल्मों में ऐसे गीत जरूर जोड़ने चाहिए जिन्हें गायक ने ऑटो ट्यूनर पर न गाया हो और  गीतकार ने किसी और का मुखड़ा चुराकर न छाप दिया हो।
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इंदू की जवानी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म को एक स्टार तो इसकी कहानी और कॉन्सेप्ट के लिए मिलता है और दूसरा इसमें काम अच्छा निकला इसकी तकनीकी टीम का। वसंत की सिनेमैटोग्राफी शुरू से आखिर तक पूरी कोशिश करती है कि किसी तरह फिल्म का रंग जम जाए। ताजगी लाने की भी पूरी कोशिश वह लाइट एंड शेड्स के अनोखे प्रयोगों से करते हैं। फिल्म की एडीटिंग की भी यहां तारीफ करनी बनती है। अजय शर्मा ने न सिर्फ फिल्म की रफ्तार सही रखी है बल्कि इसकी अवधि भी अपने चुस्त संपादन से संभाले रखी है। लेकिन, अभिनय, निर्देशन और संगीत के यहां कमजोर पड़ने से फिल्म आखिर तक आते आते अपना असर खो देती है।

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