कोई भी फिल्म बरसों बरस लोगों के दिलों में कैसे बसी रह जाती है? किसी को उससे जुड़ी कोई घटना जो उसके निजी जीवन से ताल्लुकर रखती हो, वह फिल्म की याद बनाए रखती है। किसी को फिल्म के संवाद याद रह जाते हैं। किसी को फिल्म में किसी एक खास कलाकार की अदाकारी याद रह जाती है और किसी को बार बार याद आते रहते हैं उस फिल्म के गाने। साल 1999 में रिलीज हुई फिल्म हम दिल दे चुके सनम मुझे याद आती है अपने कलेवर के लिए। सितारों के रंग बिरंगे कपड़े, पंडित दरबार की आलीशान हवेली, मीलों बिखरा रेगिस्तान, मांडवी का विजय विलास पैलेस, छोटे छोटे चबूतरों पर बने मंडपों के बीच सिमटते खामोश लम्हे और एक ऐसा कैनवस जिस पर इसके निर्देशक संजय लीला भंसाली ने प्यार गढ़ा था।
कोई कहता है ये अनिल कपूर की फिल्म वो सात दिन की कहानी पर बनी, किसी ने इसका किस्सा मैत्रेयी देवी की लिखी किताब ना हन्यते से जोड़ा। लेकिन, खुद संजय लीला भंसाली बता चुके हैं कि ये फिल्म उन्होंने बनाई गुजराती लेखक झावेरचंद मेघनानी के नाटक शेतल ने काठे पर और ये कहानी लेकर मेघनानी खुद संजय लीला भंसाली से मिलने मुंबई पहुंचे थे। और, जैसे फिल्म हम दिल दे चुके सनम की कहानी चलकर संजय लीला भंसाली तक पहुंची। इस कहानी की नायिका नंदिनी भी खुद ही चलकर संजय लीला भंसाली तक पहुंच गई। भंसाली को गानों के फिल्माने में महारत हासिल रही है। विधु विनोद चोपड़ा के जब वह सहायक थे तो विधु गानों की शूटिंग भंसाली के भरोसे ही छोड़ देते थे। फिल्म 1942 ए लव स्टोरी के गानों को फिल्माने में भंसाली की निर्देशन क्षमता का बड़ा हाथ रहा है।