फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बाइस्कोप: संजू बाबा के डर से इस डायरेक्टर का हुआ था सामूहिक बहिष्कार, खेमेबाजी पर सबसे बड़ा खुलासा

विज्ञापन
1 of 10
संजय दत्त - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
25 साल का कोई लड़का शोले और शान जैसी फिल्में बनाने वाले निर्माता जी पी सिप्पी के साथ अपने करियर की पहली फिल्म बनाने का एलान करे और उस फिल्म में संजय दत्त, आदित्य पंचोली, रवीना टंडन, करिश्मा कपूर, शक्ति कपूर, गुलशन ग्रोवर, कादर खान, तनूजा और अजीत जैसे दिग्गज कलाकारों की फौज हो तो जमाना तो नोटिस करेगा ही। बस ऐसे ही शुरू हुई थी निर्देशक संजय गुप्ता की पहली फिल्म आतिश:फील द फायर। फिल्म तो खैर आतिश के नाम से ही मशहूर हुई और फील द फायर तो कोई बोलता भी नहीं है। ये टैग लाइन्स का किस्सा भी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अजीब है। चलिए पहले इसकी राम कहानी ही समझा देता हूं।
विज्ञापन

2 of 10
आतिश - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
मुंबई में फिल्म निर्माताओँ के अपने अपने गुट हैं। एक गुट ने फिल्म प्रोड्यूसर्स गिल्ड बना रखी है तो दूसरे ने इम्पा (इंडियन मोशन पिक्चर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन) और तीसरे ने आईएफटीपीसी (इंडियन फिल्म एंड टेलीविजन प्रोड्यूसर्स काउंसिल)। एक और चौथा गुट भी है वेस्टर्न फिल्म प्रोड्यूसर्स कंबाइन, छोटे और मझोले फिल्म निर्माताओं का संगठन। इन चारों संगठनों के बीच एक ही सहमति है और वह है फिल्मों के शीर्षक को लेकर। एक एसोसिएशन में कोई निर्माता अपनी फिल्म का शीर्षक पंजीकृत कराए तो बाकी सारी एसोसिशन को इसका नोटिस जाता है। कहीं से कोई आपत्ति न आए तो फिल्म का वह नाम इसे पंजीकृत कराने का आवेदन देने वाले निर्माता का हो जाता है। और आपत्ति लगने के बाद प्रोड्यूसर को फिर भी फिल्म का वही टाइटल देना ही हो तो संगठन अपने मेंबर को बोल देते हैं कि फिल्म के नाम के साथ एक टैगलाइन लगा लो। इसके बाद पहले से किसी निर्माता ने अगर वही नाम अपनी फिल्म का रखा भी है तो उसकी आपत्ति खारिज कर दी जाती है।
विज्ञापन

3 of 10
आतिश - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
तो आतिश: फील द फायर या कहें कि आतिश के बनने के किस्से भी निराले हैं। कहने को तो ये फिल्म सलीम जावेद की सुपरहिट फिल्म दीवार से प्रेरित कही जाती है लेकिन है दरअसल ये सुप्रसिद्ध जापानी निर्देशक जॉन वू की फिल्म ए बेटर टुमॉरो का हिंदी रीमेक। ये बात आज से 26 साल पहले की है और तब विदेशी फिल्मों के सीन्स या पूरी की पूरी धड़ल्ले से लोग हिंदी में कॉपी मार लेते थे। ये तो बीआर फिल्म्स पर अगर हॉलीवुड फिल्म कंपनी ने माई कजिन विनी की बिना अनुमति नकल बनाने को लेकर सात करोड़ रुपये का केस नहीं किया होता तो ये सिलसिला अब भी चला आ रहा होता। ट्वेंटिएथ सेंचुरी फॉक्स के इस केस ने बीआर फिल्म्स का दीवाला निकाल दिया और कंपनी एक तरह से बंद ही हो गई। बीआर फिल्म्स की ये फिल्म गोविंदा के साथ बनी थी, नाम था, बंदा ये बिंदास है।

4 of 10
आतिश - फोटो : सोशल मीडिया
संजय गुप्ता ने खुद ऋतिक रोशन के साथ फिल्म काबिल की रिलीज से पहले माना था कि उन्हें अब जाके थोड़ी तमीज आई है फिल्म बनाने की। और, ये बात वह निर्देशक कह रहा है जिसने लाइन से विदेशी फिल्मों के आइडिया मारकर कोई एक दर्जन फिल्में बना डाली हैं। संजय गुप्ता ने हिंदी सिनेमा की खेमेबाजी वाली दौर भी देखा है और अपनी डेब्यू फिल्म को जिस हीरो संजय दत्त की वजह से वह पूरा कर सके, उनका एक अनकहा बहिष्कार भी फिल्म इंडस्ट्री में झेला है। ये तो भला हो कि उनके साथ अनिल कपूर जैसा जिगरवाला आ गया नहीं तो संजय गुप्ता तो खंडाला में होटल बनाकर वहीं सैटल हो जाने वाले थे।
विज्ञापन

5 of 10
आतिश - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
एक इंटरव्यू में आतिश के बारे में बातें करते हुए संजय गुप्ता कहते हैं, “कास्टिंग के लिहाज से ये सबसे आसान फिल्म थी। मैं ज्यादातर दोस्तों के साथ ही काम कर रहा था। और शुक्रिया संजू का कि उनकी वजह से ये फिल्म मैं बना सका।” संजय दत्त के साथ कांटे बनाने के बाद संजय गुप्ता के जीवन में संकट आया। इसी इंटरव्यू में वह खुद कहते हैं, “कांटे के बाद तो पीछे देखने का सवाल ही नहीं था लेकिन फिर शूट आउट ऐट वडाला से ठीक पहले मैं चार साल कुछ नहीं कर सका। फिल्म इंडस्ट्री के 90 फीसदी लोग मेरे साथ काम नहीं करना चाहते थे। संजू से मनमुटाव होने के बाद सबको बोल दिया गया कि इसके साथ काम मत करो।” हालांकि संजय गुप्ता यहां ये भी स्पष्ट करते हैं कि ऐसा कोई संदेश संजय दत्त की तरफ से नही गया बल्कि उनके आसपास रहने वालों ने ही ये माहौल बना दिया था।
विज्ञापन

6 of 10
आतिश - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिर संजय गुप्ता को समर्थन मिला अनिल कपूर और जॉन अब्राहम का। संजय गुप्ता बताते हैं, “अनिल कपूर ने एक बयान जारी किया। उन्होंने कहा कि अगर संजू खुद उनसे कहें कि संजय गुप्ता की फिल्म मत करो तो मैं नहीं करूंगा लेकिन इसके लिए उन्हें मुझे इसकी कोई जायज वजह बतानी होगी। मैं इसे अनिल कपूर की सदाशयता मानता हूं।” इसके बाद तो संजय गुप्ता ने ऐश्वर्या राय को भी निर्देशित किया और ऋतिक रोशन को भी। हालांकि अपनी फिल्म हमेशा के हीरो सैफ अली खान के एक बयान का दर्द उनको अब भी सालता है। दरअसल सैफ से किसी ने उनकी और संजय गुप्ता की दोस्ती के बारे में पूछ लिया था और सैफ ने कहा, “इस तरह की दोस्तियां सिर्फ फिल्म भर के लिए होती हैं। फिर सब अपने अपने रास्ते चल देते हैं।”
विज्ञापन

7 of 10
आतिश - फोटो : सोशल मीडिया
संजय गुप्ता और संजय दत्त के बीच की दीवार दोनों तरफ के कुछ लोग मिलकर अब पाट चुके हैं। तो फिर से लौटते हैं आज के बाइस्कोप की फिल्म आतिश की तरफ। इस फिल्म के पोस्टर में आपको संजय दत्त की एक खास तस्वीर दिख सकती है। वह धूप का चश्मा लगाए हैं। गले में सोने की चेन है। कान में क्रॉस बनाए बालियां हैं और चश्मे में प्रतिबिंब दिख रहा है समंदर की लहरों का। ये फोटो अब मशहूर हो चुके फोटोग्राफर डब्बू रत्नाणी की पहली फोटो है जो किसी फिल्म के पोस्टर पर लगी। संजय गुप्ता उन्हें अपने साथ फिल्म की शूटिंग पर मॉरीशस इसलिए ले गए थे क्योंकि डब्बू ने फिल्म के सारे फोटो मुफ्त में खींचने का प्रस्ताव उनके सामने रखा था। डब्बू का संजय गुप्ता से रिश्ता भावुक था। संजय गुप्ता का संजय दत्त से रिश्ता बहुत भावुक था। और, फिल्म में सारे कलाकारों से भी एक दूसरे का रिश्ता इतना भावुक था कि जब बंबई बम धमाकों में संजय दत्त का नाम आया और फिल्म आतिश के सेट पर ये सूचना मॉरीशस पहुंची तो सब के सब एकदम से उदास हो गए थे।

8 of 10
आतिश - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म आतिश में भी बंदूकों और तमंचों की जो भी नुमाइश हुई है। खुद संजय गुप्ता के मुताबिक वे सब के सब असली थे। आतिश कहानी है एक पुलिस अफसर और एक अपराधी की। लेकिन, इस कहानी में मां अपराधी की तरफ होती है और न्याय भी अपराधी के हाथों ही होता संजय गुप्ता ने फिल्म के ज्यादातर हिस्से में दिखाया है। फिल्म में वैसे तो संजय दत्त और उनके भाई बने अतुल अग्निहोत्री के बीच ही दमदार सीन होने थे लेकिन संजय गुप्ता ने इस फिल्म में एक किरदार गढ़ा नवाब का जो फिल्म में आदित्य पंचोली ने निभाया। संजय दत्त के किरदार का नाम रखा गया बाबा। बाबा और नवाब की दोस्ती ही इस फिल्म की असल रीढ़ है। संजय गुप्ता को अब भी याद है वो सीन जो फिल्म के लिए उन्होंने सबसे पहले शूट किया था। इस सीन में बाबा और नवाब मस्ती करते हैं और संजय दत्त डॉयलॉग मारते हैं, “अरे जिंदगी में जाने का मजा तब आता है दोस्त जब मौत की उंगलियां थामकर भागा जाए।” फिल्म में संवाद लिखे थे कमलेश पांडे ने और ए बेटर टुमॉरो का ये हिंदी वर्जन लिखकर तैयार किया था उस्ताद राइटर रॉबिन भट्ट ने। रॉबिन के साथ ही संजय गुप्ता अपनी अगली फिल्म मुंबई सागा भी बना रहे हैं।


 

9 of 10
आतिश - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म आतिश एक ऐसी कहानी है जो आपको रुलाती भी है, गुस्सा भी दिलाती है और जज्बात के असली मतलबों का एहसास भी कराती है। अपने छोटे भाई अविनाश को पुलिस एकडेमी में भेजने के लिए रुपयों का जुगाड़ करने के लिए जब बाबा पहली सुपारी लेता है तो वह सीन देखने लायक है। और फिर यही अविनाश जब पुलिस अफसर बनकर बाहर आता है तो उसे पहला काम मिलता है बाबा और नवाब को गिरफ्तार करने का। बाबा और अविनाश की मां के किरदार में यहां है तनूजा। मदर इंडिया से चलकर आतिश तक आया मां का ये किरदार यहां गांवों की नयनाभिराम दृश्यावली तो नहीं सजाता है लेकिन ये जरूर बताता है कि गावों में लड़कियों के छेड़ने वाले बिरजू शहरों की झुग्गियों के बलात्कारी बन जाते हैं, अगर उन्हें सही समय पर सबक न सिखाया जाए। यहां हमलावर की जान बाबा के हाथों जाती है और अंकल इसके बाद की घटनाओं का कैटेलिस्ट बनता है। फिल्म में कहने को रवीना टंडन और करिश्मा कपूर भी हैं लेकिन इसी साल रिलीज हुई दोनों की फिल्म अंदाज अपना अपना के मुकाबले उनके किरदार यहां काफी कमजोर दिखे। टोटल मसाला फिल्म का बॉक्स ऑफिस पर रिलीज के वक्त अच्छा बोलबाला रहा और फिल्म ने अपनी लागत कोई चार गुना कमाई की।
विज्ञापन

10 of 10
आतिश - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
देश में तब विदेशी फिल्मों का कानूनी तरीके से लाना इतना आसान नहीं था तो फिर जॉन वू की लेटेस्ट फिल्म मुंबई कैसे पहुंची, ये भी एक पहेली है। इसमें एक नामी कलाकार का नाम भी आता है कि उसने इसे अमेरिका में देखा और हजार डॉलर देकर इसकी वीएचएस कॉपी हासिल कर ली। मुंबई में उसके घर से ये वीएचएस कोई दूसरा कलाकार ले गया, वगैरह वगैरह। इन कानाफूसियों को एक किनारे रखकर भी देखें तो संजय गुप्ता का हिंदी सिनेमा में डेब्यू शानदार रहा और वह तब से लगातार फिल्में बना रहे हैं। हिंदी सिनेमा में उनके 26 साल पूरे होने की शुभकामनाएं। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।

(बाइस्कोप अमर उजाला डिजिटल का दैनिक कॉलम है जिसमें हम उस दिन रिलीज हुई किसी पुरानी फिल्म के बारे में चर्चा करते हैं।)

बाइस्कोप: इस फौजी की असल प्रेम कहानी पर बनी गदर एक प्रेमकथा, बनाया ये अनोखा रिकॉर्ड

 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें