आज के बाइस्कोप की फिल्म ‘दिल से’ तक आने से पहले दो कदम पीछे चलना जरूरी है। पता नहीं कितने लोगों ने सिस लेविन का नाम भी सुना होगा। सीएनएन संवाददाता जेरी लेविन की पत्नी सिस ने अपने पति को लेबनॉन में उग्रवादियों के चंगुल से छुड़ाने के लिए साल 1984 में जो मेहनत की उस पर एक फिल्म बनी, ‘हेल्ड हॉस्टेज’। सीधे टेलीविजन पर रिलीज होने के लिए बनी इस फिल्म के ठीक अगले साल एक दक्षिण भारतीय भाषा में एक फिल्म रिलीज हुई, ‘रोजा’। कहानी दोनों की एक सी है, बस फर्क ये है कि ‘रोजा’ की कहानी को देसी फिल्म समीक्षकों ने तब सत्यवान और सावित्री की पौराणिक कहानी का चोला पहना दिया। फिल्म में लेबनान के उग्रपंथियों की जगह कश्मीर में तबाही मचाने वाले पाकिस्तान पोषिष उग्रवादियों ने ली और फिल्म से शुरू हुए एक ऐसी सिनेत्रयी जिसने भारतीय सिनेमा को एक नई दिशा और दशा दी।
ध्यान रहे कि ‘रोजा’ मूल रूप से तमिल में बनी फिल्म है जिसे हिंदी में डब करके रिलीज किया गया। और, इसी फिल्म ने दक्षिण भारतीय भाषाओं में बनी फिल्मों के लिए उत्तर भारत में एक बड़ा बाजार भी खोला। किसे पता होगा कि इस फिल्म कि रिलीज के अगले दो दशकों में हिंदी में डब दक्षिण भारतीय फिल्मों का एक बड़ा बाजार विकसित हो जाएगा और ये बाजार इतना बड़ा होगा कि सोनी मैक्स जैसे चैनलों पर बस ऐसी ही फिल्मों का बोलबाला होगा। साल दर साल, हफ्ते दर हफ्ते ये डब फिल्में हिंदी पट्टी में अपने पैर पसार रही हैं। हर हफ्ते टीवी की टीआरपी में जो फिल्म देश में सबसे ज्यादा देखी जाती है वह अब भी कोई न कोई डब दक्षिण भारतीय फिल्म ही होती है जैसे कि इसी गुरुवार को आई टीआरपी में नंबर वन फिल्म रही है, केजीएफ।
आज के बाइस्कोप की शुरुआत मैंने फिल्म ‘रोजा’ के जिक्र से जानबूझकर की, हालांकि ये हमारी आज के बाइस्कोप की फिल्म नहीं है। 21 अगस्त 1998 को रिलीज हुई फिल्म ‘दिल से’ आज के बाइस्कोप की फिल्म है, और इसी फिल्म से निर्देशक मणिरत्नम की वह फिल्मत्रयी पूरी होती है जिसका मध्यांतर बनी थी फिल्म ‘बॉम्बे’। ये तीनो फिल्में तीन अलग अलग अतिवादी माहौल में पनपी प्रेम कहानियां हैं। जीवन के सबसे दुरूह और संकटकालीन समय में भी मानव की मूल भावनाएं कभी नहीं मिटतीं। वह कठिन से कठिन परिस्थिति में संसर्ग के तरीके तलाश लेता है और प्रेम कब कहां प्रस्फुटित हो जाए, वह खुद भी नहीं जानता। मणिरत्नम ने प्रेम के इसी भाव को परदे पर तीन अलग अलग हालात में इन फिल्मों में पकड़ा, जिनकी परिणति हुई शाहरुख खान, प्रीति जिंटा और मनीषा कोराइराला स्टारर फिल्म ‘दिल से’ में। ‘दिल से’ से निर्देशक मणिरत्नम की हिंदी में बनाई पहली फिल्म है।
‘दिल से’ की जब भी याद आती है तो सबसे पहले आपको क्या याद आता है? मैं ये सवाल अक्सर मास मीडिया की अपनी कक्षाओं में शामिल होने वाले छात्रों से पूछता हूं। कोई मुझे उन सात चरणों की बात सुनाता है जिनसे होकर एक इश्क करने वाला अपने जीवन में गुजरता है तो कोई मुझे शाहरुख खान के रेडियो अनाउंसर होने की बात सुनाता है। कुछ छात्र मनीषा कोइराला के भोले चेहरे के पीछे छिपे आतंकी चेहरे का मर्म भी उधेड़ने की विनती करते हैं। और, कुछ को याद रह जाता है प्रीति जिंटा के किरदार का पहली ही मुलाकात में दागा गया सवाल. ‘आर यू वर्जिन?’ ‘दिल से’ की रिलीज के 22 साल बाद भी प्रीति जिंटा से लोग ये सवाल पूछते हैं कि आखिर फिल्म में ये सवाल उन्होंने इतनी सहजता से कैसे शाहरुख खान से पूछ लिया। ये सवाल भारतीय मानसिकता में दबी पुरुषवादी सोच को सिर्फ एक साहसी कदम से दरका देता है। भैया दूज, हरितालिका तीज से लेकर करवा चौथ और हलषष्ठी की पूजा तक अपने भाई, पति और संतान के लिए व्रत रखने वाली परंपरा में शायद ही कभी पुरुष से सवाल होता हो कि वह अपनी बहन, पत्नी और बेटी के लिए कोई व्रत क्यों नहीं रखता? ‘दिल से’ में लिखा गया ये छोटा सा संवाद इसी पुरुषसत्ता के तने को पकड़कर पूरा हिला देता है।
लेकिन, कुछ प्रेमी मन भी होते हैं ऐसे श्रोताओं में। वे अपनी ही धुन में खोए रहते हैं। धीरे से हाथ खड़ा करते हैं। आंखों में दुनिया भर की आशाएं समेटे रहते हैं और धीरे से मुस्कुराते और सकुचाते हुए बोलते हैं, ‘सर, इसके गाने।’ ‘दिल से’ की कहानी क्या है, इसके किरदार क्या हैं, वे ऐसे क्यों हैं और इस सबके पीछे की अंतर्धारा क्या है? इन सारे सवालों को किनारे पर छोड़ देश की दो पीढ़ियां आज भी ‘दिल से’ के गानों को दिल से लगाए लंबी दूरी की सैर पर निकल जाना चाहती है। ये संगीत है भी ऐसा। फिल्म के टाइटिल सॉन्ग में जब पिंक फ्लॉयड के बास गिटारिस्ट गाइ प्रैट का जादू कानों पर असर करता है तो यूं लगता है कि सुनने वाला किसी दूसरी दुनिया में ही पहुंच गया। नई पीढ़ी रहमान के संगीत में फिल्म ‘रॉकस्टार’ के लिए हुए अंतर्राष्ट्रीय गठबंधनों को याद करती है, लेकिन इन्हें क्या पता कि रहमान ये काम उनसे एक पीढ़ी पहले भी कर चुके हैं फिल्म ‘दिल से’ में..
फिल्म ‘दिल से’ का हर गाना अपने आप में एक एहसास है। 22 साल बाद भी गुलजार की लिखी हर लाइन आज की ही लिखी हुई सी ताजा लगती है। और, रहमान के संगीत की रवानी कहीं से भी ये नहीं पता चलने देती कि ये पिछली सदी के आखिरी दशक का संगीत है। हर गीत स्वर्णिम और संगीत की हर तान कालजयी। हॉलीवुड तक इस फिल्म के गाने का असर हुआ और चलती ट्रेन पर फिल्माए गए गाने ‘छैंया छैंया’ के तो कहने ही क्या। शाहरुख तब पूरे जोश में हुआ करते थे। चलती ट्रेन पर भी वह बिना कोई रस्सी या केबल बांधे पूरा गाना शूट कर गए। लेकिन, हालात खराब हुई इस गाने की शूटिंग में तो पहली बार बड़े परदे पर दिखीं मलाइका अरोड़ा की। उनके घाघरे के नीचे कमर पर एक रस्सी बांधी जाती थी ताकि शूटिंग के दौरान कहीं उनका पैर खिसके तो वह सीधे नीचे ना पहुंच जाएं। मलाइका की पूरी कमर पर इस चक्कर में गहरे निशान और जख्म पड़ गए थे, लेकिन चेहरे पर उन्होंने शिकन तक नहीं आने दी। ये गाना हॉलीवुड फिल्म ‘इनसाइड मैन’ में भी इस्तेमाल किया गया है। सुखविंदर सिंह को इस गाने के लिए फिल्मफेयर का बेस्ट प्लेबैक सिंगर अवार्ड मिला और फराह खान को बेस्ट कोरियोग्राफर का।
जहां तक पुरस्कारों की बात है तो फिल्म ‘दिल से’ ने दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते। सर्वश्रेष्ठ छायांकन का राष्ट्रीय पुरस्कार फिल्म ‘दिल से’ के लिए मिला संतोष सिवन को और सर्वश्रेष्ठ ध्वनि संयोजन का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार इस फिल्म के लिए जीता एच श्रीधर ने। फिल्म ‘दिल से’ की पटकथा लिखने में हिंदी के दिग्गज फिल्म निर्देशक तिगमांशु धूलिया ने मणिरत्नम की मदद की है। भारतीय सिनेमा में दिग्गज निर्देशक बन चुके तमाम लोगों ने मणिरत्नम के साथ सहायक के रूप में काम किया है। लॉकडाउन से ठीक पहले भी मणिरत्नम की एक नई फिल्म की शूटिंग में 14 कैमरों वाले एक सेटअप में आठ दिग्गज निर्देशक उनकी बतौर सहायक निर्देशक मदद करने के लिए चेन्नई पहुंचने वाले थे। मणिरत्नम जितना सम्मान हासिल कर पाने वाले निर्देशक भारतीय सिनेमा में गिनती के ही हुए हैं। मणिरत्नम ने बतौर निर्देशक अपनी आखिरी हिंदी फिल्म अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय के साथ ‘रावण’ बनाई थी, इस बात को भी 10 साल होने को आए, लेकिन मणिरत्नम ने उसके बाद से कोई हिंदी फिल्म बनाई नहीं है। इसकी वजह वह हिंदी पट्टी के दर्शकों के साथ अपनी संवेदनाओं का साम्य न बन पाने को बताते हैं। लेकिन, हिंदी पट्टी के दर्शक अब भी पलकें बिछाएं उनकी फिल्मों का इंतजार करते हैं और मूल हिंदी न सही उनकी तमिल में बनी फिल्मों को भी सिर माथे बिठाते हैं।
एक रेडियो उद्घोषक की एक रहस्यमयी लड़की के प्रेम में दीवाना होने की इस कहानी की तमाम परतें हैं जो धीरे धीरे उघड़ती हैं और कहानी जब अपने अंत तक पहुंचती है बता जाती है कि आखिर देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या की साजिश कैसे रची गई होगी? ये फिल्म का क्लाइमेक्स ही था जिसने एक अच्छी खासी फिल्म का भविष्य बॉक्स ऑफिस पर चौपट कर दिया। फिल्म के न चलने का नतीजा ये हुआ कि शेखर कपूर और रामगोपाल वर्मा के साथ मिलकर मणिरत्नम ने जो अखिल भारतीय फिल्में बनाने की कंपनी इंडिया टॉकीज स्थापित की थी, उसका बीज अंकुरित होने के साथ ही मुरझा गया। फिल्म के लिए शाहरुख खान ने तो कहानी सुनते ही हां कर दी थी, लेकिन मनीषा कोइराला और प्रीति जिंटा के अपने किरदारों में फाइनल होने से पहले ये कहानी काजोल और रानी मुखर्जी की ड्योढ़ी भी पार कर आई थी। ‘लिरिल गर्ल’ प्रीति जिंटा का सिनेमा में डेब्यू वैसे तो फिल्म ‘सोल्जर’ से होना था, लेकिन रिलीज पहले ‘दिल से’ हो गई तो इसी को उनकी डेब्यू फिल्म माना जाता है। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।