क्लास ऑफ 83
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‘शूटआउट एट वडाला’ और ‘आणि… डॉ. काशिनाथ घाणेकर’ लिख चुके अभिजीत देशपांडे की ये कहानी मुख्य रूप से एक हारे हुए इंसान की कहानी है। विजय सिंह कहानी का नायक तो है, लेकिन हारा हुआ, वैसे ही जैसे ‘मदर इंडिया’ की राधा, ‘शोले’ का ठाकुर बलदेव सिंह और ‘दीवार’ का विजय वर्मा। ये सब अपनी जिंदगी में दुनिया की नजरों में हारे हुए लोग हैं। वह अपने परिवार की नजरों में हारे हुए लोग हैं। पूरी जिंदगी ये सब बस खो रहे हैं। यही फिल्म देखने वालों को लगता है और यही उनके आसपास बसी दुनिया के लोगों को लगता है। लेकिन, महबूब खान, यश चोपड़ा और रमेश सिप्पी की तरह अतुल सब्बरवाल का विजय सिंह अपने जीवन मूल्यों के हिसाब से अपनी जीत देखता है। ये नायक या प्रतिनायक अपनी नजरों में हीरो हैं। उन्हें दूसरों की परवाह नहीं है। जीवन ऐसा ही है। अच्छे लोग दुनिया की नजरों में लगातार हारते रहते हैं। पर इसके चलते वह अच्छा होना बंद थोड़े ही कर देते हैं। यही ‘क्लास ऑफ 83’ सिखाती है, बताती है, समझाती है।