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Collar Bomb review: ‘यूडली’ के बजट में ध्यानेश का सस्पेंस ड्रामा, आशा नेगी ने फिल्म में दिखाया असली कमाल

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कॉलर बम - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
Movie Review: कॉलर बम
लेखक: निखिल नायर
कलाकार: जिमी शेरगिल, आशा नेगी, स्पर्श श्रीवास्तव, राजश्री देशपांडे आदि।
निर्देशक: ध्यानेश जोटिंग
ओटीटी: डिज्नी प्लस हॉटस्टार
रेटिंग: **1/2

डिज्नी प्लस हॉटस्टार ने नई हिंदी फिल्मों को सीधे दर्शकों तक अपने ओटीटी प्लेटफॉर्म के जरिए पहुंचाने की जो शुरूआत फिल्म ‘दिल बेचारा’ से की थी, उसमें दर्शक की बेचारगी अभी तक कुछ खास कम हो नहीं सकी है। इस ओटीटी पर सीरीज कमाल की देखने को मिलती हैं। ‘लोकी’ की लुका छिपी चल ही रही है। उसके पहले ‘मेर ऑफ ईस्टटाउन’ ने दिल जीता। ‘ग्रहण’ की भी तारीफ खूब हुई। बस ये हिंदी फिल्म वाला गुणाभाग ठीक नहीं बैठ रहा। कहानी अच्छी होती है तो कलाकार ढीले और कलाकार उम्दा होते हैं तो पटकथा में सिनेमा में मार खा जा रहा है। अगले महीने ‘भुज द प्राइड ऑफ इंडिया’ पर सबकी निगाहें टिकी हैं, इस बीच ओटीटी ने जिमी शेरगिल की ये फिल्म ‘कॉलर बम’ धीमे से आगे खिसका दी है।
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कॉलर बम - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘कॉलर बम’ का विचार बहुत अच्छा है। प्लॉट भी इसकी राइटिंग टीम ने सही सजाया है। इसमें जो गड़बड़ी है वह ये कि इसको संभाल पाने के लिए जरूरी अचरज इसमें थोड़ा है। एक पुलिस अफसर है। औकात से बड़े स्कूल में उसने अपने बेटे का एडमिशन कराया है। वहां चल रही शोकसभा में भी लोग उसका गुणगान कर रहे हैं। उसका पुराना साथी इस पर सवाल भी उठाता है। उसे किसी तरह से आयोजन से बाहर किया ही जाता है कि वहां एक ताजा ताजा जवान हुआ आतंकवादी पहुंच जाता है। गले में पट्टा। पट्टे में बम। कॉलर बम। डायरी में पुलिस वाले का नाम लिखा है मतलब मामला पहले से सेट है। सेटिंग ये है कि पुलिस अफसर को अब कॉलर बम की टिकटिक बंद करने के लिए कुछ कांड करने हैं। वह कठपुतली बनता है। पब्लिक को मजा आता है। कठपुतली की डोर खींचने की वजह और डोर खींचने वाले हाथ जैसे ही साफ होते हैं, मजा किरकिरा हो जाता है।
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कॉलर बम - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
जो आपको दिखता है, सच वही हो जरूरी नहीं है। इसीलिए बार बार विद्वानों ने समझाया है कि सोचो, समझो और फिर आगे बढ़ो। फिल्म की अंतर्धारा भी यही है। इरादा नेक है। फिल्म का कथानक भी शुरू में नवीनता लिए दिखता है। लेकिन फिर वही सब। आतंकवादी है तो मुसलमान ही होगा। बाल शोषण की कहानी है तो ईसाई के घर में ही होगी। हिंदी सिनेमा के ये सब पुराने जुमले हैं। इसके अच्छे दिन तभी आएंगे जब कहानियां लिखने वाले कुछ नया सोच पाएंगे। ‘अंधाधुन’ जैसी नकल ही करनी है तो किसी अच्छे सिनेमा की करनी चाहिए। ध्यानेश जोटिंग के निर्देशन में पैनापन है। उनकी कैमरा प्लेसिंग और शॉट टेकिंग उम्दा है। बड़े कलाकार और अच्छी कहानी मिलने पर वह कमाल कर सकते हैं। यहां वह सारेगामा म्यूजिक कंपनी की ‘यूडली फिल्म्स’ की कठपुतली हैं।

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कॉलर बम - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
कमाल का काम इस फिल्म में किया है आशा नेगी ने। अनुराग बसु वाली ‘लूडो’ में वह अभिषेक बच्चन के साथ थीं, यहां वह जिमी शेरगिल के साथ हैं। 11 साल हो गए उनको भी कैमरे के सामने खुद को घिसते घिसते। अब हीरा बनकर निकली हैं। बहुत अच्छा काम किया है उन्होंने इस फिल्म में। ‘चिल्लर पार्टी’ वाले नमन जैन का काम भी ठीक ठाक है। स्पर्श श्रीवास्तव और राजश्री देशपांडे ने भी निर्देशक के हिसाब से एक्टिंग करने की कोशिश पूरी की है, बस स्पर्श का अनुभव अभी इतने गंभीर किरदार के लिए कम जान पड़ता है। फिल्म के लीड कलाकार जिमी शेरगिल हैं। बीते दिसंबर ही 50 के हुए जिमी ने अपनी तरफ से इस किरदार में जान डालने की मेहनत भी पूरी की है।
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कॉलर बम - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म की कमजोर कड़ियां इसकी लिखावट के साथ साथ इसकी सजावट (कला निर्देशन) और कॉस्ट्यूम्स भी हैं। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक अनावश्यक रूप से दिमाग में हथौड़े मारता है। सस्पेंस पैदा करने के लिए शोर नहीं सन्नाटा बेहतर काम करता है। वीकएंड पर फिल्म टाइमपास करने के लिए ठीक है लेकिन इसके निर्देशक ध्यानेश जोटिंग ने एक उम्मीद जगाई है कि मौका मिला तो वह बड़ा धमाका भी जरूर करेंगे। ‘कॉलर बम’ का योग भी कुल मिलाकर यही है।



 
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