20 अगस्त की तारीख हिंदी सिनेमा से इश्क करने वालों के लिए खास तारीख इसलिए है क्योंकि इसी दिन रिलीज हुई एक फिल्म से 16 साल पहले करीना कपूर और शाहिद कपूर का किस्सा हवाओं में तैरना शुरू हुआ। शाहिद कपूर के करियर की बतौर हीरो ‘फिदा’ दूसरी ही फिल्म थी और लोग उन्हें नोटिस करने लगे थे। इसी तारीख को 27 साल पहले मलयालम सिनेमा के सुपरस्टार मोहनलाल ने अपनी पहली हिंदी फिल्म के साथ उत्तर भारत में दस्तक दी थी, फिल्म का नाम था ‘धरतीपुत्र’। लेकिन, जिस फिल्म के लिए इस तारीख को हिंदी सिनेमा के कद्रदान सबसे ज्यादा याद रखते हैं, वह फिल्म है 21 साल पहले इसी तारीख को रिलीज हुई फिल्म ‘अर्जुन पंडित’।
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अर्जुन पंडित
- फोटो : Social Media
‘अर्जुन पंडित’ का उद्घोष
सनी देओल के करियर में ‘अर्जुन पंडित’ की गिनती उनकी सबसे खास हिट फिल्मों में होती है। लगातार फ्लॉप फिल्मों से जूझ रहे सनी देओल का करियर संवारने के अलावा इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा के एक काबिल निर्देशक राहुल रवैल का करियर भी उबारा था। राहुल रवैल को ये फिल्म तब मिली जब वह लगातार पांच फ्लॉप फिल्में दे चुके थे। फिल्म के निर्माता एन आर पचीसिया ने इसकी रिलीज के 21 साल पूरे होने पर बहुत ही प्यारे अंदाज में इसे याद किया। उन्होंने गुरुवार सुबह ट्विटर पर लिखा, ‘अर्जुन पंडित आज कानूनी रूप से बालिग हो गया। इस कल्ट फिल्म को रिलीज हुए 21 साल हो गए। इसकी याद अब भी एक शानदार अनुभव है और कितनी पावर पैक्ड थी ये। शानदार यादें!’
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अर्जुन पंडित
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
हरिद्वार में ऐसे हुई शूटिंग
एन आर पचीसिया को उनके करीबी लोग बबलू पचीसिया के नाम से भी जानते हैं। वह अपने निर्देशकों को अपनी फिल्म के साथ पूरी छूट देने के लिए जाने जाते हैं। फिल्म की दिसंबर के महीने में हरिद्वार में कड़ाके की ठंड में हुई शूटिंग को याद करते हुए वह बताते हैं, ‘बहुत ठंड थी उन दिनों। हम सब लोगों की तो हवा खराब रहती थी उस सर्दी में। लेकिन, सनी देओल को कोई फर्क नहीं पड़ता था। वह हमेशा पानी में छलांग लगाने के लिए रेडी रहते थे।’ तो फिल्म को हर की पौड़ी पर शूट करने में दिक्कतें तो बहुत आई होंगी? वह बताते हैं, ‘फिल्म की शूटिंग के लिए 300 बौद्ध भिक्षुओं का एक समूह हरिद्वार और देहरादून के रास्ते में स्थित एक भिक्षुगृह से रोज आता था। और, हर की पौड़ी पर वैसे ही दुनिया भर से हजारों लोग रोज आते ही रहते हैं तो वहां भीड़ बहुत होती थी। दो तीन दिन तो हमने वहां शूटिंग की लेकिन फिर हमने अपनी पूरी टीम गंगा नदी के दूसरे छोर पर बने वीआईपी घाट पर शिफ्ट कर दी। हमने ये फिल्म हरिद्वार, ऋषिकेश और देहरादून के इर्द गिर्द शूट की और इस दौरान हमें स्थानीय प्रशासन का भरपूर सहयोग मिला। कहीं कोई परेशानी नहीं हुई।’
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विकास दुबे फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
विकास दुबे को मिला ‘पंडित’ उपनाम
फिल्म ‘अर्जुन पंडित’ की शूटिंग के कुछ और किस्से भी एन आर पचीसिया ने बताए। कैसे फिल्म के लिए हुई रिवर राफ्टिंग की शूटिंग और कितनी मेहनत से सनी देओल ने की फिल्म के क्लाइमेक्स की शूटिंग? इसके बारे में बात करने से पहले आपको ये बता देते हैं कि ये फिल्म हाल फिलहाल में किस वजह से चर्चा में रही। कानपुर का चर्चित विकास दुबे कांड तो आपको पता ही होगा। आसपास के गावों और कस्बों में पंडित के नाम से चर्चित रहे विकास ने आठ पुलिसवालों का अपने साथियों के साथ कत्ल कर दिया था और खुद भी पुलिस एनकाउंटर में मारा गया। विकास ने फिल्म ‘अर्जुन पंडित’ अपने साथियों के साथ कोई सौ बार से भी ज्यादा बार देखी थी और इसी फिल्म की तरह खुद को पंडित कहलाने लगा था। बस, विकास की कहानी में निशा नहीं थी। फिल्म में अर्जुन पंडित को निशा का प्यार मिलता है और वह खुद को अपराध के दलदल में जाने से बचा लेता है।
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अर्जुन पंडित
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
कहानी बदले के बाद उमड़े प्यार की
फिल्म ‘अर्जुन पंडित’ की कहानी हरिद्वार में पढ़ाने वाले अर्जुन दीक्षित और बंबई की मॉडल निशा के बीच की गलतफहमियों की कहानी है। निशा पर होने वाले हमले से अर्जुन उसे बचाता है लेकिन निशा होशियारी से अर्जुन के हाथों इलाके के बड़े बदमाश का कत्ल करा देती है। जिस बदमाश का कत्ल होता है उसकी मां अर्जुन को छुड़ा लेती है। अर्जुन हरिद्वार से बंबई आता है और यहां बदमाशों के दो गुटों की आपसी राजनीति का शिकार हो जाता है। उसे समझ ही नहीं आता कि उसका इस्तेमाल किया जा रहा है। निशा उसकी जिंदगी में दोबारा लौटती है लेकिन दोनों के बीच की परेशानियां अभी खत्म नहीं होती। अर्जुन को अपना प्वाइंट साबित करना होता है, और इसे वह कर भी देता है। लेकिन अब निशा को लगता है कि उसे वाकई अर्जुन से प्यार हो गया है।
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लव स्टोरी
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अपराधियों की आपसी सियासत
राहुल रवैल के निर्देशन में बनी फिल्म ‘अर्जुन पंडित’ का स्क्रीनप्ले उन्हीं शिवकुमार सुब्रमण्यम ने लिखा, जिनके खाते में इससे पहले ‘परिंदा’, ‘1942 ए लव स्टोरी’ और ‘इस रात की सुबह नहीं’ जैसी फिल्में दर्ज हैं। अगर इस फिल्म को देखते समय राहुल रवैल की ही फिल्म ‘अर्जुन’ को ध्यान में रखा जाए तो पता चलता है कि दोनों ही फिल्मों में अपराध की अंदरूनी राजनीति को बहुत ही चतुराई के साथ स्क्रीनप्ले में पिरोया गया है। अपराधियों के दो गुटों के बीच होने वाले शह और मात के इस खेल का आइडिया ‘अर्जुन’ लिखते समय जावेद अख्तर को अखबार में छपी एक खबर देखकर आया था। उस सुबह वह राहुल रवैल के साथ ही थे लोनावला में, जहां दोनों फिल्म की स्क्रिप्ट को लेकर मंथन करने गए हुए थे। राहुल रवैल के नाम हिंदी सिनेमा के तमाम दिलचस्प किस्से दर्ज हैं। उन पर विस्तार से फिर कभी, लेकिन फिलहाल के लिए एक किस्सा उनकी बतौर निर्देशक रिलीज हुई पहली फिल्म ‘लव स्टोरी’ से।
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राज कपूर के साथ राहुल रवैल
- फोटो : अमप उजाला, मुंबई
राज कपूर को देख निर्देशक बने रवैल
राहुल रवैल और ऋषि कपूर गहरे दोस्त रहे हैं। राहुल रवैल के पिता एस एस रवैल की बनाई फिल्म ‘लैला मजनू’ ने ऋषि कपूर को स्टारडम की नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया था। राहुल रवैल का मन शुरू से न्यूक्लियर साइंटिस्ट बनने का था और उन्होंने इसके लिए विदेश जाने की तैयारियां भी कर ली थीं। लेकिन, ऋषि कपूर के साथ एक ‘मेरा नाम जोकर’ के सेट पर जाना उनके लिए जिंदगी का एक अलग ही सबक लेकर आया। राहुल रवैल ने वहां राज कपूर को एक साथ सैकडों की यूनिट को नियंत्रित करते देखा तो उनका मन बदल गया। वह राज कपूर के लंबे समय तक असिस्टेंट रहे। और अपनी पहली कामयाब फिल्म भी उन्होंने ‘लव स्टोरी’ ही बनाई। पर, फिल्म के हीरो कुमार गौरव के पिता और फिल्म के निर्माता राजेंद्र कुमार से उनकी ऐसी खटकी कि उन्होंने फिल्म के टाइटिल्स से अपना नाम ही वापस ले लिया।
सनी और राहुल दोनों को मिला जीवनदान
ऐसे जिद्दी राहुल रवैल ने ही सनी देओल और अमृता सिंह की पहली फिल्म ‘बेताब’ भी निर्देशित की। और जब सनी देओल और राहुल रवैल दोनों का करियर डगमगा रहा था तो निर्माता एन आर पचीसिया ने इन दोनों को जिस फिल्म के लिए एक साथ साइन किया वह फिल्म बनी हिट फिल्म ‘अर्जुन पंडित’। 1997 में रिलीज हुई एन आर पचीसिया निर्मित फिल्म ‘जिद्दी’ के बाद सनी देओल की सोलो हीरो दो साल तक तमाम फिल्में एक के बाद एक फ्लॉप होती गईं, लेकिन ‘अर्जुन पंडित’ ने जो उनका करियर संवारा तो इसके बाद सनी देओल ने सीधे साल 2001 में ‘गदर’ मचा दिया।
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अर्जुन पंडित
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
शानदार कलाकार, दिलचस्प किरदार
फिल्म ‘अर्जुन पंडित’ में सनी देओल ने तो अपनी शोहरत के हिसाब से कमाल का काम किया ही, जूही चावला ने भी निशा के किरदार में फिल्म में चार चांद लगा दिए। उनके चेहरे का भोलापन उनके किरदार के लिए शुरू में जरूरी काइयांपन को भी छिपा ले गया। और, लोगों को जूही के किरदार का ये ट्विस्ट काफी चौंकाने वाला लगा। फिल्म से एक दमदार कलाकार यशपाल शर्मा ने अपना करियर शुरू किया। अर्जुन के दोस्त शिवा के किरदार में यशपाल शर्मा अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहे। रामू कालिया के रोल में मुकेश ऋषि ने खलनायकी में अपना जबर्दस्त दमखम दिखाया। इसी साल रिलीज हुई जॉन मैथ्यू मथान की फिल्म ‘सरफरोश’ में सलीम के किरदार में भी मुकेश ऋषि के अभिनय की खूब तारीफ हुई। लेकिन, रामू कालिया के किरदार ने मुकेश के करियर का रंग ही बदल दिया। इसके बाद तेलुगू सिनेमा में उन्हें एक से बढ़कर एक खलनायकों के किरदार मिले और एक समय ऐसा भी आया जब वह तेलुगू फिल्म इंडस्ट्री के सबसे महंगे खलनायकों में गिने जाते थे। फिल्म का संगीत भी अपने समय के हिसाब से अच्छा था।
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अर्जुन पंडित
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
दलेर महेंदी का ‘कुड़ियां शहर दियां..’
कुमार शानू और अलका याग्निक का गाया गाना ‘ओ प्रिया’ तो लोगों को पसंद आया ही, फिल्म ‘मृत्युदाता’ के बाद उस वक्त के उभरते गायक दलेर मेहंदी ने इस फिल्म में भी लोगों को अपनी धुन पर खूब नचाया।
चलते, चलते...
और, चलिए फिर से मैं आपको लेकर चलता हूं वहीं जहां मैंने फिल्म ‘अर्जुन पंडित’ की शूटिंग का किस्सा छोड़ा था। फिल्म के निर्माता एन आर पचीसिया बताते हैं, ‘फिल्म की कड़ाके की ठंड में हुई शूटिंग के दौरान ही हमने रिवर राफ्टिंग के सीन भी शूट किए। ये ऐसी शूटिंग थी जिसमें हमें वहां के स्थानीय लोगों ने खूब मदद की। फिल्म के स्टंट डायरेक्टर टीनू वर्मा को इन लोगों ने काफी मदद की। लेकिन फिल्म का सबसे मुश्किल सीन रहा फिल्म की क्लाइमेक्स सीक्वेंस का वो सीन जिसे हमने मुंबई में रेलवे के सेंट्रल यार्ड में शूट किया। इस सीन में सनी देओल और जूही चावला को ट्रेन गुजरने के दौरान उसके नीचे बैठना था और शूटिंग के दौरान बार बार इस हालत में जाकर वहां बैठना बहुत ही तकलीफ देह था।’ एक खास बात यहां ये भी बतानी जरूरी लगती है कि ‘अर्जुन पंडित’ नाम की एक फिल्म 1976 में भी रिलीज हो चुकी है, जिसके निर्देशक थे ऋषिकेश मुखर्जी और जिसमें मुख्य भूमिकाएं निभाईं थीं अशोक कुमार, संजीव कुमार और विनोद मेहरा ने। संजीव कुमार को इस फिल्म के लिए बेस्ट एक्टर का फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला था। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।