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Bioscope S2: ‘एक दूजे के लिए’ ने पूरे किए 40 साल, राज कपूर की मानते तो इतनी बड़ी हिट नहीं होती फिल्म

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फिल्म एक दूजे के लिए का पोस्टर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
अपनी धुन के पक्के गायक रहे एस पी बालासुब्रमण्यम को कोरोना ने असमय ही बीते साल हमसे छीन न लिया होता तो वह चार जून को अपना 75वीं सालगिरह मना रहे होते। आज उनकी याद आई हिंदी सिनेमा को उनकी बिल्कुल अलग सी आवाज से परिचित कराने वाली फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ की 40वीं सालगिरह को लेकर। अमेरिका में थे एसपी जब उनके पास फोन पहुंचा कि वापसी की फ्लाइट उन्हें वाया बंबई बुक करानी है। एसपी आए। निर्देशक के बालाचंदर उन्हें लेकर संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के पास पहुंचे और उनका उच्चारण देखकर एलपी ने उन्हें रिजेक्ट कर दिया।

फिर मो. रफी के गानों से बनी बात के बालाचंदर ने लक्ष्मी-प्यारे को समझाया कि फिल्म का हीरो वासू भी हिंदी नहीं जानता है। तो उसके हिंदी बोलने में दिखने वाली दिक्कतें एसपी की गायिकी में हिंदी को लेकर जो थोड़ी बहुत कमियां हैं उन्हें ढक लेंगी। पर एलपी फिर भी नहीं माने। उन्होंने एस पी बालासुब्रमण्यम का टेस्ट लेने की ठानी। कहा, कोई सेमीक्लासिकल गाना सुनाओ। आंखें बंद कर एसपी ने ध्यान लगाया। नौशाद का संगीतबद्ध किया फिल्म ‘मेरे महबूब’ का मोहम्मद रफी का गाया शीर्षक गीत एसपी ने साधा तो एलपी सचेत हुए। गाना खत्म हुआ तो एक और गाने की फरमाइश, इस बार कहा गया कि कोई साधारण गीत सुनाओ। एसपी मुस्कुराए। इस बार जो गाना उन्होंने चुना वह भी मोहम्मद रफी का ही गाना था। लेकिन, इस बार संगीतकार थे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल। फिल्म ‘दोस्ती’ और गाना! ‘जानेवालों जरा मुड़के देखो इधर....!’ कम लोग ही जानते होंगे कि एसपी ने गायिकी को अपना करियर मो.रफी के गाने सुनकर ही बनाया। और, अपनी पहली ही हिंदी फिल्म में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत ले गए। इस गाने पर।

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फिल्म एक दूजे के लिए का दृश्य - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
गुरु चेले की कालजयी जोड़ी
फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ में एसपी बालासुब्रमण्यम की एंट्री का किस्सा जितना रोचक है, उतनी ही मोहक रही इसकी बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी की कहानी। तमिल सिनेमा के मशहूर निर्देशक के बालाचंदर ने साल 1973 में एक नए हीरो कमल हासन को अपनी फिल्म ‘अरंगेत्रम’ में लॉन्च किया। बचपन से लेकर जवानी तक कमल हासन ने फिल्मों में खूब काम किया लेकिन हीरो वह इसी फिल्म से बने। तमिल में खूब नाम चमका तो पड़ोस में तेलुगू फिल्में बनाने वाले कमल हासन के चक्कर लगाने लगे। रोज उनके पास लोग पहुंच जाते किसी न किसी नई कहानी का प्रस्ताव लेकर। और, कमल हासन ने भी एक दिन सबको बोल ही दिया, मेरी तेलुगू फिल्म बनेगी तो सिर्फ के बालाचंदर के साथ। कमल हासन ने बोल तो दिया लेकिन के बालाचंदर से पूछ के थोड़े ही बोला था।
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फिल्म एक दूजे के लिए का दृश्य - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
कमल हासन की पहली तेलुगू फिल्म की रीमेक
के बालाचंदर ने इसी के बाद कहानी तैयार की। एक तमिल लड़का और एक तेलुगू लड़की। दोनों की प्रेम कहानी। फिल्म का नाम ‘मारो चरित्रा’ यानी एक और इतिहास। हीरो कमल हासन, हीरोइन एक स्कूल में पढ़ने वाली गुमनाम सी लड़की अभिलाषा। उसका नाम रखा गया सरिता। फिल्म में तेलुगू की ही उभरती स्टार माधवी को भी लिया गया। बालाचंदर ने एक कमाल और किया। पूरी फिल्म उन्होंने ब्लैक एंड व्हाइट में शूट कर डाली, ये दिखाने के लिए कहानी अच्छी हो तो उसके एहसासों के रंग के आगे दुनिया के सारे रंग फीके हैं। फिल्म सुपर हिट रही। कमल हासन तमिल और मलयालम के सुपरस्टार थे ही अब वह तेलुगू के भी हिट हीरो बन गए। पूरी फिल्म तेलुगू में और वह बोलते रहे तमिल। कमल हासन की इस डेब्यू तेलुगू फिल्म की ही रीमेक बनी फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ के रूप में।

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फिल्म एक दूजे के लिए का पोस्टर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
जब राज कपूर ने डरा दिया
मशहूर फिल्म निर्माता एल वी प्रसाद ने ‘मारो चरित्रा’ के रीमेक राइट्स खरीदे और ओरीजनल के ही निर्देशक के बालाचंदर के हवाले ये हिंदी फिल्म भी कर दी। एल वी प्रसाद को फिल्म के प्रीमियर तक लोगों ने तमाम तरह की सलाहें दीं। निर्देशक के बालाचंदर के पास तो तब उनके असिस्टेंट रहे निर्देशक सुरेश कृष्णा ने आधी रात को फोन लगा दिया था। वजह ये थी कि फिल्म का मुंबई में प्रीमियर होने के बाद होटल में पार्टी रखी गई। वहां कमल हासन के दोनों हाथ राजकपूर ने चूम लिए थे। लेकिन थोड़ी ही देर बाद वह निर्देशक को तलाश करने लगे। पता चला कि निर्देशक तो नहीं है लेकिन सुरेश कृष्णा को लेकर लोग राज कपूर के पास पहुंच गए। राज कपूर का मानना था कि फिल्म का क्लाइमेक्स सुखांत होना चाहिए। के बालाचंदर को ये बात पता चली तो उन्होंने कहा कि फिल्म देखने के बाद जो टीस राज कपूर के मन को परेशान किए हुए है, वही टीस जब दर्शकों के मन में भी उठेगी तो फिल्म सुपरहिट होगी। हुआ भी यहीं, गिनती के प्रिंट्स के साथ रिलीज हुई फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ रविवार से ही रफ्तार पकड़ने लगी। और अगला शुक्रवार आते आते फिल्म के पांच गुना प्रिंट और सिनेमाघरों तक पहुंच चुके थे। फिल्म दो दो साल तक सिनेमाघरों में लग रही। वासू और सपना का नाम लैला मजनू, शीरीं फरहाद और हीरा रांझा की कहानियों की तरह युवाओं के किस्सों में तैरने लगा।

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फिल्म एक दूजे के लिए का दृश्य - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
कहानी उत्तर और दक्षिण के प्यार की
फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ कहानी थी एक उत्तर भारतीय परिवार की लड़की सपना और एक तमिल लड़के वासू की। दोनों के परिवार गोवा में पड़ोसी हैं। दोनों का प्यार घरवालों को पता चलता है तो तूफान आ जाता है। मोबाइल और इंटरनेट टाइप की चीज तब दुनिया में आई नहीं थी तो घर वालों ने शर्त ये रखी कि अगर दोनों पूरा एक साल बिना एक दूसरे से किसी भी तरह का संपर्क किए बिता लेंगे तभी दोनों की शादी हो सकेगी। वासू हैदराबाद चला जाता है। रोज सपना को एक खत लिखता है लेकिन पोस्ट नहीं करता। एक विधवा युवती संध्या से हिंदी भी सीखने की कोशिश करता है। संध्या उसे भरतनाट्यम भी सिखाती है। फिर वासू और सपना में गलतफहमियां होती हैं। वासू की संध्या से शादी तय होती है। सपना को पता ही नहीं होता कि उसकी तरफ के लोगों ने क्या गुल खिला दिया है। वासू और सपना के चटकीले प्रेम पर हालात के काले बादल घिर आते हैं और जब तक आसमान साफ हो बहुत देर हो चुकी होती है।
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फिल्म एक दूजे के लिए का दृश्य - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
रति अग्निहोत्री ने सुनाया रोचक किस्सा
फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ में सपना की मां बनी थी शुभा खोटे। अपनी बेटी के जीवन से वासू की यादें मिटाने के लिए सपना की मां जो कुछ कर सकती थी, सब उसने किया। टेप रिकॉर्डर में बजने वाली वासू की आवाज मिटाने को टेप तोड़ दिया तो सपना पूरे कमरे में वासू का नाम दीवारों पर लिख देती है। फोटो जला दी तो सपना ने उसकी भस्म चाय में डालकर पी डाली। और ये सीन रति अग्निहोत्री शूटिंग के वक्त असल में भी कर डाला था। जी हां, इस वनटेक शॉट में रति ने फोटो की भस्म वाली चाय असल में पी डाली थी। बिना ये जाने कि चाय में फोटो की कालिख जहर भी घोल सकती है। गनीमत रही कि उन्हें कुछ हुआ नहीं। ऐसे हैरतअंगेज कारनामे रति अग्निहोत्री ने फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ में और भी किए। कमल हासन उन दिनों के बालाचंदर के साथ निर्देशन भी सीखा करते थे। कोरियोग्राफी भी वह अपनी फिल्मों की कर लेते थे। फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ में एक सीन है जहां कमल हासन लट्टू नचाकर रति अग्निहोत्री की नाभि के पास उनके पेट पर छोड़ देते हैं। रति बताती हैं, ‘ये सीन कमल हासन ने खुद रचा। उस दिन गोवा में गजब की गर्मी थी। तापमान करीब 40 डिग्री के करीब था और मैं तपती बालू पर लेटकर पेट पर नाच रहे लट्टू वाला शॉट दे रही थी।’
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फिल्म एक दूजे के लिए का पोस्टर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
बॉक्स ऑफिस पर मनोरंजन की क्रांति
फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ ने साल 1981 में कामयाबी का ऐसा झंडा गाड़ा कि लोग हैरान रह गए। ये वो साल है जिस साल मनोज कुमार की क्रांति साल की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर बनी थी। फिल्म फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ ने हिंदी सिनेमा को कई नए चेहरे दिए। इसके लीड कलाकार कमल हासन, रति अग्निहोत्री और माधवी तीनों साउथ की फिल्मों के जाने पहचाने चेहरे थे और तीनों की ये पहली हिंदी फिल्म थी। उत्तर प्रदेश के बरेली में जन्मी रति अग्निहोत्री तो इस फिल्म के बाद इतना मशहूर हुईं कि उनकी तीन साल में तीस से ज्यादा फिल्में रिलीज हो गईं। इसी फिल्म से नेपाल के अभिनेता सुनील थापा ने भी अपना करियर शुरू किया। गायक एस पी बालासुब्रमण्यम का किस्सा मैं शुरू में ही बता चुका हूं। कम लोगों को ही पता होगा कि एसपी न सिर्फ कमाल के गायक थे बल्कि बहुत अच्छे अभिनेता औऱ डबिंग आर्टिस्ट भी थे। कमल हासन की जितनी भी फिल्में तमिल से तेलुगू में डब होकर रिलीज हुई हैं, सब में उनकी डबिंग एसपी ने ही की। फिल्म एक दूजे के लिए के गाने ‘तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बंधन अनजाना’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ गायक का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला। इसी गाने को लिखने के लिए आनंद बक्षी ने जीता था बेस्ट लिरिसिस्ट का फिल्मफेयर पुरस्कार।

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फिल्म एक दूजे के लिए का दृश्य - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
आनंद बक्षी की बेमिसाल कलमकारी
फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ के गानों में गीतकार आनंद बक्षी ने प्रेम का शायद ही कोई एहसास हो जो न लिखा हो। गोवा के बीच पर मोटरसाइकिल पर बैठे वासू सपना जब प्रेम के सबसे असीम आनंद के पास होते हैं तो के बालाचंदर अगले सीन में वासू को एक लट्टू नचाता दिखाते हैं, जो नाच रहा होता है सपना के पेट के ऊपर। पूरे जमाने की जवानी इन गानों पर तब लट्टू हो गई थी। फिल्म में आनंद बक्षी की लिखावट का एक नमूना देखिए,
मिलते रहे यहां हम, ये है यहां लिखा

इस लिखावट की ज़ेर ओ ज़बर को सलाम

साहिल की रेत पर यूं लहरा उठा ये दिल

सागर में उठने वाली हर लहर को सलाम..!

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फिल्म एक दूजे के लिए का दृश्य - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
चलते चलते...
‘सोलह बरस की बाली उमर को सलाम’ गाने की शूटिंग करते जब ‘ज़ेर ओ ज़बर’ का ज़िक्र आया तो के बालाचंदर ने एकदम से शूटिंग रोक दी। पूछने लगे कि ये ज़ेर ओ ज़बर मतलब क्या होता है। पूरी यूनिट में किसी को नहीं पता। ये हुआ कि गीतकार को बुलाओ। अब शूटिंग गोवा में चल रही। आनंद बक्षी मुंबई में नहीं। उनकी खोजबीन शुरू हुई तो पता चला कि वह हैदराबाद में हैं। के बालाचंदर ने आनंद बक्षी को हैदराबाद से गोवा बुलवा लिया सिर्फ ये समझने के लिए इस शब्द के जो मायने हैं, गाना उनके हिसाब से शूट हो रहा है कि नहीं। इतनी बारीकी से काम हो और मशहूर न हो, भला कैसे हो सकता है। ये और बात है कि फिल्मफेयर वालों पर उन दिनों आर्ट फिल्मों का झंडाबरदार बनने का शौक चर्राया था और अगले साल के फिल्मफेयर पुरस्कारों में 13 नॉमीनेशन हासिल करने के बाद इस फिल्म की झोली में सिर्फ तीन पुरस्कार गिरे। जिसमें से एक अवार्ड मिला फिल्म की शानदार एडीटिंग के लिए एन आर किट्टू को। के बालाचंदर को मिला पुरस्कार बेस्ट स्क्रीनप्ले का। फिल्म में बी एस लोकनाथ की सिनेमैटोग्राफी भी लाजवाब रही।


(‘बाइस्कोप’ कॉलम में प्रकाशित यह आलेख बौद्धिक संपदा अधिकारों के तहत संरक्षित हैं।)
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