बिच्छू का खेल
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
हिंदी सिनेमा में अपराधकथाओं के उपन्यासों पर फिल्में बनाने का सिलसिला भी काफी पुराना है। शशिलाल नायर ने 1985 में वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यास ‘बहू मांगे इंसाफ’ पर नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, राकेश रोशन और सुप्रिया पाठक को लेकर फिल्म बनाई थी, ‘बहू की आवाज’। लल्लू जगधर सब बहुत बाद की बातें हैं। एकता कपूर ने काम ये बढ़िया किया कि ओरीजनल राइटर को भी इसका क्रेडिट दिया और नए लेखक भी काम पर लगाए। बस इसमें गालियां की मात्रा कम कर दी जाती तो ये सीरीज इस सीजन की बेहतरीन क्राइम सीरीज हो सकती थी। दिव्येंदु से लोग अब ‘मिर्जापुर’ से आगे बढ़ने की उम्मीदें बांधने लगे हैं। लेकिन, उनको लगता है कि गालियां ही ‘इक्कीस तोपों की सलामी’ देंगी। 37 के हो चुके दिव्येंदु भले कहते हों कि ओटीटी पर सेंसरशिप बेवकूफी भरी बात है। लेकिन, जिस रफ्तार से वह अपनी सीरीज में गालियां देते हैं, लगता नहीं कि ऐसा कोई किरदार उन्होंने असल जीवन में देखा भी होगा।