मुम्भाई
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
वेब सीरीज ‘मुम्भाई’ जितने हिस्सों में बंटी है, उसमें बीच बीच में शरद केलकर की आवाज कहानी की कड़ियां पिरोती चलती है। लेकिन, किसी अपराध कथा में वॉयस ओवर करके अगर बताना पड़े कि कहानी किधर जा रही है तो फिर इससे तो पटकथा की कमजोरी ही जाहिर होती है। परदे पर जो करके नहीं दिखाया जा सकता, उसे पटकथा में रखने की जरूरत ही नहीं है। अपूर्व लखिया ने अपने साथ लेखकों की जो टीम खड़ी की है, वह दाएं बाएं भटकती रहती है। माहौल जरूर बढ़िया सेटअप करती है ये टीम लेकिन एक कड़ी से दूसरी कड़ी तक जाने के लिए जिस तरह के सहज प्रवाह की जरूरत ऐसी कहानियों में होती है, उसे ये टीम पकड़ नहीं पाई। अपराधियों और पुलिस के बीच की भागदौड़ को परदे पर उसके पूरे तनाव के साथ न दिखा पाना सीरीज की दूसरी कमजोर कड़ी है। ऐसी सीरीज रीयल लोकेशन पर जितनी ज्यादा शूट की जाए, उतनी ही दमदार रहती है। लेकिन, यहां लगता है कि जैसे बस सीरीज छाप देनी है।