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Apna Adda 05: आगरा के मयंक को शहर की कबूतरबाजी ने दिलाई शोहरत, कैमरे से देखा मनोरंजन का नया आसमान

Wed, 31 Jan 2024 10:17 AM IST
ज्योति राघव अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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मयंक त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला
फिल्म इंडस्ट्री के दरवाजे सबके लिए खुले हैं। मेहनत, धैर्य और ईमानदारी के साथ अगर काम किया जाए तो सफलता जरूर मिलती है। ‘अपना अड्डा’ सीरीज में हम छोटे शहरों से मुंबई आए ऐसे कलाकारों से अपने पाठकों को मिलवाते हैं, जिनकी कहानी उनके लिए प्रेरणा बने। आगरा के रहने वाले मयंक त्रिपाठी ने इंडस्ट्री में अपनी मेहनत के बल पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है। ‘अपना अड्डा’ की पांचवीं कड़ी में एक बातचीत सिनेमैटोग्राफर मयंक त्रिपाठी से।
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मयंक त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म इंडस्ट्री में क्या बनने का सपना लेकर आए?
मैं आगरा का रहने वाला हूं। मेरे पापा अशोक त्रिपाठी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में रहे। पापा की पोस्टिंग की वजह से हम लोग काफी जगह घूमते रहे। पापा की आखिरी पोस्टिंग पूना में हुई और हम लोग वहीं शिफ्ट हो गए। पापा चाह रहे थे कि मैं आईआईटी करके इंजीनियर बनूं या फिर आर्मी ज्वॉइन करूं लेकिन मुझे सिनेमैटोग्राफर बनना था। उन्होंने कभी इसका विरोध भी नहीं किया और मैंने मुंबई आकर जीमा इंस्टीट्यूट से सिनेमेटोग्राफी में कोर्स किया। 
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मयंक त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
पहला मौका कैसे मिला ?
सबसे पहला मौका मुझे बालाजी टेलिफिल्म्स के सीरियल 'कहानी घर घर की' में सहायक निर्देशक के तौर पर साल 2006 में मिला। जीमा इंस्टीट्यूट से सिनेमेटोग्राफी की कोर्स करने के बाद मैं काम ढूंढ रहा था, लेकिन कैमरे का काम नहीं मिला। उस समय आशीष श्रीवास्तव इस धारावाहिक का निर्देशन कर रहे थे। रोज के 100 रुपये आने जाने के खर्चे के लिए मिलने की बात हुई थी, वह कभी मिलते तो कभी नहीं मिलते। मुझे लगा कि ऐसे तो गुजारा नहीं होगा। आठ महीने काम करने के बाद ही मेरा मन वहां से भर गया।
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मयंक त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिर उसके बाद..
उस समय एक चैनल प्ले टीवी शुरू हो रहा था। मैंने 2007 में वहां 22 हजार रुपये महीने की नौकरी शुरू की। प्ले चैनल में मेरे पास रोज लाइव शो शूट करके करने का काम था, लेकिन इस काम में भी मेरा मन नहीं लगा और मैंने छह महीने बाद नौकरी छोड़ दी।
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मयंक त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
22 हजार रुपये की नौकरी छोड़ना आपको जोखिम भरा नहीं लगा? 
बहुत जोखिम भरा था लेकिन एक जैसा काम मुझसे रोज नहीं हो पाता था। किसी ने कहा न्यूज चैनल में नौकरी कर लो, तो मैंने एक न्यूज चैनल में 2008 में नौकरी कर ली। लेकिन तीन महीने तक उन लोगों ने वेतन ही नहीं दिया। इसी बीच मेरा अपने बैच के कुछ मित्रों से फिर संपर्क हुआ और उन्होंने क्रूज पर फोटोग्राफी के मौके के बारे में बताया। मैंने आवेदन किया और मुझे चुन लिया गया।
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मयंक त्रिपाठी, करण जौहर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
क्रूज पर फोटोग्राफी करने का अनुभव कैसा रहा?
बहुत ही बढ़िया अनुभव रहा। पहली बार अमेरिका गया। वहां मेरी ट्रेनिंग हुई और मुझे पहली बार क्रूज टूर के साथ अंटार्कटिका भेज दिया गया। मैं नौ महीने क्रूज पर रहा, लेकिन मैं पूरी तरह से शाकाहारी हूं और वहां खाने में सब मांसाहार ही होता था। दूध, जूस, फल और सलाद के सहारे मैंने वहां नौ महीने गुजारे। दोबारा जाने का मौका भी मिल रहा था लेकिन मुझे लगा कि सिनेमैटोग्राफर बनने का मेरा सपना पीछे छूट रहा है।
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मयंक त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
उसके बाद..?
मुझे 2010 में जीटीवी में डायरेक्टर ऑफ फोटोग्राफी (डीओपी) की नौकरी मिल गई। रोज बड़े बड़े स्टार आते थे उनके इंटरव्यू शूट करता था। वहां मैंने सात साल तक लगातार काम किया। और, मैं यह सोचता रहा कि फिर से सैलरी के चक्कर में फंस गया। उसी समय कोमल नाहटा से मेरे बहुत अच्छे संबंध हो गए। उनसे फिल्मों को लेकर बहुत अच्छी बात होती थी। जब वह फिल्मों का विश्लेषण करते थे, तब मेरी समझ में आया कि फिल्मों को देखने का उनका नजरिया कैसा है और मेरा नजरिया कैसा है। उसी दौरान मेरी मुलाकात हर्षवर्धन त्यागी और मुकुल पुरी से हुई। हमने मिलकर विचार किया कि हमें कुछ बनाना चाहिए, ऐसे हमें कोई ब्रेक नहीं देगा। 

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'बिल्लूस फ्लाइट' - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
क्या बनाया फिर आपने?
हमने दो महीने के अंदर एक स्क्रिप्ट तैयार की। जब मैं आगरा में जाता था तो वहां देखा कि कुछ मुस्लिम लोग अपनी अपनी छत से कबूतर उड़ा रहे हैं और वे कबूतर आपस में घुलमिल जाते थे। कबूतरबाजी की यह प्रतियोगिता मुझे बहुत अच्छी लगी। मैने इसी विषय पर 30 मिनट की शॉर्ट फिल्म 'बिल्लूस फ्लाइट' बनाई। अमेरिका में इस फिल्म को बेस्ट शॉर्ट फिल्म का अवॉर्ड मिला और जिन्होंने मुझे बेस्ट शॉर्ट फिल्म का अवॉर्ड दिया वह अमेरिका के बहुत बड़े रईस थे। उनसे मैं काफी प्रभावित हुआ और मैंने उन पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाई। 
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मयंक त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कौन सी डाक्यूमेंट्री थी वह?
उत्तर प्रदेश में आजमगढ़ के रहने वाले फ्रैंक इस्लाम की अमेरिका बहुत बड़ी आईटी कम्पनी थी जिसे बेचकर उन्होंने बहुत पैसा कमाया। उनकी यात्रा मुझे बहुत दिलचस्प लगी और उन पर मैंने पहली डाक्यूमेंट्री 'दोज हू डिड इट' बनाई। उस डाक्यूमेंट्री के लिए अमेरिका में ही जी टीवी से बात की तो उन्होंने सुझाव दिया कि यह आठ एपिसोड की सीरीज होनी चाहिए। मेरे लिए बहुत मुश्किल था यह ढूंढना कि भारत से ऐसे और कौन लोग है जो वहां गए और अपनी एक अलग जगह बनाई। एक दोस्त की मदद से बाकी सात लोगों को ढूंढ लिया और आठ एपिसोड की पूरी सीरीज बना दी। यह सीरीज बहुत हिट हुई। उसके बाद अमेरिका में ही वायकॉम 18 के लिए 'नजराना डायरीज' नाम से एक सीरीज बनाई। अभी इसका पांचवा सीजन चल रहा है। 
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