मथुरा की यादें
अपने शहर मथुरा की याद करते हुए वीरेंद्र सक्सेना भावुक हो जाते हैं। वह कहते हैं, 'आज मथुरा बहुत भव्य हो गया है। मथुरा में मैं बहुत सारे काम करता था। बांसुरी बजाना, गीत गाना, लिखना, इस तरह से काफी चीजें किया करता था। लोग जानते थे कि मैं कलाकार आदमी हूं, हंसी मजाक करने वाला, हमेशा खुश रहने वाला। लोग अपने साथ रखने की कोशिश करते थे। लोग कहते थे मुझे एक्टर बन जाना चाहिए। लेकिन मैं तो नौकरी के लिए ही कोशिश कर रहा। लेकिन वह भी नहीं हो पा रहा था। परीक्षाएं दीं। इंटरव्यू तक भी पहुंचा लेकिन बात बनी नहीं। बनती भी कैसे, यूपी के छोटे शहरों में आठवीं में आने के बाद तो हमें एबीसीडी सिखाई जाती थी।’
दिल्ली में मिला पहला ब्रेक
कुछ करने की चाहत वीरेंद्र सक्सेना को दिल्ली ले आई। वह बताते हैं, 'एक दिन अपने दोस्त दिलीप चौधरी के साथ मैं मथुरा छोड़कर दिल्ली चला आया। रहना खाना उन्हीं के यहां मिला और एक नौकरी भी मिल गई। एनएसडी में किसी से मिलने गया तो वहां नाटक 'इन्ना की आवाज' में पहला मौका मिला। लोगों ने पसंद करना शुरू किया तो मुझे लगा कि यही तो हम चाहते थे। मैंने नौकरी छोड़ दी। मेरे बड़े भाई के दोस्त दिनेश अग्रवाल ने इसके बाद अपने घर पर मुझे ठिकाना दिया। बड़े भाई राजेंद्र स्वरूप सक्सेना एलआईसी में काम करते थे उन्हें वहां 500 रुपये मासिक वेतन मिलता था जिसमें से सौ रुपये वह मुझे भेज देते थे। फिर पोस्टर वगैरह बनाने लगा। यहां वहां करते करते जिंदगी चल निकली।’
नया थिएटर ग्रुप बनाया
दिल्ली में रहते हुए वीरेंद्र सक्सेना को 'इन्ना की आवाज' में जो काम मिला, वह उन्हें बरास्ता अनिल चौधरी चर्चित नाट्यकर्मी एम पी रैना तक ले गया। वीरेंद्र बताते हैं, ‘हमने 'प्रयोग' नाम की एक संस्था बनाई और एक स्ट्रीट प्ले किया 'जुलूस'। इसके हमने करीब 500 शोज किए। मुझे लगता है कि थियेटर करने वाले को स्ट्रीट प्ले जरूर करना चाहिए। इससे आपके अंदर का डर खत्म होता है। उस समय सुधीर मिश्रा, उनके भाई सुधांशु, विनोद दुआ जैसे काफी जाने पहचाने चेहरे हमारे ग्रुप में थे। बाद में एम पी रैना के साथ कुछ लोगों की वजह से गलतफहमी हो गई तो हमने अपना एक नया ग्रुप 'संभव' बना लिया।’
‘तमस’ के जरिये बदली किस्मत
नाटकों के जरिये अपनी पहचान बनाने में सफल रहे वीरेंद्र सक्सेना को दिल्ली में रहते हुए ही फिल्मों में काम मिलना शुरू हो गया और फिर आया उनके करियर का टर्निंग प्वाइंट यानी कि गोविंद निहलानी का बुलावा 'तमस' के लिए। वीरेंद्र बताते हैं, ‘मुझे 'तमस' के बाद तुरंत मुंबई आ जाना चाहिए था। जब मैं दो साल बाद आया तो मुझे पता चला कि यहां मेरी तलाश इस बीच खूब होती रही। लेकिन तब न कोई समझाने वाला था और न ही मुझे ही इतनी समझ थी। धीरे धीरे ये बात समझ में आई कि सिर्फ थियेटर करके जीवनयापन मुश्किल है। मुंबई में मुझे वसंत चौधरी के घर ठिकाना मिला। मुंबई एक बाजार है, यहां दिखना, बेचना और खरीदना आना चाहिए। ये सब हमें पता ही नहीं था पर धीरे धीरे इसे भी हमने सीख ही लिया।’
ईमानदारी से काम करना जरूरी
वीरेंद्र सक्सेना ने सिनेमा, विज्ञापन, टेलीविजन सबमें बहुत काम किया है। सौ से ज्यादा तो करीब वह फिल्में कर चुके हैं। अपने पसंदीदा किरदारों के बारे में पूछे जाने पर वीरेंद्र सक्सेना कहते हैं, ‘गोविन्द निहलानी की फिल्म 'तमस' में मैंने जनरल सिंह सरदार का किरदार निभाया था। इसी ने मुझे पहली पहचान दिलाई। फिर एनएफडीसी की फिल्म 'टुन्नू की टीना' ने काफी मदद की। इसके बाद सुधीर मिश्रा की 'धारावी', श्याम बेनेगल की ‘अंतर्नाद’ और हाल के दिनों की फिल्में ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’, ‘सुपर थर्टी’ मेरे दिल के बेहद करीब रही हैं। एक कलाकार को तो अपना हर किरदार बहुत पसंद होता है क्योंकि वह अपना हर किरदार बहुत ईमानदारी से करता है। जो लोग ईमानदारी से काम नहीं करते उनको एक्टर मानने का मेरा मन नहीं करता।’
शाहरुख के पिता का किरदार निभाया
लेख टंडन के साथ वीरेंद्र सक्सेना ने धारावाहिक 'दिल दरिया' में काम किया और उनसे वह खासे प्रभावित भी रहे हैं। ‘दिल दरिया’ शाहरुख खान का पहला धारावाहिक था और इसमें वीरेंद्र सक्सेना ने उनके पिता का किरदार निभाया। महेश भट्ट की चर्चा चलने पर वीरेंद्र सक्सेना कहते हैं, ‘वह एक ऐसे निर्देशक है जिनके साथ हर किसी को काम चाहिए मैंने उनके साथ 'दिल है कि मानता नहीं' और 'नाराज' में काम किया। महेश भट्ट बहुत अच्छे निर्देशक रहे हैं। किरदार की बहुत अच्छी समझ उनको है। एक समय के बाद पता नहीं क्यों वह हमसे नाराज हो गए। मुझे तो मालूम ही नहीं। बहुत सोचता हूं तो यही समझ आता है कि शायद मैंने ही कुछ बोल दिया था। गलती मेरी ही रही होगी।’
अनुभव सिन्हा की तरक्की से खुशी
दूसरे निर्देशकों के बारे में पूछने पर वीरेंद्र सक्सेना कहते हैं, ‘श्याम बेनेगल के साथ काम करने का बहुत अच्छा अनुभव रहा है। वह एक ऐसे निर्देशक हैं जो आपकी अदाकारी में दखल नहीं देते हैं। वह आपको अपनी फिल्म में तभी लेते हैं जब वह आप पर विश्वास करते हैं। एक और नाम है गुड्डू धनोवा का। उनके साथ मैंने 'जिद्दी' और 'जाल-द ट्रैप' में काम किया है। उनके साथ भी काम करने का बहुत अच्छा अनुभव रहा है। अभी मैंने अनुभव सिन्हा के साथ फिल्म 'भीड़' में काम किया। वह मेरे स्टूडेंट रहे हैं। उनके साथ काम करके बहुत मजा आया क्योंकि मैंने अपने सामने एक बच्चे को बड़ा होते देखा है। मुंबई जब वह आते थे तो मेरे साथ ही रहते थे। मुझे अच्छा लग रहा है कि अनुभव बहुत अच्छा काम कर रहा है। अब वह अपनी किस्म की सिनेमा कर रहा है।’