फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

EXCLUSIVE: ‘तानाजी’ के स्टंट निर्देशक का ये है यूपी कनेक्शन, फिल्मफेयर पुरस्कार के बाद पहला इंटरव्यू

विज्ञापन
1 of 8
आर पी यादव, अजय देवगन, अमिताभ बच्चन, अनिल कपूर - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
उत्तर प्रदेश के जिले कुशीनगर से 34 साल पहले सपनों के शहर मुंबई आए पहलवान आर पी यादव ने इस साल अपना पहला फिल्मफेयर पुरस्कार जीतकर एक सपना पूरा किया है। कभी वॉचमैन की नौकरी करके अपना पेट पालने वाले आर पी अब तमाम लोगों को खुद रोजगार देते हैं। अभिनेता अजय देवगन के पिता वीरू देवगन के साथ लंबे समय तक रहे आर पी यादव की गिनती देश के बड़े स्टंट निर्देशकों में होती है। फिल्म ‘रेड’ के बाद से अजय देवगन की सारी फिल्मों के स्टंट उन्हीं के निर्देशन में तैयार हुए हैं। अजय की आने वाली सभी फिल्मों के स्टंट निर्देशक भी वही हैं। आर पी यादव से ये एक्सक्लूसिव बातचीत की ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने।
विज्ञापन

2 of 8
आर पी यादव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
सुपरहिट फिल्म ‘तानाजी द अनसंग वॉरियर’ के लिए बेस्ट स्टंट डायरेक्टर की फिल्मफेयर ट्रॉफी हाथ में लेते समय 34 साल पहले का वह युवक याद आया क्या जो घर से भागकर मुंबई आया था?

(हंसते हुए) उस युवक ने जो तपस्या इस शहर में रहकर की, उसी का आशीर्वाद मुझे 34 साल बाद इस ट्रॉफी के रूप में मिला है। मेरा शुरू से यकीन रहा है कि मेहनत कभी खाली नहीं जाती। हालांकि, दो और फिल्मों के लिए फिल्मफेयर ने मुझे पहले भी इस पुरस्कार के लिए नामांकित किया था पर पुरस्कार मिला नहीं। खासतौर से से फिल्म ‘आक्रोश’ में जब मुझे पुरस्कार नहीं मिला तो मुझे बहुत दुख हुआ था। निर्देशक प्रियदर्शन की इस फिल्म में मैंने  हिंदी सिनेमा का पाको (Parkour) स्टंट से परिचय कराया था। ये छतों से होते हुए एक इमारत से दूसरी इमारत पर बिना किसी सहारे के छलांगें लगाने का स्टंट होता है। मैं इससे पहले दो बार फिल्मफेयर पुरस्कार समारोहों में खुशी खुशी गया था और मुंह लटकाकर वापस लौटा था। इस बार मैं गया भी खुशी खुशी और लौटा तो ट्रॉफी के साथ।
विज्ञापन

3 of 8
अजय देवगन के साथ आर पी यादव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
आपका और फिल्म ‘तानाजी’ के हीरो अजय देवगन का साथ काफी पुराना है। पहली मुलाकात कब हुई अजय से?

मेरे बहनोई यहां मुंबई में दारा सिंह के साथ पहलवानी करते थे। दारा सिंह ने पहलवानी छोड़ी तो मेरे बहनाई का उन्होंने फिल्मों में स्टंट करने वालों की संस्था में खुद फोन करके कार्ड बनवाया। उनके साथ अभ्यास करते हुए ही मैंने वीरू देवगन को देखा। मुझे कतई अंदाजा नहीं था कि वीरू देवगन हिंदी सिनेमा की कितनी बड़ी शख्सीयत तब तक बन चुके थे। एक दिन उन्होंने वहीं अभ्यास कर रहे अपने बेटे अजय देवगन को बुलाकर मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा, देखो, ये लड़का कितना चपल और फुर्तीला है। वीरू देवगन के साथ मैंने बहुत काम किया। मैंने उन्हें हमेशा उन्हें पिता की तरह सम्मान दिया और उन्होंने भी मेरा ख्याल बेटे की तरह ही रखा।

4 of 8
आर पी यादव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
कोई भी स्टंट निर्देशक यहां तक पहुंचने से पहले कैमरे के सामने हीरो से पिटता है, फिर हीरो के बॉडी डबल का काम भी करता है, आप किन सितारों के बॉडी डबल रह चुके हैं?

ठीक कहा आपने, बतौर फाइटर मैंने बहुत संघर्ष किया है इस शहर में। मोबाइल वगैरह तब कुछ होता नहीं था। एक अड्डा था हम लोगों का, जहां शाम को पता चलता था कि अगली सुबह किसी फिल्म की शूटिंग के लिए काम है कि नहीं। बहन के यहां रहकर मैं मुफ्त में रोटी भी नहीं तोड़ना चाहता था तो मैंने पहली नौकरी जो यहां की वह चौकीदार (वॉचमैन) की थी। मेरे बहनोई काफी नाराज भी हुए लेकिन मैंने उनसे यही कहा कि आपने आसरे के लिए छत दी, यही बहुत है। खाना मैं खुद अपना कमाऊंगा। फिल्म ‘विजयपथ’ में मैंने पहली बार अजय देवगन के बॉडी डबल का काम किया था तब से सबसे ज्यादा बार मैंने अजय देवगन बनकर ही परदे पर स्टंट किए हैं। उसके बाद अगर किसी हीरो का बॉडी डबल मैं बना हूं तो वह सलमान खान हैं।
विज्ञापन

5 of 8
फिल्म भोलेशंकर का एक्शन सीन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
आपने भोजपुरी फिल्मों में भी बतौर स्टंट निर्देशक बहुत काम किया है? कैसा रहा उस इंडस्ट्री का अनुभव?

प्रसिद्ध सिनेमैटोग्राफर निर्मल जानी ने बतौर निर्देशक एक फिल्म भोजपुरी में बनाई थी ‘धरती कहे पुकार के’। अजय देवगन उनका काफी सम्मान करते हैं तो उनके कहने पर अजय देवगन ने ये भोजपुरी फिल्म की थी। मुझे भी अजय अपने साथ ले गए। बतौर स्टंट निर्देशक वह मेरी पहली फिल्म थी। मेरी दूसरी फिल्म बतौर स्टंट निर्देशक मल्टीस्टारर फिल्म ‘कैश’ रही। भोजपुरी सिनेमा में तीन चार साल मैंने बहुत काम किया। आपकी फिल्म ‘भोलेशंकर’ में भी उसी दौरान मैंने स्टंट निर्देशन किया था। तब कुछ वजहों से मैंने हिंदी सिनेमा से दूरी बना रखी थी। लेकिन, मैं एक बात कहना चाहूंगा कि भोजपुरी फिल्मों का बाजार जितना बड़ा है, उतना विकास उसका नहीं हो पाया। इसके विपरीत मराठी जानने वाले बहुत कम हैं, लेकिन मराठी सिनेमा के लोग हुनर की इज्जत करना जानते हैं। तभी मराठी सिनेमा को भी दुनियाभर में सम्मान मिलता है। भोजपुरी सिनेमा में आत्मसम्मान वाला व्यक्ति काम नहीं कर सकता। वहां चापलूसी बहुत है।
विज्ञापन

6 of 8
टोटल धमाल के सेट पर आर पी यादव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
हिंदी सिनेमा में स्टंट निर्देशन में तकनीक के विकास से कितना बदलाव आया है?

फिल्म ‘रेड’ के बाद से मैं पूरी तरह से अजय देवगन की ही फिल्में कर रहा हूं। वह अलग अलग तरह की फिल्में कर रहे हैं, मुझे भी अलग अलग तरह के स्टंट रचने में आनंद आ रहा है। ‘रेड’, ‘टोटल धमाल’ और ‘तानाजी’ को देखेंगे तो तीनों का एक्शन बिल्कुल अलग अलग है।  ‘रेड’ का एक्शन वास्तविकता के करीब है। ‘टोटल धमाल’ का एक्शन हंसी पैदा करता है तो ‘तानाजी’ के एक्शन में हमें ऐतिहासिक तथ्यों के करीब रहते हुए ऐसा एक्शन बनाना था जो वीएफएक्स के बाद और विशाल बनकर निखरे।  तकनीक के विकास की मदद हमने इसी फिल्म में ली। आगे भी जो अजय देवगन की फिल्में मैं कर रहा हूं, उनमें भी चाहे ‘भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया’ हो, ‘मे डे’ हो, ‘मैदान’  हो या फिर ‘थैंक गॉड’। सबमें बदलते जमाने के साथ ही हम एक्शन डिजाइन कर रहे हैं।
विज्ञापन

7 of 8
मे डे - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
क्या अमिताभ बच्चन के लिए फिल्म ‘मे डे’ में भी स्टंट्स निर्देशित किए हैं?

हम जहां से आए हैं, वहां के किसी आदमी का अमिताभ बच्चन के साथ खड़ा होना, उनके साथ हाथ मिलाना ही बहुत है। अमिताभ बच्चन के मेकअप मैन दीपक सावंत की फिल्म में मैंने अमिताभ बच्चन के साथ काम किया था। उससे पहले फिल्म ‘मेजर साब’ के सेट पर मैं उनसे मिला था। लेकिन फिल्म ‘मे डे’ के सेट पर वह देखते ही मुझे पहचान गए। वह इतनी महान शख्सीयत हैं और जिस तरह से आगे बढ़कर उन्होंने मुझसे मुलाकात की तो मैं उनकी सदाशयता का कायल हो गया।
विज्ञापन

8 of 8
आर पी यादव - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अब जब आपके सपने धीरे धीरे करके पूरे होने लगे हैं तो कुशीनगर का अपना गांव कितना याद आता है?

मुंबई मेरी कर्मभूमि है। रामकोला थाना क्षेत्र का मेरा गांव कुसमही मेरी जन्मभूमि है। उसी की मिट्टी ने मुझे इस तरह का बनाया कि मैं हजारों की भीड़ में खुद को आगे निकाल पाया। मुझे याद है कि कैसे हम ढिबरी की रोशनी में दंड-बैठक किया करते थे। हजार दंड बैठक का हमारा नियम था रोज का। पिता जी रामाधार यादव भी पहलवान थे। 10-12 साल की उम्र से ही वह मुझे अखाड़े ले जाने लगे थे। वहां के वे अखाड़े मुझे अब भी याद आते हैं। अखाड़े से लौटते समय हम सब कोल्हू में गन्ना डालकर एक बाल्टी रस निकालते थे और फिर उसमें दो बाल्टी दूध मिलाकर सब वहीं पी जाते थे। महुआ बहुत होता है हमारे गांव में। माताजी हमारी घर में दूध में महुआ डालकर पिलाती थीं। तो जो शरीर है, वह मां और मातृभूमि का ही है। कर्मभूमि में रहकर भी मैं मातृभूमि को कभी भूला नहीं। जाता रहता हूं वहां।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें