के के यानी कृष्णकुमार कुन्नथ, दिल्ली की जवानी, मुंबई की शोहरत और कोलकाता में शांति, हमेशा हमेशा के लिए। के के शांति के ही पुजारी रहे, शुरू से। स्टूडियो उनके लिए किसी उपासना स्थल से कम नहीं रहा। वह कहते भी थे, ‘अगर आपको खाना बनाने का धर्म पता है तो आप संगीत के सच्चे उपासक हो सकते हैं। जीवन का सबसे सच्चा और निष्कपट काम है खाना बनाना। और, दूसरा गाना। मेरे लिए संगीत स्टूडियो एक रसोई है जिसमें मैं सब कुछ स्वादानुसार डालकर एक गीत पकाता हूं। इसी में मुझे सुकून मिलता है।’ दिल्ली से मुंबई आए जिस किशोर ने हमेशा अपनी सारी ऊर्जा मंच के लिए बचाकर रखने की बात की, उसने मंगलवार की शाम मंच से ही अपने चाहने वालों को अलविदा कह दिया। ये ‘पल’ अब कभी न आएगा।