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EXCLUSIVE: ‘अमर उजाला’ से बोलीं विद्या बालन, ‘सामाजिक बदलाव ने बदली सिनेमा में महिलाओं की कहानियां’

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विद्या बालन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अपनी पहली ही फिल्म ‘परिणीता’ से विद्या बालन ने हिंदी सिनेमा में महिला किरदारों का एक स्तर तय किया है। महिला प्रधान विषयों पर आधारित उनकी फिल्मों ने हिंदी सिनेमा में एक अलग चलन भी शुरू किया। विद्या बालन ने ‘द डर्टी पिक्चर’ से लेकर  ‘तुम्हारी सुलु’, ‘मिशन मंगल’ और  ‘शकुंतला देवी’ तक आते आते पुरुष प्रधान हिंदी सिनेमा में हर बार कामयाबी की एक नई मिसाल भी बनाई है। अपनी नई फिल्म ‘शेरनी’ की रिलीज की चर्चाओं के बीच विद्या बालन से ये खास मुलाकात की ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने।

आपका सिनेमा हर बार एक संदेश लिए होता है, इस बार का संदेश क्या है?
मेरे ख्याल से हिंदी सिनेमा में अभी तक ‘शेरनी’ जैसी फिल्म बनी नहीं है। ये सिर्फ जंगल में आधारित कहानी नहीं है। ये जंगल की कहानी है। मैं वन विभाग अफसर का रोल कर रही हूं  जिसने दृढ़ निश्चय कर लिया है कि वह जंगल और जानवरों को सुरक्षित रखने के लिए एक पुरुष प्रधान व्यवस्था में जो कुछ भी बन पड़ेगा वह करेगी। वह अपना रास्ता खुद बना रही है। वह अपने तरीके से काम करने की कोशिश कर रही है। साथ ही ये फिल्म ये भी बता रही है कि किस तरह से हम जो भी करते हैं उसका जंगलों और पर्यावरण पर असर पड़ता है।
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विद्या बालन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
एक पुरुष प्रधान सिनेमा में जब एक अभिनेत्री शकुंतला देवी’, ‘शेरनी’, ‘तुम्हारी सुलू या बेगम जान’ जैसे शीर्षक किरदार करती है तो उससे लगातार सफल फिल्में देने की उम्मीदें भी तो बढ़ती होंगी?
मैं इस तरह की कोई खास कोशिश नहीं कर रही हूं। पर हां इस तरह की फिल्में जब चलती हैं तो ज्यादा इस तरह की फिल्में बनेंगी और सभी को फायदा होगा। मैं इकलौती अभिनेत्री नहीं हूं जो महिला प्रधान फिल्में कर रही है। सिनेमा समाज का आइना होता है तो समाज में ये बदलाव हो रहा है। समाज भी पुरुष प्रधान से हटकर महिला प्रधान बन रहा हो ऐसा तो मैं नहीं कहूंगी लेकिन हां बराबरी का समाज तो बन रहा है। इसी वजह से हमारी कहानियां भी उभरकर सामने आने लगीं हैं।
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विद्या बालन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
नए निर्देशकों से साथ काम करने में आपको आज भी परेशानी नहीं होती। परिणीता’ भी प्रदीप सरकार की पहली फिल्म थी। अब जब ये फिल्म देखती हैं तो कहीं कोई बेहतरी की गुंजाइश दिखती है?
मुझे उस फिल्म में कोई खामी नहीं लगती। वह मेरी पहली फिल्म थी तो मैं उसे लेकर ऑब्जेक्टिव हो नहीं सकती। इस फिल्म में बहुत सारे लोग पहली बार सिनेमा बना रहे थे। इतना ज्यादा उत्साह था सेट पर कि तब और कुछ था ही नहीं हमारी जिंदगी में। वह फिल्म हम सबके लिए हमेशा स्पेशल रहेगी।

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विद्या बालन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अब तक 16 साल आपने बिताए हिंदी सिनेमा में। इस दौरान कभी आपको ऐसा लगा कि ये फिल्म अगर मुझे निर्देशित करने को मिले तो मैं बेहतर कर सकती हूंनिर्देशक बनने की कोई योजना?
नहीं, मुझे निर्देशक नहीं बनना है। मुझमें वह हुनर है ही नहीं और हिम्मत भी नहीं है। मैंने एक छोटी सी फिल्म प्रोड्यूस की है पर उसके अलावा प्रोड्यूसर बनने का भी शौक नहीं है। प्रोड्यूसर बनना बहुत हिम्मत वाली बात होती है। मैं अपने पति (सिद्धार्थ रॉय कपूर) को देखती हूं तो समझ आता है कि बाप रे, किस किसको हैंडल करना पड़ता है और कितना इंतजार करना पड़ता है हर चीज के लिए।
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विद्या बालन - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
पिछले डेढ़ दो साल से आपने और आपके पति ने घर पर लंबा वक्त साथ में बिताया। क्या कुछ नए अनुभव रहे आप दोनों के इस दौरान?
खूब झाडू पोंछा किया हमने साथ में। हमारे घर पर जो सहायिका रहती थी। वह खाना पकाती थी क्योंकि हम दोनों में से किसी को खाना पकाना नहीं आता। वह खाना पकाती थी और हम दोनों झाड़ू पोछा करते थे। कभी सोचा नहीं था जीवन में कि ये अनुभव भी हम साझा करेंगे। यह यादगार रहेगा। साढ़े आठ साल हो गए हमारी शादी को लेकिन जितना वक्त हमने पिछले डेढ़ साल में साथ बिताया। वह कभी नहीं बिताया था। शुरू में तो मुझे लगा था कि बहुत झगड़े होंगे लेकिन नजर न लगे, हमारे बीच हुए नहीं।
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मिशन मंगल - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
जिस तरह से महिला प्रधान फिल्में अलग अलग विषयों को लेकर बन रही हैं तो क्या इससे बेटियों को अपना करियर चुनने में मदद मिलने की संभावना है, ये फिल्में देखकर अभिभावकों की भी सोच तो बदली ही है?
‘मिशन मंगल’ के बाद काफी सारे अभिभावकों ने मुझे बताया कि उनके बच्चे कह रहे हैं कि स्पेस साइंटिस्ट बनना है और उसकी साइंस में दिलचस्पी बढ गई है। काफी सारे लोगों ने कहा कि आपकी फिल्म देखने के बाद मैंने ठान लिया कि मैं रेडियो जॉकी बनूंगी। ये सब सुनकर बड़ा अच्छा लगता है। एक सफल फिल्म के लिए ये सोने पर सुहागा जैसी बात होती है।
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बेगम जान - फोटो : सोशल मीडिया
और, ऐसी फिल्में करते समय आप इसके किरदार का सकारात्मक या नकारात्मक पक्ष भी देखती हैं? जैसे कि ‘डर्टी पिक्चर’ या ‘बेगम जान’
हम सबमें खूबियां भी हैं खामियां भी हैं। अब ऐसा तो नहीं कि मैं हर पल बस अच्छी ही हूं। मुझमें भी ऐसी चीजें है जो शायद आपको जब पता चलेगा तो लगेगा कि अरे, मैंने तो सोचा नहीं था कि विद्या ऐसी हो सकती है। हम सब इंसान हैं। हम हर चीज का मिश्रण हैं। इसी वजह से मुझे लगता है कि किसी के बारे में धारणा बनाना गलत है।

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फिल्म शंकुतला देवी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अच्छा, आपकी इच्छासूची ऐसा कोई किरदार बाकी रहा हो जो आप दिल से करना चाहती हैं...
मैं एक सिंगर का रोल जरूर निभाना चाहूंगी।
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फिल्म शेरनी का दृश्य - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
मतलब, लता मंगेशकर या आशा भोसले की बायोपिक बने तो विद्या बालन उसके लिए उपलब्ध हैं?
ये सुनने में ही इतना मधुर लग रहा है, बहुत धन्यवाद।


ये पूरा वीडियो इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं।

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