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'दो गज जमीन के नीचे' से शुरू हुआ था रामसे ब्रदर्स का सफर, हॉरर फिल्मों से बनाया खास मुकाम

Tue, 29 Dec 2020 07:44 PM IST
Mishra Mishra बीबीसी हिंदी
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रामसे ब्रदर्स - फोटो : फाइल
चूंकि रामसे ब्रदर्स के पिता फतेहचंद रामसिंघानी का नाम लेने में अंग्रेजों को दिक्कत होती थी इसलिए उन्होंने रामसे नाम दे दिया। फतेहचंद के सात बेटों ने मिलकर रामसे को हॉरर का ब्रैंड बनाया। रामसे ब्रदर्स ने रुपहले परदे पर ऐसा खौफ बिखेरा कि वो इस जॉनर के मास्टर बन गए। 70 और 80 के दशक में रामसे ब्रदर्स ने करीब 45 फिल्में बनाईं। मनोरंजन की दुनिया में हॉरर है तो रामसे ब्रदर्स हैं और रामसे ब्रदर्स हैं तो हॉरर है।

आज की युवा पीढ़ी को लक्ष्मी, स्त्री, भूल भुलैया जैसी फ़िल्में पसंद हैं जिन्हें हॉरर कॉमेडी जॉनर के नाम से जाना जाता है। आज के कुछ युवा दर्शक रामसे ब्रदर्स की हॉरर फिल्मों को अटपटा भी मानते हैं मगर ये कहना भी गलत नहीं होगा कि हर दौर में दर्शकों की पसंद बदलती है। उस जमाने में रामसे बंधुओं ने हॉरर जॉनर को अलग मुकाम तक पहुंचाया और अपना एक ऐसा ब्रैंड बनाया जो हमेशा जिंदा रहेगा।

श्याम रामसे की बेटी साशा श्याम रामसे ने आज और गुजरे हुए दौर की हॉरर फिल्मों की तुलना और पसंद के बारे में बात करते हुए कहा, "आजकल जागरूकता बढ़ गई है। बहुत सारे माध्यम हो गए हैं जहां अलग-अलग फिल्में लोग देखते हैं। आजकल 10 साल का बच्चा भी बोल देता है कि ये ठीक नहीं लग रहा मगर वो दौर अलग था। उस दौर में हमारी फिल्मों को बड़ी सफलता मिली और आज भी दर्शक उन्हें देखते हैं। हाउस पार्टी में कई जगह मैं गई हूं जहां लोग पुरानी रामसे ब्रदर्स की डरावनी फिल्में लगा कर देखते हैं। हमने अभी हाल में एक पार्टी में दोस्त के यहां 'वीराना' देखी।"
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रामसे ब्रदर्स - फोटो : फाइल
हॉरर फिल्मों में मुकाम
रामसे बंधुओं के साथ पुराना मंदिर सहित तीन फिल्में कर चुकी अभिनेत्री आरती गुप्ता सुरेन्द्रनाथ कहती हैं, "पुराना मंदिर के लिए आज भी लोग पागल हैं। मधुर भंडारकर, अनुराग कश्यप जैसे लोग उस फिल्म के फैन हैं। अनुराग कश्यप तो पुराना मंदिर की टी शर्ट बनवा कर पहनते हैं।"

वहीं रामसे बंधुओं के साथ तीन हॉरर फिल्में करने वालीं अभिनेत्री कुनिका लाल का मानना है, "उस समय तकनीक की कमी थी। उस समय इतना एक्सपोजर नहीं था सोशल और डिजिटल मीडिया का। हॉलीवुड सहित अब पूरी दुनिया की फिल्में या कंटेंट लोग देखते हैं और उससे तुलना होने लगती है। आज की तकनीक और टेस्ट भी बदला है और यही वजह है कि उन फिल्मों के दृश्य बचकाने लगते हैं। मगर उस समय की तकनीक और टेस्ट के हिसाब से वो बेहतरीन फिल्में थीं और अच्छी लगती थीं। उस समय सचमुच में रामसे ब्रदर्स की फिल्मों से दर्शक डरते थे।"

रामसे ब्रदर्स ने हॉरर जॉनर में ऐसा मुकाम बनाया कि अब उनके जीवन पर फिल्म बनाने के लिए अजय देवगन जैसे अभिनेता और फिल्मकार ने राइट्स लिए हैं। रामसे बंधुओं पर बनने वाली फिल्म से आज के वो युवा भी उनके जीवन और उनके हॉरर ब्रांड के बारे में जानेंगे जिन्होंने उनकी फिल्में नहीं देखी हैं।
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अजय देवगन - फोटो : फाइल
तुलसी रामसे के बेटे दीपक रामसे ने बताया कि "रामसे ब्रदर्स पर अजय देवगन बड़ी फिल्म या वेब सीरीज बना रहे हैं। अजय देवगन को निर्णय लेना है कि वो फिल्म या वेब सीरीज में क्या बना रहे हैं। इसे 2021 में रिलीज करने की योजना है। इसके बनने के बाद वो युवा भी रामसे ब्रदर्स को जानेंगे जिन्होंने रामसे की फिल्में नहीं देखी हैं।"

इस ऊंचाई तक पहुंचने के लिए रामसे ब्रदर्स के पिता फतेहचंद रामसे ने बुनियाद रखी। पाकिस्तान के लाहौर और कराची में फतेहचंद रामसे का रेडियो का कारोबार था। बंटवारे के समय वो अपने परिवार को लेकर मुंबई आ गए। मुंबई में उन्होंने रेडियो की दुकान की। फतेहचंद रामसे के सात बेटे थे जिनमें कुछ रेडियो अच्छे से बनाना जानते थे। उनकी एक टेलरिंग और गारमेंट की दुकान भी थी। घर की रोजी रोटी चलाने के लिए या जरूरतों को पूरा करने के लिए उनके पास सब कुछ था मगर फतेहचंद नहीं चाहते थे कि उनके बेटे इन दुकानों को चलाएं या ये काम करें। उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में आना था। फतेहचंद को फिल्मों का शौक था।

1954 में रिलीज हुई फिल्म "शहीद-ए आजम भगत सिंह" सहित कुछ फिल्मों को शुरुआत में फाइनेंस किया और फिर 1964 में फिल्म "रुस्तम सोहराब" का निर्माण किया।

दीपक रामसे कहते हैं, "इस ऐतिहासिक फिल्म को बनाने में समय लगा और पैसे भी ज्यादा लगे इसलिए कुछ खास मुनाफा नहीं हुआ। उस समय दादा को तकलीफ इस बात की होती थी कि निर्देशक और टेक्नीशियन अपने तरीके से काम करते थे और परेशान करते थे। तभी दादाजी को लगा कि उनका अपना कोई होता जो उनके साथ होता, और तभी उन्होंने अपने बेटों को ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी।"

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रामसे ब्रदर्स की फिल्में - फोटो : फाइल
फिल्मों की ट्रेनिंग
उस समय फतेहचंद रामसे अपने पूरे परिवार को लेकर कश्मीर गए और दो महीने के लिए हाउस बोट बुक किया। वहां एक किताब थी "5 सीज ऑफ सिनेमेटोग्राफी।" अपने बेटों को उस किताब को पढ़ाया। उसके बाद फिल्म मेकिंग के हर पहलू की ट्रेनिंग दी जिसमें संगीत भी शामिल था। मुंबई वापस आने के बाद फतेहचंद रामसे ने अपने बेटों को फिल्म मेकिंग सिखाने के लिए एक फिल्म शुरू की मगर निर्देशक और टेक्नीशियन ने उनके बेटों के साथ सिर्फ जूनियर की तरह व्यवहार किया और ठीक से नहीं सिखाया।

अपने बेटों को सिखाने के जुनून को फतेहचंद रामसे ने चुनौती की तरह लिया और पहली फिल्म सिंधी भाषा में बनाई जिसका नाम "नकली शान" था। इस फिल्म में सातों भाइयों ने साथ काम किया। कैमरामैन थे गंगू रामसे। तुलसी रामसे और श्याम रामसे ने निर्देशन की कमान संभाली। लेखक बने कुमार रामसे। साउंड इंजीनियर थे किरण रामसे। एडिटिंग की अर्जुन रामसे ने। और इस तरह रामसे ब्रदर्स ने अपने-अपने काम और जिम्मेदारियों को बांटा और शुरू हुआ रामसे बंधुओं के साम्राज्य को बनाने का।

साशा रामसे कहती हैं, "दादाजी की सोच अलग थी जिन्होंने सोचा कि हमारे बेटे हैं और इन्हें हम क्रिकेट टीम की तरह फिल्म मेकिंग के हर क्षेत्र में तैयार करेंगे। दादाजी ने ट्रेनिंग के बाद बाहर के किसी टेक्नीशियन को नहीं बुलाया क्योंकि उन्होंने अपनी टीम बना ली थी। पिता के नाते उन्होंने अपने सभी बेटों की काबिलियत को पहचाना और उस हिसाब से तराशा।"
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दो गज जमीन के नीचे - फोटो : फाइल
रामसे बंधुओं ने एकजुट होकर काम शुरू किया और फिल्म बनाई "नन्हीं मुन्नी लड़की"। ये फिल्म सफल नहीं हुई मगर इस फिल्म के एक दृश्य ने, जहां पृथ्वी राज कपूर एक भूत का मास्क पहन कर लड़की को डराते हैं, खूब वाहवाही बटोरी। इस एक सीन ने रामसे बंधुओं को प्रेरणा दी भुतही और डरावनी फिल्म बनाने के लिए। उसके बाद हॉरर फिल्म बनाई "दो गज जमीन के नीचे।"

साढ़े तीन लाख रुपये के छोटे से बजट में बनी इस फिल्म की शूटिंग 40 दिनों में मुकम्मल हुई। इस फिल्म ने रिलीज होने के बाद तहलका मचा दिया और 45 लाख रुपये का कारोबार किया। फिल्म "दो गज जमीन के नीचे" के बाद रामसे ब्रदर्स ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और हॉरर फिल्मों का सफर शुरू हुआ।

दीपक रामसे कहते हैं कि "उस समय 'दो गज जमीन के नीचे' सबसे कामयाब फिल्मों में से एक थी जो रामसे बंधुओं के लिए गेम चेंजर थी। इस फिल्म के बाद तय किया गया था कि अब कोई और जॉनर की फिल्म नही बनाएंगे। सिर्फ और सिर्फ डरावनी फिल्म ही बनाएंगे और इस जॉनर को बेहतर बनाएंगे।"
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अनिरुद्ध अग्रवाल - फोटो : फाइल
तकनीक का अभाव
90 के दशक से टेक्नोलॉजी पैर पसारने लगी। आज तकनीक ने इतनी तरक्की कर ली है कि ऐसी फिल्मों के लिए एक से बढ़कर एक भूत, चुड़ैल और डराने वाले अक्स स्पेशल इफेक्ट और ग्राफिक से तैयार हो जाते हैं।

रामसे बंधुओं के दौर में टेक्नोलॉजी का सहारा नहीं था। रामसे बंधुओं ने फिजिकल मेकअप और बैकग्राउंड म्यूजिक को डराने का हथियार बनाया। मनोरंजन के लिए कॉमेडी, म्यूजिक और बोल्ड सीन का तड़का लगाया। अनिरुद्ध अग्रवाल खासतौर से भूत बनते थे जो मेकअप करने के बाद परदे पर बेहद डरावने लगते थे। दीपक रामसे कहते हैं कि "उस समय तकनीक नहीं थी। बैकग्राउंड म्यूजिक का बड़ा असर था। हमारे पास अच्छे कंपोजर थे। 'पुराना मंदिर' में कंपोजर उत्तम सिंह थे जिनके म्यूजिक ने भूत से पहले ही दर्शकों को डराया था। स्पेशल इफेक्ट बिल्कुल भी नहीं था। मेकअप का बड़ा रोल था जिसमें 6-6 घंटे का समय लगता था। एक्टर को 9 बजे की शिफ्ट में सुबह 6 बजे बुलाते थे। 12 बजे तक मेकअप होता था। 1 बजे खाना खाते थे और 2 बजे से शूटिंग शुरू होती थी।"

दीपक रामसे ने बोल्ड सीन के बारे में बात करते हुए कहा, "हिंसा की वजह से हमारी फिल्मों को सेंसर से ए सर्टिफिकेट मिलता था। इसलिए उस समय तय किया गया कि अगर फिल्म में अच्छे ढंग से थोड़ा बोल्ड सीन डाले जाएं तो ये फिल्म के लिए अच्छा होगा। तीन घंटे की फिल्म को संतुलित करके बनाना पड़ता था जिसमें कहानी के साथ कॉमेडी, संगीत का तड़का डालना जरूरी था। पूरे तीन घंटे सिर्फ भूत प्रेत नहीं दिखा सकते। दर्शकों के सिर में दर्द हो जाएगा। हमारी फिल्मों में कॉमेडी का ट्रैक भी मजबूत होता था। फिल्म 'पुराना मंदिर' में शोले के ट्रैक पर जगदीप और गब्बर सिंह का ट्रैक बहुत लोकप्रिय हुआ था।"
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रामसे ब्रदर्स - फोटो : फाइल
बड़ी स्टार कास्ट नहीं
रामसे बंधुओं की फिल्मों का बजट कम होता था। कोई बड़ा स्टार नहीं होता था। ए सर्टिफिकेट की वजह से बच्चे और परिवार फिल्म देखने सिनेमा घरों में नहीं आते थे। फिर भी भूत के दम पर रामसे बंधुओं ने फिल्मों को हिट कराया। बड़ी से बड़ी बजट और बड़े से बड़े सितारों की फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर टक्कर भी दी। दौर कोई भी हो, युवा, शादीशुदा जोड़े और डरावनी फिल्मों के शौकीन ही हॉरर फिल्में देखते हैं।

दीपक रामसे ने बताया, "कई बार डिस्ट्रीब्यूटर स्टार कास्ट पूछते थे तो तुलसी रामसे और श्याम रामसे नए कलाकारों के नाम बताते थे। डिस्ट्रीब्यूटर कहते थे कि बिना बड़े स्टार के आप इतने पैसे क्यों मांग रहे हैं तो रामसे ब्रदर्स कहते थे कि हमारी फिल्म का स्टार भूत है। आप एक रील देखने के बाद फैसला कीजिए। एक रील देख कर डिस्ट्रीब्यूटर कहते थे कि कितने पैसे लेंगे? रामसे की फिल्मों को बड़ी फिल्मों के साथ रिलीज होने में कोई डर नहीं लगता था। रामसे बंधुओं की फिल्में बड़े सितारों की फिल्मों के साथ भी प्रदर्शित होती थीं।"

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कुनिका - फोटो : फाइल
कुनिका कहती हैं कि उन्हें आज भी सोशल मीडिया पर बंद दरवाजा के लिए संदेश भेजे जाते हैं। दुनिया के हर कोने में उस फिल्म को लोगों ने देखा है। "लिमिटेड ऑडियंस के लिए फिल्म होती थी इसलिए बजट भी कम होता था जिसकी वजह से हमें भी कम पैसे मिलते थे मगर इज्जत मिलती थी। रामसे ब्रदर्स बहुत इज्जत देते थे। हम जल्दी-जल्दी शूटिंग करते थे। मुझे याद है कि बंद दरवाजे का पूरा गाना एक रात में शूट कर लिया था।"

वहीं आरती गुप्ता सुरेन्द्रनाथ कहती हैं कि "जब 'पुराना मंदिर' बन रही थी तब मैं थोड़ी शर्मिंदा होने लगी थी क्योंकि मेरे दोस्त कहते थे कि बड़ी फिल्मों के ऑफर को छोड़कर ये फिल्म कर रही है। जब फिल्म 'पुराना मंदिर' 1984 में रिलीज हुई थी, उस साल कई स्टार्स की बड़ी फिल्में प्रदर्शित हुई थीं। मगर 'पुराना मंदिर' बहुत बड़ी हिट हुई। आज भी अनुराग कश्यप और मधुर भंडारकर जैसे उस फिल्म के फैन हैं।"

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सामरी - फोटो : फाइल
रामसे ब्रदर्स का टीम वर्क
सातों भाई एक टीम बनाकर काम करते थे। अपनी-अपनी जिम्मेदारियां बांट रखी थीं। कहानी पर काम करने के बाद शूटिंग के लिए फिल्म की पूरी यूनिट के साथ पूरा परिवार एक बस में सवार होकर महाबलेश्वर पहुंच जाता था। इनकी ज्यादातर फिल्मों की शूटिंग महाबलेश्वर में होती थी। वहां अनारकली नाम के होटल में बुकिंग होती थी। जब तक शूटिंग होती तब तक किसी और मेहमान को उस होटल में जगह नहीं मिलती थी। इस होटल में रामसे बैनर को कंसेशन भी मिलता था।

अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए दीपक कहते हैं कि "हमने बचपन से देखा है कि किस तरह स्टोरी सिटिंग हुआ करती थी। सातों भाई एक साथ बैठते थे और कहानी पर चर्चा होती थी। हमारे एक जूनियर राइटर होते थे जेके आहूजा साहब जिनका कहानी सुनाने का अंदाज बहुत अच्छा होता था। वो अलग-अलग तरह की आवाजें निकालकर कहानी सुनाते थे। हम उस समय बच्चे होते थे। उन पलों को मजे से गुजारते थे। इस तरह कहानी बनती थी। उसके बाद हम विचार करते थे कि किस तरह फिल्म बनेगी और किस तरह शूटिंग होगी।"

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कुनिका - फोटो : SELF
साशा ने भी उन दिनों को याद किया और कहा कि "उस जमाने के कलाकार आज भी मिलते हैं तो कहते हैं कि रामसे बैनर एक परिवार था। बहुत ही प्यार से काम होता था। फिल्म की यूनिट के साथ सभी चाचियां और मेरी मां भी शूटिंग पर साथ होती थीं।"

कुनिका लाल ने बताया, "जब मैंने रामसे ब्रदर्स की फिल्म साइन की तब मैं इंडस्ट्री में नई थी। किसी को नहीं जानती थी। हमें मालूम नहीं था कि हॉरर फिल्म का अलग ग्रेड होता है। हमारे लिए ये बड़ी बात थी कि हमें काम मिल रहा है। रामसे ब्रदर्स के साथ काम करना मतलब परिवार में रहना। पूरा परिवार साथ होता था। महाबलेश्वर में शूटिंग करते थे। सेट पर भाभियां होती थीं, बच्चे भी खेलते थे। हम सबको खूब इज्जत और प्यार मिलता था।"

आरती गुप्ता सुरेन्द्रनाथ ने बताया, "मैं 16 साल की थी जब मॉडलिंग शुरू की। कई फिल्मकारों के ऑफर को ठुकराया मगर रामसे की फिल्म कर ली क्योंकि ये 'बीते दिन' गाने की रिकॉर्डिंग के साथ आए थे और बहुत अच्छे से बात की। उन्होंने कहा कि हम स्टाइलिश और अच्छी फिल्म बनाएंगे। मैं मना नहीं कर पाई। कई लोग नाराज भी हुए थे। ये फिल्म थी 'पुराना मंदिर'। फिर मोहनीश बहल भी तैयार हो गए। मुझे बच्चे की तरह प्यार दिया। हमसे खाना तक पूछ कर खिलाते थे।"

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वीराना फिल्म का सीन - फोटो : ट्विटर
छोटे पर्दे का रुख
70 और 80 के दशक में कई कल्ट फिल्में देने के बाद 90 के दशक में रुपहले परदे पर हॉरर फिल्मों का आना बंद होने लगा क्योंकि रामसे बंधुओं ने छोटे परदे की तरफ रुख कर लिया था।

90 के दशक में दूरदर्शन के बाद पहला चैनल लॉन्च हुआ था जीटीवी। रामसे की फिल्में दूरदर्शन पर ए सर्टिफिकेट होने की वजह से रिलीज नहीं होती थीं। इसलिए रामसे अपनी फिल्मों के सैटेलाइट राइट बेचने के लिए जीटीवी के दरवाजे पर पहुंचे। तभी जी के मालिक सुभाष चंद्रा ने रामसे बंधुओं को जी हॉरर शो बनाने का निमंत्रण दिया।

1989-90 में जो भी फिल्म बना रहे थे उसे पूरा किया और जी हॉरर शो का सफर शुरू हुआ। सभी भाइयों का पूरा ध्यान जी हॉरर शो में लग गया। क़रीब साढ़े सात साल तक जी हॉरर शो चला जिसमें 365 एपिसोड बनाए गए। रामसे की अगली पीढ़ी ने इस शो को बनाते समय अपने पिता और चाचाओं से हॉरर बनाने और दर्शकों को डराने के गुण सीखे।

तुलसी रामसे के बेटे दीपक रामसे ने 200 एपिसोड का निर्देशन किया और धीरे-धीरे रामसे ब्रदर्स के भूत सिनेमा घरों से गायब हो गए और छोटे परदे पर पहुंच कर डराना शुरू कर दिया।

साशा का मानना है कि "जी हॉरर शो का फॉर्मेट भी फ़िल्म का ही फॉर्मेट था जिसमें एक कहानी पांच एपिसोड में खत्म होती थी। यानी हर कहानी ढाई घंटे की फिल्म थी।"

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वीराना फिल्म का सीन - फोटो : फाइल
वहीं दीपक कहते हैं कि "मुझे लगता है कि सही समय पर सही फैसला लिया गया क्योंकि हमने अपने ब्रांड को लोगों के घरों में मुफ्त में पहुंचाना शुरू कर दिया था। शुक्रवार को नौ बजे रात में जी हॉरर शो का थीम म्यूजिक बजता था और बच्चे चादर और तकिये में छुप जाते थे मगर शो देखते थे जो रामसे ब्रांड की जीत थी। हमने जरूरत के हिसाब से बदलाव किए। बोल्ड सीन निकाल दिए। हालांकि जी हॉरर शो ने बड़े परदे से छोटे पर्दे पर पहुंचा दिया मगर मेरे हिसाब से टीवी की तरफ ये एक अच्छा कदम था जो रामसे बंधुओं के लिए महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आया।"

बड़े परदे से छोटे परदे पर आने पर साशा आगे कहती हैं कि "मेरे पिता की सोच प्रगतिशील थी। वो घर-घर तक अपने ब्रांड को पहुंचाना चाहते थे इसलिए टीवी पर आना एक सोचा समझा फैसला था। जब जी हॉरर शो आता था तब रात के नौ बजे पूरी बिल्डिंग में शो के थीम म्यूजिक की आवाज गूंजती थी क्योंकि सभी 70-80 घरों में एक साथ शो देखा जाता था जो बड़ी बात थी।"

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दो गज जमीन के नीचे - फोटो : फाइल
फिल्मों के प्रचार का अनोखा तरीका
फिल्म मेकिंग के साथ साथ इन्होंने अपनी फिल्मों के प्रचार में भी ध्यान लगाया। आज के दौर में कई बार फिल्मों की पब्लिसिटी के लिए फिल्म के किरदार मैदान में उतरते हैं।

रामसे ने उस दौर में बॉम्बे के एक सिनेमा हॉल में गिम्मिक किया था। जब टिकट लेकर लोग अंदर जाते थे तब भूत टिकट देखने आ जाता था जिससे खूब पब्लिसिटी मिली थी। फिल्म "दो गज जमीन के नीचे" के प्रचार के लिए रेडियो पर आधे घंटे का स्लॉट चला था और फिल्म को हाउसफुल की ओपनिंग मिली थी।

गहरा प्यार और तालमेल
रामसे ब्रदर्स के बीच न सिर्फ काम के मामले में अच्छा तालमेल था, इनके बीच गहरा प्यार और रिश्तों को निभाने का बेहतरीन जज्बा था। काम के वक्त एक दूसरे की मजबूत कड़ी को पहचानते थे और एक दूसरे के इशारों को समझ जाते थे।

कहा जाता है कि पैसा कई बार रिश्तों में दरार डालता है मगर इन भाइयों के बीच पैसों पर इनका रिश्ता भारी था। जब तक रामसे ब्रदर्स के पिता जीवित थे तब तक पैसों के मालिक वही थे और सभी भाइयों को वही पैसे देते थे। उनके बाद ये जिम्मेदारी बड़े भाई ने ईमानदारी से निभाई।

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रामसे ब्रदर्स - फोटो : फाइल
दीपक कहते हैं कि "पैसा बहुत कुछ होता है मगर इनके लिए जुनून उससे ऊपर था अच्छा करने के लिए। मेरे दादाजी के पास पैसे थे, कई कारोबार थे। वो पैसों के लिए नहीं, फिल्मों के प्रति अपने लगाव और जुनून की वजह से आए थे।" वहीं साशा कहती हैं कि "सारे भाई एक दूसरे के लिए जीते थे। आजकल आपने इस तरह के रिश्ते नहीं देखे होंगे। सभी भाइयों में बहुत जबरदस्त बंधन था।"

कुनिका लाल कहती हैं कि "इन सातों भाइयों के रिश्ते बहुत गहरे थे। तुलसी जी और श्याम जी निर्देशन करते थे। दोनों के बीच बेहतरीन तालमेल था। बहुत अच्छे से चर्चा करते थे और एक दूसरे को समझते थे।" आरती सुरेन्द्रनाथ कहती हैं कि "आज भी मैं उनके परिवार के संपर्क में हूं। उन्होंने रिश्तों को बहुत अच्छे से निभाया।''

तीसरी पीढ़ी भी हॉरर फिल्मों में
एक बार फिर रामसे बंधुओं के बैनर को खड़ा करने का प्रयास इनकी तीसरी पीढ़ी कर रही है। फिर से टीम तैयार है रामसे ब्रदर्स की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए। कुमार रामसे के बेटे गोपाल रामसे और श्याम रामसे की बेटी नम्रता रामसे लेखक हैं। तुलसी रामसे के बेटे दीपक रामसे निर्देशन पर काम कर रहे हैं। श्याम रामसे की एक और बेटी साशा रामसे क्रिएटिव राइटिंग और डायरेक्शन में हैं। सब मिलकर रामसे की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए और 2021 में, 70 के दशक की तरह साथ मिलकर काम करने को तैयार हैं।

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दीपक रामसे - फोटो : फाइल
दीपक रामसे ने "वो कौन थी" नाम की हॉरर फिल्म बना ली है। दीपक ने कहा कि "मैंने एक पूरी तरह से हॉरर फिल्म "वो कौन थी" बनाई है। नए कलाकारों को लेकर अच्छे संगीत के साथ ये फिल्म बनाई गई है। नए दौर में हमने अच्छे स्पेशल इफेक्ट्स और ग्राफिक्स का उपयोग किया है। अच्छे स्पेशल इफेक्ट्स और ग्राफिक्स की वजह से अब हॉरर फिल्म बनाना थोड़ा आसान हो गया है।"

वहीं साशा ने कहा कि "मैंने हमेशा अपने पापा को क्रिएटिव फील्ड में असिस्ट किया है। मैंने जो अपने पिता से सीखा है उसको लेकर हॉरर की इस विरासत को जरूर आगे बढ़ाऊंगी। मैंने पापा के साथ फिल्म 'वीराना' पर काम किया है और 'वीराना' की अहम किरदार जैस्मिन को दोबारा परदे पर नए अंदाज में लाऊंगी।"

एक-एक करके पांच भाई दुनिया से रुख़सत हो चुके हैं। कुमार रामसे और गंगू रामसे जीवित हैं जो काफ़ी बूढ़े हो चुके हैं। रामसे बंधुओं की कामयाबी के उन दिनों को उनके बच्चों के साथ-साथ उनकी फिल्म के कलाकार भी याद करते हैं।

दीपक कहते हैं कि "बचपन में हमें डर लगता था जब शूटिंग देखते थे। मेरे पापा और चाचा हमें मेकअप करते हुए आर्टिस्ट को नहीं देखने देते थे। मेकअप के बाद हाथ पकड़ कर ले जाते थे और उस भूत के सामने अचानक खड़ा कर देते थे। हमारे चेहरे पर खौफ का मंजर देख कर अंदाजा लगाते थे डर का। उस टाइम पर सात फीट का लंबा भूत अनिरुद्ध अग्रवाल बनते थे जो डरावने होते थे।"
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वो कौन थी - फोटो : बीबीसी हिंदी
साशा उन दिनों को याद कर कहती हैं कि "मैं अपनी फिल्मों के ट्रायल शो देखती थी। मैं अपने पापा श्याम रामसे के साथ एडिट पर जाती थी। भूत की डबिंग के लिए जब आर्टिस्ट आकर डरावनी आवाज बनाते थे तो बहुत मजा आता था।"

दीपक रामसे की हॉरर फिल्म "वो कौन थी" की रिलीज के बाद पता चलेगा कि नई पीढ़ी के ये फिल्मकार रामसे ब्रदर्स की विरासत को किस मुकाम तक ले कर जाएंगे।
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