रमेश देव
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‘खलनायकी ये शुरुआत करने वाले रमेश देव मराठी फिल्मों के मशहूर हीरो भी बने। हीरो बनने का पहला मौका उन्हें 1959 में रिलीज 'साता जनमाची सोब्ती' में मिल। हिंदी फिल्मों की तरफ उन्हें एक ऐसी घटना ने मोड़ा जिसका जिक्र यहां जरूरी है। ‘रत्नागिरी से लौटते समय एक बार पिताजी की कार पंचर हो गई। उनके साथ मेरी मां सीमा, राजा परांजपे, राजा गोसावी, शरद तलवलकर भी थे। धूल भले रास्ते थे। सबके कपड़ों और चेहरों पर धूल जमा थी। सब चाय पीने एक दुकान पर गए तो उसने एक अल्यूमिनियम के गिलास में पानी पकड़ा दिया। अच्छा गिलास मांगने पर चायवाले ने दुत्कार दिया। पिजाती ने कहा भी कि भई हम हीरो लोग हैं तो उसने दिलीप कुमार, राज कपूर और वैजयंतीमाला के एक पोस्टर की तरफ इशारा करते हुए कहा, हीरो ऐसे होते हैं।'