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'आखिरी सफलता' देखने से पहले ही दुनिया को अलविदा कह गए थे पंचम दा, जानिए उनसे जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें

Fri, 04 Jan 2019 08:34 AM IST
अपूर्वा राय एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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R D Burman
60 के दशक से 80 के दशक तक कई सुपरहिट गीत रचने वाले राहुल देव बर्मन यानी आर डी बर्मन का जन्म 27 जून 1939 को हुआ था। आर डी बर्मन ने आज ही के दिन साल 1994 में इस संसार को अलविदा कहा था। भारतीय फिल्म जगत में हमेशा याद रहने वाले नामों में से एक हैं राहुल देव बर्मन, जिनके नाम और काम से शायद ही कोई अनजान हो।
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pancham
पंचम दा से पहले और पंचम दा के बाद अब तक कोई ऐसा नहीं हुआ जिसने फिल्म इंडस्ट्री को इतने बेहतरीन और लाजवाब गाने दिए हों। फिल्मी दुनिया में आर डी बर्मन 'पंचम दा' के नाम से विख्यात थे और उन्होंने अपने करियर के दौरान लगभग 300 फिल्मों में संगीत दिया। आर डी बर्मन के पिता सचिन देव बर्मन जाने-माने संगीतकार और गायक थे और उनकी मां मीरा भी गीतकार थीं।
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आर डी बर्मन को फिल्मों में पहला ब्रेक महमूद की फिल्म 'छोटे नवाब' में मिला था। पंचम दा ने महमूद की फिल्म 'भूत बंगला' में एक्टिंग भी की थी। आर डी बर्मन को मिर्ची खाने का शौक था और वह अपने नर्सरी गार्डन में अलग-अलग तरह की मिर्ची उगाते थे।

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पंचम दा - फोटो : SELF
महज 9 साल की उम्र में पंचम दा ने अपना पहला संगीत “ऐ मेरी टोपी पलट के” को दिया, जिसे फिल्म “फ़ंटूश” में उनके पिता ने इस्तेमाल किया। कम ही लोगों को इस बात की जानकारी है कि आर डी ने जब पहली बार लता मंगेशकर को देखा, तो वह शॉर्ट्स पहने हुए ही उनका ऑटोग्राफ लेने आ गए थे। 
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शायद आप नहीं जानते होंगे कि आर डी बर्मन बर्मन को सबसे पहले निरंजन नामक फिल्मकार ने ‘राज’ के लिए 1959 में साइन किया था। आरडी ने दो गाने रिकॉर्ड भी किए। पहला गाना आशा भोसले और गीता दत्त ने तथा दूसरा शमशाद बेगम ने गाया था। यह फिल्म बाद में बंद हो गई।
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आर डी बर्मन
पंचम दा अपने जीवन के आखिरी दिनों में बिलकुल अकेले पड़ गए थे। इतनी कामयाबी पाने के बावजूद, संगीत और फिल्म जगत के कई नामचीन लोगों के इतने करीबी होने के बाद भी ऐसा हुआ। 80 के दशक में कुछ नाकामयाबी हाथ लगने के बाद आर डी बर्मन को फिल्में नहीं मिल रहीं थीं। काफी लंबे समय बाद 90 के दशक की शुरुआत में उन्हें विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म '1942 अ लव स्टोरी' में संगीत देने का मौका मिला। फिल्म के सारे गाने सुपरहिट साबित हुए लेकिन अफसोस कि इसकी कामयाबी देखने के लिए खुद आर डी बर्मन जिंदा नहीं थे। वो अपनी 'आखिरी सफलता' को देखने से पहले ही दुनिया से विदा हो चुके थे।
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