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Pritam Chakraborty EXCLUSIVE: क्या हुआ जब मिला गुलजार के गीत को संगीतबद्ध करने का मौका, जानिए खुद प्रीतम से

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डायरेक्टर प्रीतम चक्रवर्ती - फोटो : सोशल मीडिया
14 जून 1971 को कोलकाता में जन्मे हिंदी सिनेमा के मशहूर संगीतकार प्रीतम चक्रवर्ती ने कभी नहीं सोचा था कि उन्हें संगीतकार बनना है। हालांकि संगीत का माहौल बचपन से ही उनके घर पर रहा। प्रीतम के पिता  प्रबोध चक्रवर्ती मशहूर गिटार वादक थे और बच्चों को गिटार सिखाते थे। उनकी मां अनुराधा चक्रवर्ती का भी झुकाव संगीत की तरफ रहा है, लेकिन कभी भी उन्होंने इसे अपना प्रोफेशन नहीं बनाया। प्रीतम का संगीत से पहला परिचय उनके पिता ने ही कराया था, लेकिन उनके पिता नहीं चाहते थे कि प्रीतम संगीत के क्षेत्र में अपना करियर बनाएं। फिर कोलकाता से निकल कर प्रीतम ने इंडस्ट्री में कैसे धूम मचाई? आइए जानते हैं, खुद प्रीतम की कहानी, उन्हीं की जुबानी...
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डायरेक्टर प्रीतम चक्रवर्ती - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

सोचा नहीं था संगीतकार बनूंगा
बचपन में तो कभी ऐसा सोचा नहीं था कि आगे चलकर संगीतकार बनना है। अभी तो बहुत सारे प्रोफेशन हैं जिसमें करियर बनाया जा सकता है। हमारे जमाने में तो डॉक्टर, इंजीनियर, सीए के अलावा दूसरे प्रोफेशन के बारे में सोचते ही नहीं थे।मेरे पापा हमेशा से यही कहते थे कि म्यूजिक के क्षेत्र में मत जाओ, क्योंकि वह सुरक्षित काम नहीं है। तुम्हे कोई जॉब करना चाहिए। मेरे ध्यान में यह कभी नहीं था कि म्यूजिक को अपना प्रोफेशन बनाऊंगा। कोलकाता के बहुत ही लोअर मिडिल क्लास परिवार से मैं आता हूं। मुंबई आकर म्यूजिक के बारे में संघर्ष करने का न मेरा ड्रीम नहीं था और न ही हिम्मत।

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डायरेक्टर प्रीतम चक्रवर्ती - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

डैडी ने कराई संगीत से पहचान
मेरे डैडी  को म्यूजिक से बहुत प्यार था। वैसे तो वह रेलवे में काम करते थे। लेकिन मेरे घर पर म्यूजिक का स्कूल था और डैडी बच्चों गिटार सीखते थे। गिटार उनका बहुत ही फेवरेट था। म्यूजिक से मेरी जो पहचान हुई है, वह डैडी के वजह से ही हुई है। मम्मी को भी म्यूजिक का बहुत शौक है। मम्मी स्कूल टीचर थी, लेकिन कभी म्यूजिक को अपना प्रोफेशन  बनाने के बारे में नहीं सोचा था। डैडी को लगता था कि शौकिया तौर पर म्यूजिक ठीक है, लेकिन इसे प्रोफेशन नहीं बनाया जा सकता है। इसलिए वह चाहते थे कि पढाई करके कोई न कोई जॉब कर लूं। 

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डायरेक्टर प्रीतम चक्रवर्ती - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
साउंड इंजीनियरिंग के रास्ते आया
जब मेरा ग्रेजुएशन खत्म हुआ तो मैं जियोलॉजी में  एमएससी कर रहा था। लेकिन मेरा मन पढाई में  नहीं लग रहा था। शौकिया  पर एक म्यूजिक बैंड से जुड़ गया और मैं गिटार बजाता था। उस दौरान मैंने सोचा कि  यूपीएससी का एग्जाम  दूंगा, अगर आईईएस नहीं बन पाया तो बैंक या कहीं और जॉब कर लूंगा। उसी  दौरान मैने एक अखबार में पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट का एक विज्ञापन देखा। इससे पहले मुझे कभी मालूम भी नहीं था कि कोई फिल्म इंस्टीट्यूट होता भी है। उसमे साउंड रिकॉर्डिंग इंजीनियरिंग का एक कोर्स था। मेरे लिए यह अच्छा भी था, क्योंकि यह फिल्म मेकिंग से जुड़ा हुआ विषय है। मैं खुश हो गया क्योंकि यह मेरे रूचि का विषय था।  घर के लिए यह साउंड इंजिनियरिंग कोर्स था। इसलिए मैं घर पर बोल सका कि इंजीनियरिंग करने जा रहा रहा हूं।
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डायरेक्टर प्रीतम चक्रवर्ती - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
केदार आवती बने पहले मार्गदर्शक
मैं कोलकाता से पूना साल 1994 में आ गया। फिल्म इंस्टीट्यूट में आने के बाद मैं फिल्म इंडस्ट्री के करीब आ गया क्योंकि पूना से मुंबई नजदीक ही था। फिल्में  कैसे बनती है,  वह सब मैंने एक साल फिल्म इंस्टीट्यूट के कॉमन कोर्स में सीखा, जिसमे कैमरा, डायरेक्शन, एडिटिंग सिखाया जाता है। उसके बाद मैंने साउंड रिकॉर्डिंग इंजीनियरिंग का कोर्स किया। वहां के मेरे म्यूजिक प्रोफेसर केदार आवती  के साथ बहुत ही अच्छे संबंध बन गए । उनके वजह से फिल्म म्यूजिक कैसा होता है, सीखा। वहां पर आठ डिप्लोमा फिल्मों में म्यूजिक दिया। केदार आवती जी के साथ उनकी कुछ अंतरराष्ट्रीय फिल्मों में सहायक के तौर पर काम किया।
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डायरेक्टर प्रीतम चक्रवर्ती - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

राजू हिरानी ने कराई संजय गढ़वी से मुलाकात
पूना फिल्म इंस्टीट्यूट से मुंबई आने के बाद कुछ विज्ञापन फिल्में, टीवी सीरियल  के टाइटल सॉन्ग के लिए म्यूजिक देना शुरू किया। उन दिनों मैं राजकुमार  हिरानी के साथ विज्ञापन फिल्में ज्यादा करता रहा, उसी दौरान राजू हिरानी ने मेरी मुलाकात संजय गढ़वी से करवाई। वह संजय गढ़वी की एक फिल्म की एडिटिंग कर रहे थे। राजकुमार हिरानी पहले तो एडिटर ही थे। संजय गढ़वी से पहचान हुई तो उन्होंने फिल्म 'तेरे लिए' में काम दिया। जीत गांगुली के साथ इस फिल्म में जीत- प्रीतम के नाम से संगीत दिया। जब संजय गढ़वी यशराज फिल्म में आए तो उन्होंने हमें 'मेरे यार की शादी है' में संगीत देने का मौका दिया। बाद में जीत गांगुली के साथ जोड़ी टूट गई और मैं अकेला हो गया। फिर यशराज फिल्म की 'धूम' में काम करने का मौका मिला। इसके बाद प्रियदर्शन की  'गरम मसाला', अनुराग बसु की फिल्म 'गैंगस्टर' से सफर शुरू होता हुआ और आज 25 साल हो गए।

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डायरेक्टर प्रीतम चक्रवर्ती - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
छोटी फिल्म के रूप में बनी धूम
'धूम' से पहले संजय गढ़वी संजय दत्त को लेकर फिल्म 'किडनैप' बनाने वाले थे लेकिन उस समय संजय दत्त का केस चल रहा और संजय दत्त उसमें उलझे हुए थे। जिसकी वजह से फिल्म उस समय नहीं बन पाई। संजय गढ़वी को थोड़ा समय मिला तो उन्होंने सोचा कि क्यों न एक छोटी सी फिल्म बना ली जाए। फिर उन्होंने यशराज के साथ 'धूम' की प्लानिंग की। लेकिन 'धूम' रिलीज हुई तो सबसे बड़ी फिल्म बन गई। इस फिल्म से हम सभी को बहुत फायदा हुआ। मुझे अच्छी -अच्छी फिल्में मिलने लगी। संजय गढ़वी उस समय जब 'किडनैप' की प्लानिंग कर रहे थे तो उसमे म्यूजिक किसी और का था, लेकिन जब उन्होंने 'धूम 2' के बाद 'किडनैप' बनाई तो उसका संगीत मैंने ही दिया था।

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डायरेक्टर प्रीतम चक्रवर्ती - फोटो : सोशल मीडिया
हिंदी मेलोडी में पश्चिम का ऑर्केस्ट्रा
मैं पुराने हिंदी गाने सुनकर बड़ा हुआ हूं। जिसमें लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, आर डी बर्मन, सलिल चौधरी, मदन मोहन, जयदेव का म्यूजिक शामिल है। इसके साथ -साथ मैं रॉक बैंड भी बजाता था और उसके साथ -साथ पाश्चात्य संगीत भी सुनता था। इस तरह से मेरे अंदर दोनों का मिश्रण हो गया। मेरी  मेलोडी हिंदी मेलोडी होती है, जिसे मैं वेस्टर्न ऑर्केस्ट्रा से सजाता हूं। इस तरह से जब पाश्चात्य संगीत और भारतीय शास्त्रीय संगीत का समन्वय होता है तो एक नई धुन बनकर आती है।

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डायरेक्टर प्रीतम चक्रवर्ती - फोटो : सोशल मीडिया
समीर मेरे बड़े भाई जैसे
गीतकार समीर के साथ काम करने का बहुत ही अच्छा अनुभव रहा है। वह मुझसे बहुत ही सीनियर हैं। उनको मैं अपना बड़ा भाई मानता हूं और वह मुझे छोटे भाई जैसा प्यार देते हैं। उन्होंने नदीम -श्रवण, आनंद मिलिंद जैसे कई संगीतकारों के साथ काम किया है। मुझे हमेशा गाइड करते रहते थे। उनके साथ मैंने बहुत सारी फिल्में की हैं। कोई भी गीत वह चुटकियों में लिख देते हैं। उनके साथ काम करने की बहुत ही शानदार जर्नी रही है। उनसे हमेशा बातचीत होती रहती है। बहुत ही प्यारे इंसान हैं।

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गुलजार का गाना हाथ में आया तो रो पड़ा
मैं तो आर डी बर्मन साहब का बहुत बड़ा प्रशंसक हूं। गुलजार साहब ने उनकी फिल्मों के लिए बहुत सारे गाने लिखे हैं। पहली बार गुलजार साहब की बेटी मेघना गुलजार की फिल्म 'जस्ट मैरिड' में काम कर रहा था। उस फिल्म का जब पहला गाना गुलजार साहब ने लिख कर दिया, तो उस गाने को लेकर मैं वाशरूम में चला गया और  फूट -फूट कर रोया, मेरे आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि गुलजार साहब ने हमारे लिए गाने लिखे हैं, ऐसी मुझे फीलिंग हो रही थी। बचपन से ही आर डी बर्मन और गुलजार के गीत  सुनने -सुनते बड़ा हुआ हूं । गुलजार साहब के साथ हमारा एक फैन और स्टार का संबंध रहा है।

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जावेद अख्तर हमारे हीरो हैं
जावेद अख्तर ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने हम म्यूजिशियन के हक के लिए आवाज उठाई। हमें आज अगर आईपीआरएस से  पैसे मिल रहे हैं, तो वह  जावेद साहब की वजह से  ही मुमकिन हुआ है। जावेद साहब एक उम्दा कवि और गीतकार तो हैं ही, वह हम सब म्यूजिशियन के हीरो हैं। उनके साथ भी काम करने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ है।

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इरशाद, अमिताभ और सईद कादरी
नई पीढ़ी के गीतकारों में इरशाद कामिल और अमिताभ भट्टाचार्य से मेरी खूब जमती है। दोनों ही दोस्त हैं। उनसे थोड़ी लड़ाई और  थोड़ा प्यार भी होता है। मैं उनको फोन करके बोल सकता हूं कि गीत मीटर में नहीं बैठ रहे है फिर से लिख कर भेजें। लेकिन, समीर साहब, गुलजार साहब और जावेद साहब को ऐसा नहीं बोल सकते थे। समीर साहब के साथ बड़े भाई वाला एंगल था। वहीं जावेद साहब और गुलजार साहब के साथ हीरो वाला एंगल था। इरशाद कामिल और अमिताभ भट्टाचार्य दोनों बहुत ही कमाल के गीतकार हैं। मैं एक नाम और सईद कादरी का भी लेना चाहूंगा। मेरी फिल्मोग्राफी में इन तीनों का  बहुत बड़ा योगदान है।

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स्टार नहीं किरदार के हिसाब से संगीत
मैं किसी भी स्टार को ध्यान में रखकर म्यूजिक नहीं बनाता। मैं फिल्मों का संगीत किरदार को देखकर तैयार करता  हूं। कहानी की  सिचुएशन और किरदार कैसा है, उसी के हिसाब से गाने बनाते है। 'दंगल' का आमिर खान और 'लाल सिंह चड्ढा' का आमिर खान एक नहीं हो सकते। दोनों में किरदार अलग है। इसी तरह फिल्म 'बर्फी' का रणबीर कपूर और 'तू झूठी मैं मक्कार', या फिर 'ब्रह्मास्त्र'  का रणबीर कपूर एक नहीं है। रणबीर कपूर के लिए 'बर्फी' का जो फ्लेवर है वह अलग है, इसी तरह से  'तू झूठी मैं मक्कार', या फिर 'ब्रह्मास्त्र' के किरदार का फ्लेवर।

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रणबीर, सैफ, इमरान नहीं आते हैं सिटिंग पर
आमिर खान, शाहरुख खान तो हमेशा म्यूजिक सिटिंग में बैठते हैं। सलमान खान ने भी कई बार सुझाव दिया है कि ऐसा होना चाहिए। बाकी रणबीर कपूर, सैफ अली खान या फिर इमरान हाशमी कभी भी म्यूजिक पर हमारे साथ नहीं बैठे। जबकि सैफ अली खान, इमरान हाशमी, रणबीर कपूर के साथ मेरे सबसे ज्यादा हिट गाने हैं। म्यूजिक की समझ तो सभी स्टार को है। आमिर खान, सलमान खान, शाहरुख खान के अलावा रणबीर कपूर, रणवीर सिंह, वरुण धवन, कार्तिक आर्यन को संगीत की बहुत अच्छी समझ है। 

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