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Paresh Rawal Interview: छह छह घंटे तक चले मेरे चेहरे पर प्रयोग, पानी भी मुझे नली लगाकर पीना पड़ा...

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परेश रावल-स्टोरीटेलर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
हिंदी सिनेमा में अभिनेता परेश रावल की गिनती उन सितारों में होती है जो अपने सहज अभिनय से काल्पनिक किरदारों में जान फूंक देते हैं। फिल्म ‘अंदाज अपना अपना’ का तेजा, और फिल्म ‘हेराफेरी’ का बाबूराव गणपतराव आप्टे उनके दो सबसे लोकप्रिय किरदार रहे हैं। लेकिन, परेश ने एक लंबा सफर हिंदी सिनेमा में खलनायकों के किरदार करते हुए भी तय किया है। वह मानते हैं कि हिंदी सिनेमा एक भेड़चाल से चलता है, यहां एक बार जो किसी किरदार में चल पड़ा तो बाकी सब निर्माता भी फिर वैसा ही कुछ करवाना चाहते हैं।
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आंख मिचौली की स्टारकास्ट - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

अगली फिल्म ‘आंख मिचौली’

सोनी पिक्चर्स की अरसे से बन रही फिल्म ‘आंख मिचौली’ जल्द रिलीज होने वाली है। फिल्म ‘ओह माय गॉड’ और ‘102 नॉट आउट’ बना चुके निर्देशक उमेश शुक्ला की ये अगली फिल्म है। परेश बताते हैं, ‘उमेश शुक्ला ये विषय मेरे पास लेकर कोरोना संक्रमण काल के पहले आए थे। हमने इस पर लंबी चर्चा की और फिर जब बाकी सब कुछ फाइनल हो गया तो हमने कोई दो साल पहले इसकी शूटिंग पूरी कर ली थी। फिर किसी न किसी वजह से ये फिल्म टलती रही लेकिन मैं तारीफ करना चाहूंगा इसे बनाने वालों के हौसले की जो इसे सिनेमाघरों मे ही रिलीज करने के अपने फैसले पर डटे रहे।’
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डकैत-परेश रावल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

सब भेड़चाल से चलते हैं

‘आंख मिचौली’ के ट्रेलर के हिसाब से फिल्म में परेश रावल का किरदार हास्य और व्यंग्य दोनों की कलाएं खेलता दिखता है। लेकिन, हिंदी सिनेमा में परेश रावल का नाम कभी दमदार खलनायकों में शुमार रहा है। परेश कहते हैं, ‘हां, मैंने तो शुरुआत ही इस तरह के किरदारों से की थी फिल्म ‘डकैत’ से। लेकिन, यहां क्या है कि एक बार कोई कलाकार किसी खास किरदार में चल पड़ा तो फिर सब उससे वही काम कराना चाहते हैं। भेड़चाल जैसी शुरू हो जाती है हमारे यहां।’

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हेराफेरी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
 

कलाकार को दायरे में बांधने वाले निर्देशक पसंद

और, एक बार किसी विधा पर पकड़ आ जाए तो फिर उसे बार बार दोहराना कितना सहज हो जाता है? या फिर अब भी परेश अपने हर हास्य किरदार पर उतनी ही मेहनत करते हैं जितनी कि उन्होंने बाबूराव जैसे किरदार करने में की थी? वह बताते हैं, ‘कॉमेडी एक टीम वर्क है। ये आसपास के कलाकारों की प्रतिक्रियाओं और उनके संवादों से सहज होता जाता है। रही बात मेहनत की तो मुझे तो राजकुमार संतोषी, प्रियन सर, उमेश शुक्ला जैसे निर्देशक पसंद आते हैं जो ऐसे मौकों पर कलाकारों को उनके दायरे में बांधे रखते हैं। नहीं तो क्या है कि कलाकार कई बार अभिनय करते करते किरदार की रौ में बह जाता है। और मेहनत की आपने बात की तो मुझे फिल्म ‘सरदार’ याद आ गई!’

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सरदार - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

पानी भी मुझे नली लगाकर पीना पड़ा

केतन मेहता निर्देशित फिल्म ‘सरदार’ साल 1994 में रिलीज हुई फिल्म है जिसमें परेश रावल ने भारत को एक गणतंत्र बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले नेता सरदार वल्लभ भाई पटेल की भूमिका निभाई। परेश कहते हैं, ‘क्या ही कमाल की ये फिल्म थी। विजय तेंदुलकर ने बहुत ही अच्छी पटकथा लिखी थी और केतन मेहता ने बनाई भी बहुत शानदार थी ये फिल्म। इस फिल्म के लिए जैसे ही मेरा नाम घोषित हुआ, ये समझिए कि हिंदी सिनेमा मे काम करने वाले सारे मेकअप आर्टिस्ट मेरे चेहरे पर टूट पड़े। प्रयोगशाला बनाकर रख दिया था मेरा चेहरा। छह छह घंटे मेरे चेहरे पर प्रयोग होते रहते। पानी भी मुझे नली लगाकार पीना पड़ता था।’

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परेश रावल-संजू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

संजू के सामने हूं तो सुनील दत्त ही हुआ ना!

सिनेमा में किसी खास किरदार को करने के लिए उस जैसा दिखाने के लिए कलाकारों के चेहरे पर प्रोस्थेटिक मेकअप का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें चेहरे पर तमाम दूसरी चीजें चिपकाई जाती हैं। परेश रावल कहते हैं, ‘मैं तंग आ गया जब इस सबसे तो मैंने कहा कि मेरा जो चेहरा है, वह सब जानते हैं और जो किरदार मैं कर रहा हूं, उसे भी सब जानते हैं तो इस सबकी जरूरत नहीं है। इसके बाद फिल्म ‘सरदार’ मैंने बिना किसी प्रोस्थेटिक मेकअप के की। फिल्म ‘संजू’ में भी ऐसा ही हुआ। सुनील दत्त का किरदार करने के लिए मैंने प्रोस्थेटिक मेकअप का इस्तेमाल नहीं किया। मेरा तर्क यही था कि अगर सामने संजू है और मैं उसके पिता का रोल कर रहा हूं तो मैं तो सुनील दत्त ही हुआ ना!’
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