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Mohammed Rafi birthday: नाई की दुकान में काम करते-करते कैसे बने गायक, पढ़िए मोहम्मद रफी के जीवन के कुछ अनसुने किस्से

Fri, 24 Dec 2021 07:56 AM IST
वर्तिका तोलानी एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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mohammad rafi - फोटो : amarujala.com
महानगरी में कई गायक आए और कई चले गए, लेकिन बॉलीवुड के रफी साहब जैसी प्रतिभाएं अनंत काल तक जीवित रहती हैं। 24 दिसंबर,1924 को जन्मे रफी साहब जितने अच्छे फनकार थे, उतने ही अच्छे इंसान भी थे। अमृतसर के छोटे गांव कोटला सुल्तानपुर में रहने वाले रफी, अपने गांव के फकीर के साथ गीत गुनगनाया करते थे। धीरे-धीरे यह सूफी फकीर उनके गाने की प्रेरणा बनता गया और वह मोहम्मद रफी से उस्ताद मोहम्मद रफी बन गए। उनके 97वीं जयंती के मौके पर जानते हैं उनसे जुड़े कुछ अनसुने किस्से।
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मोहम्मद रफी - फोटो : Twitter

हिंदुस्तान की दिलों की धड़कन कहे जाने वाले रफी साहब का निकनेम फीको था।

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मोहम्मद रफी
रफी के बड़े भाई सलून चलाया करते थे। मोहम्मद रफी की पढ़ाई में कोई रूचि नहीं थी। ऐसे में उनके पिताजी ने उन्हें बड़े भाई के साथ सलून में काम सीखने के लिए भेज दिया था।

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मोहम्मद रफी
रफी के साले मोहम्मद हमीद ने रफी में प्रतिभा देखी और उनका उत्साह बढ़ाया। हमीद ने ही रफी साहब की मुलाकात नौशाद अली से करवाई। जिसके बाद उन्हें ‘हिंदुस्तान के हम हैं, हिंदुस्तान हमारा’ की कुछ लाइने गाने का मौका मिला।
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मोहम्मद रफी

रफी काी पहली सार्वजनिक परफॉर्मेंस 13 साल की उम्र में हुई, जब उन्हें महान केएल सहगल की एक संगीत कार्यक्रम में गाने की अनुमति दी गई।

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Mohammed Rafi
1948 में, रफी ने राजेंद्र कृष्ण द्वारा लिखित ‘सुन सुनो ऐ दुनिया वालों बापूजी की अमर कहानी’ गाया। इस गाने के हिट होने के बाद उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के घर में गाने के लिए आमंत्रित किया गया था।
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Mohammed Rafi

रफी साहब ने नौशाद के अलावा कई बड़े कम्पोजर्स के साथ काम किया था। एस.डी बर्मन, शंकर-जयकिशन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, ओपी नैय्यर और कल्य़ाणजी आनंदजी समेत अपने दौर के लगभग सभी लोकप्रिय संगीतकारों के साथ मोहम्मद रफी ने गाना गाया था।

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मोहम्मद रफी - फोटो : Twitter

रफी का अंतिम संस्कार मुंबई में हुआ था। तेज बारिश के बावजूद इसकी रिकॉर्डिंग की गई थी और उसी रिकॉर्डिंग का एक हिस्सा बाद में रिलीज हुई एक हिंदी फ़िल्म में इस्तेमाल किया गया है। यह मुंबई में अब तक के सबसे बड़े अंतिम संस्कार जुलूसों में से एक था, जिसमें 10,000 से अधिक लोग शामिल हुए थे।

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