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Mimi Movie Review: मराठी की क्लासिक फिल्म का दमदार हिंदी संस्करण, कृति की नेशनल अवार्ड की दावेदारी

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फिल्म मिमी - फोटो : अमर उजाला

फिल्म रिव्यू: मिमी

समृद्धि पोरे की मराठी फिल्म ‘मला आई व्हायचय’ पर आधारित
लेखक: लक्ष्मण उतेकर, रोहन शंकर
कलाकार: कृति सैनन, पंकज त्रिपाठी, साई तम्हणकर, मनोज पाहवा, सुप्रिया पाठक, जया भट्टाचार्य, एवलिन एडवर्ड्स आदि।
निर्देशक: लक्ष्मण उतेकर
ओटीटीजियो सिनेमा, नेटफ्लिक्स
रेटिंग: ****

चर्चित तापसी पन्नू जब कहती हैं कि विद्या बालन की फिल्म ‘डर्टी पिक्चर’ ने हिंदी सिनेमा में अभिनेत्रियों को लंबी पारी खेलने की एक नई पिच दी तो समझ आता है कि वह इशारा ऐसी फिल्मों की तरफ कर रही हैं जिन तक दर्शकों को खींचकर लाने के लिए किसी खान, कुमार या रोशन की जरूरत नहीं होती। विद्या बालन की फिल्म ‘डर्टी पिक्चर’ साल 2011 के दिसंबर में रिलीज हुई और इसी साल वैलेंटाइंस डे के ठीक तीन दिन पहले रिलीज हुई मराठी फिल्म ‘मला आई व्हायचय’ जिसमें अभिनेत्री उर्मिला कानितकर ने अपने अभिनय से एक ऐसी कहानी को जीवंत कर दिया, जिसकी तरफ देश में तो क्या दुनिया में भी कम ही लोगों का ध्यान गया था। सरोगेसी के कानून देश में अब तक स्पष्ट नहीं है और ये इसके बावजूद कि ‘मला आई व्हायचय’ को सर्वश्रेष्ठ मराठी फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुका है। दो साल बाद ये फिल्म तेलुगू में बनी ‘वेलकम ओबामा’ के नाम से और अब बारी ‘मिमी’ की है। लक्ष्मण उतेकर ने यहां फिल्म की नायिका को ठेठ गंवई न रखते हुए उसे थोड़ा मॉडर्न बनाया है, उसके संघर्ष में उसके परिवार को भी शामिल किया है लेकिन, फिल्म ‘मिमी’ समय की जरूरत है। कृति सैनन ने फिल्म ‘पानीपत’ के बाद एक बार फिर अपने अभिनय से चौंकाया है। दीपिका पादुकोण और कंगना रणौत के लिए अब संभलने की बारी है क्योंकि कृति सैनन उनके लिए बड़ा कंपटीशन बनने जा रही हैं। आलिया भट्ट पहले ही टॉप 3 की रेस से बाहर हो चुकी हैं।

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पंकज त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फिल्म ‘मिमी’ एक ऐसी युवती की कहानी है जो मुंबई जाकर हीरोइन बनना चाहती है। भूषण (कुमार) को जानने वाला कोई उसे म्यूजिक वीडियो में लॉन्च करना चाहता है। पोर्टफोलियो बनवाने की कीमत वह मुंबई के हिसाब से सही बताता है लेकिन राजस्थान के किसी छोटे शहर की लड़की के लिए वह औकात से बाहर की रकम है। मिमी के हीरोइन बनने के इस सपने को हवा देता है भानु। भानु पेशे से टैक्सी ड्राइवर है। एक फिरंगी जोड़े को किराए की कोख की तलाश भानु को मिमी तक ले आती है। मिमी मान भी जाती है। उसे लगता है लाखों रुपये जो उसे मिलने वाले हैं, उससे उसका हीरोइन बनने का सपना पूरा हो सकता है। कहानी यहां वाकई हो चुकी एक घटना से प्रेरणा लेती है और ये फिरंगी जोड़ा मिमी को गर्भवती हालत में ही छोड़कर अपने देश चला जाता है। अपनी सहेली के साथ एक मुस्लिम इलाके में बुर्का ओढ़कर छिपने वाली मिमी ये जानकारी मिलने पर अपना पेट संभाले पूरे मोहल्ले में दौड़ लगाती है। होटल जाती है। वापस अपने घर आती है तो उसके मां-बाप अपनी बेटी को इस हालत में देख टूट जाते हैं। लेकिन, यहीं से असली फिल्म शुरू होती है। मिमी हीरोइन बनने के अपने सपने का गला घोंट देती है लेकिन पेट में पल रहे बच्चे का गला घोंटने को तैयार नहीं होती। फिल्म यहां से सीन दर सीन ऊपर चढ़ती जाती है और क्लाइमेक्स तक आते आते फिल्म का जो रुआब बनता है, उससे मिमी एक दर्शनीय फिल्म बन जाती है।

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मिमी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘मिमी’ में कोई हीरो नहीं है। एक हीरोइन है। एक उसकी सहेली है। एक इन दोनों को जानने वाला है। और, हीरोइन के मां-बाप हैं। जाहिर है इन सबमें सबसे असरदार रोल कृति सैनन ने ही किया है। मिमी ठीक वैसा रोल है जैसा दीपिका पादुकोण से फिल्म ‘छपाक’ में उनके प्रशंसकों ने उनसे उम्मीद की थी। मिमी ठीक वैसा ही रोल है जैसा आलिया भट्ट के प्रशंसकों ने उनसे फिल्म ‘कलंक’ में उम्मीद की होगी और मिमी ठीक वैसा भी रोल है जैसा कंगना रणौत से उनके प्रशंसक फिल्म ‘मणिकर्णिका’ में कर रहे थे। अदाकारी के तराजू पर तौलें तो कृति सैनन ने इन तीनों से बेहतर अदाकारी फिल्म ‘मिमी’ में अपने इस किरदार के लिए की है। कृति सैनन के करियर का ये अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। ‘परम सुंदरी’ गाने में अपने सस्ते हाव भाव दिखाने वाली अभिनेत्री मां बनने के समय जब पूरा जबड़ा खींचकर चीखती है और ऊपर नीचे के दांतों के बीच फंसी लार के रेशे बनते हैं तो देखने वाला सिहर जाता है। कृति ने हर सीन में इक्कीस काम किया है। फिर चाहे वह पंकज त्रिपाठी के साथ वाले सीन हों, साईं तम्हणकर के साथ बुर्के पहनकर जाना हो या फिर अपने मां-बाप के सामने अपने टूटे सपनों का जुलूस निकलता देखना हो।

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फिल्म मिमी के कलाकार - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘मिमी’ को मजबूती इसके साथी कलाकारों से मिलती है। पंकज त्रिपाठी भी किसी कमर्शियल सिनेमा में अब तक का सबसे लंबा रोल पाने में सफल रहे हैं। ना तो वह इस बार किसी हीरोइन के पिता बने हैं और न ही किसी हीरो के साथ रहने वाले विदूषक। वह पुरुष कलाकारों में फिल्म के प्रधान रोल में हैं। पहले से शादीशुदा एक ड्राइवर जो थोड़े पैसों के लालच में एक ऐसी मानवीय परिस्थिति में उलझ गया है जहां उसे अनजाने परिवार में घर जमाई बनकर रहना पड़ रहा है। पंकज त्रिपाठी फिल्म के कैटालिस्ट हैं मतलब उत्प्रेरक। फिर फिल्म में मनोज पाहवा हैं। सुप्रिया पाठक हैं। साईं तम्हणकर हैं और अमेरिकी महिला के रोल में एवलिन एडवर्ड्स भी हैं। सबने अपनी अपनी पोजीशन बहुत मजबूती से संभाली है। यहां तक कि अरसे बाद कैमरे के सामने दिखीं जया भट्टाचार्य भी मौका मिलते ही गोल करने में सफल रहीं। फिल्म ‘मिमी’ परफेक्ट कास्टिंग का परफेक्ट नमूना है। पंकज झा भी अपना असर छोड़ने में सफल रहे हैं।
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फिल्म मिमी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
तकनीकी तौर पर देखी जाए तो फिल्म लक्ष्मण उतेकर के निर्देशन की असल पहचान है। पिछली बार फिल्म ‘लुकाछिपी’ में मामला नया था और थोड़ा उनका आत्मविश्वास भी डगमगाया सा था। लेकिन, यहां इस बार फिल्म ‘मिमी’ में सब परफेक्ट है। कहानी, पटकथा, अभिनय तीनों अव्वल नंबर। फिल्म गड़बड़ाती है आकर इसके संगीत पर। ए आर रहमान ने फिल्म की आत्मा समझने में फिर भूल की है। इतनी शानदार फिल्म का संगीत अगर जानदार होता तो ये फिल्म सालों साल तो सिर्फ अपने संगीत के लिए याद की जा सकती थी। रहमान के हाथ से डोर फिल्म के पहले ही गाने ‘पवन सुंदरी’ से छूट जाती है। कहीं से राजस्थान का एहसास नहीं होता। हां, आखिरी गाने ‘छोटी सी चिरैया’ में आकर कैलाश खेर रंग जमा जाते हैं लेकिन तब तक संगीत को लेकर दर्शक की उम्मीद ही टूट चुकी होती है।
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मिमी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
तकनीकी तौर फिल्म ‘मिमी’ में लक्ष्मण उतेकर की टीम मुस्तैद रही है। लक्ष्मण उतेकर खुद नामी सिनेमैटोग्राफर हैं तो उनकी फिल्म में ये डिपार्टमेंट तो मजबूत रहना ही है। आकाश अग्रवाल ने ये जिम्मेदारी अच्छे से निभाई है और राजस्थान को अच्छे से कैमरे में कैद किया है। ट्रांजीशन के लिए बार बार ड्रोन शॉट्स के इस्तेमाल से मनीष प्रधान बच सकते थे। शीतल शर्मा ने कॉस्ट्यूम फिल्म के मूड के हिसाब से ही गढ़े हैं। सुब्रत चक्रवर्ती और अमित रे की प्रोडक्शन डिजाइन से भी फिल्म ‘मिमी’ को काफी मदद मिली है। अभी वीकएंड तो दूर है, लेकिन तब तो फिल्म देखी ही जाएगी, उसके पहले भी मौका मिले तो ये फिल्म देखिएगा जरूर। हिंदी सिनेमा में ऐसी फिल्में रोज रोज बनती नहीं हैं।
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