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आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ: पुश्तैनी गांव को देख रो पड़े थे 'शहंशाह-ए-ग़जल' मेहदी हसन

Sun, 13 Jun 2021 08:05 AM IST
स्वाति सिंह एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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मेहदी हसन - फोटो : सोशल मीडिया
'रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ
'
शहंशाह-ए-गजल मेहदी हसन की आज यानी 13 जून 2020 को पुण्यतिथि है। 60 और 70 के दशक की शायद ही ऐसी कोई बड़ी फिल्म हो, जिसमें मेंहदी हसन का गाना न हो। साल 2012 में आज ही के दिन मेहदी हसन दुनिया से रुख्सत हुए थे। उन्होंने अपनी दिलकश आवाज से सबको अपनी गायकी का दीवाना बना दिया था। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि एक दौर ऐसा भी था जब उन्हें अपने ही वजूद के लिए लड़ना पड़ रहा था। भारत-पाकिस्तान के बंटवारे ने उन्हें आर्थिक और मानसिक रूप से तोड़ दिया था। 18 जुलाई 1927 को मेहदी हसन का जन्म राजस्थान के लूणा गांव में ही हुआ था। यहां बचपन बीता और जवानी के दिनों में भारत विभाजन के वक्त परिवार समेत पाकिस्तान चले गए थे। उनकी पुण्यतिथि के मौके पर हम आपको उनसे जुड़ी कुछ खास बातें बताएंगे।

गजल गायिकी मेहदी को विरासत में मिली थी। दरअसल, उनके दादा इमाम खान भी बड़े कलाकार थे, जो उस समय बड़े दरबारों में गाया करते थे। इसके अलावा मेहदी के पिता भी कलाकार थे जिस वजह से गाना उनके जीवन में उनके जन्म के साथ ही आया था। 
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मेहदी हसन - फोटो : सोशल मीडिया
मेहदी बहुत ही कम उम्र में संगीत में निपुण हो गए थे और बचपन से ही अपने भाई फाजिका बंगला के साथ परफॉर्म करने लगे थे। भारत में उनके परिवार ने अच्छी प्रतिष्ठा बना ली थी। मेहदी का करियर भी अच्छा चल रहा था। लेकिन सन् 1947 में भारत-पाकिस्तान के बंटवारे ने उनकी जिंदगी पूरी तरह से बदलकर रख दिया। उन्हें 20 साल की उम्र में अपने परिवार के साथ भारत छोड़कर पाकिस्तान जाना पड़ा था।
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मेहदी हसन - फोटो : सोशल मीडिया
वहां उन्हें अपने करियर को संवारने में कई सारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। अपने परिवार के भरण-पोषण लिए उन्होंने गाना छोड़ एक मैकेनिक के तौर पर काम करना शुरू कर दिया। यहां उन्होंने सबसे पहले एक साइकिल की दुकान में नौकरी की थी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी इसलिए नौकरी के साथ वे घर पर रियाज भी करते रहें।

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मेहदी हसन - फोटो : सोशल मीडिया
फिर साल 1952 में उनकी मेहनत रंग लाई और उन्हें रेडियो कराची में क्लासिकल गाना गाने का मौका मिला। उनके गाए गजल जैसे- रंजिश ही सही, बात करनी मुझे मुश्किल, गुलों में रंग भरे आदि बेहद मशहूर हुए। इसके बाद वो एक उभरते हुए गजल गायक के तौर पर सामने आएं। इसके बाद साल 1957 में उन्हें पाकिस्तानी रेडियो में गाने का मौका मिला। उनके हुनर को देखते हुए जल्द ही उन्हें जल्द ही फिल्मों के भी ऑफर मिलने लगे। साल 1962 में उनके गाए गजल जिस ने मेरे दिल को दर्द दिया, बहुत मशहूर हुआ। यहां से उनकी जिंदगी बदल गई। उन्होंने करीब 300 फिल्मों में साउंड ट्रैक दिया।
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मेहदी हसन - फोटो : सोशल मीडिया
इसके अलावा कई उम्दा नगमें भी पेश किए। मेहदी हसन के निजी जिंदगी की बार करें तो उन्होंने दो शादियां की थी। उनके 14 बच्चे थे। मेहदी हसन को किंग ऑफ गजल और शहंशाह-ए-गजल के नाम से जाना जाता है। साल 1978 में जब मेहदी हसन अपनी भारत यात्रा पर आए तो उस वक्त गजलों के एक कार्यक्रम के लिए वे सरकारी मेहमान बनकर जयपुर पहुंचे। यहां उन्होंने एक बार फिर उस जमीं का दीदार किया जहां उनके पुरखे दफन थे और उन्होंने अपना बचपन बिताया था। कहा जाता है कि जब मेंहदी हसन की गाड़ियों का काफिला उनके पैतृक गांव पहुंचा तो उन्होंने गाड़ी रुकवा दी। वो कार से उतरे, गांव में सड़क किनारे एक टीले पर छोटा-सा मंदिर बना था। उसके पास पड़ी रेत में लिपटकर ऐसे खेलने लगे जैसे बचपन लौट आया हो। 
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