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Kuchh Rang Kuchh Kahaniyan: जब दम भर को ठहर गई मुंबई की ये शाम, मनोज के कंठ ने सजाईं सुदर्शना की कहानियां

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कुछ रंग कुछ कहानियां बुक लॉन्च कार्यक्रम - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
मायानगरी उपनाम की तरह ही माया के पीछे भागती रहने वाली मुंबई महानगरी बीती शाम सांस लेने के लिए कुछ पल विश्राम करती नजर आई मुंबई विश्वविद्यालय के कुसुमाग्रज सभागार में। हिंदी साहित्य और पत्रकारिता जगत के दिग्गजों के इस मेले की शाम जिस नाम से रोशन हुई वह हैं सुदर्शना द्विवेदी। जितना सुदर्शन उनका व्यक्तित्व है, उतना ही मर्मस्पर्शी उनका कृतित्व भी रहा है। धर्मयुग साप्ताहिक पत्रिका के समय से ही साहित्य जगत का ध्रुवतारा रहीं सुदर्शना को रविवार की शाम चमकने को एक नया आसमान मिल गया, जिसमें उनकी कहानियों के पाठक, श्रोता और परिजन सब शुभकामनाओं की पतंगें उड़ाते नजर आए।
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कुछ रंग कुछ कहानियां बुक लॉन्च कार्यक्रम - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
लेखिका व पत्रकार सुदर्शना द्विवेदी’ की पुस्तक ‘कुछ रंग, कुछ कहानियां’ को पाठकों को सौंपने के लिए जो ये मेला जुटा, उसमें अभिनेता मनोज बाजपेयी भी आए। मनोज को इंटरनेट पर लोगों ने हिंदी कविताएं पढ़ते खूब सुना और देखा है। अपनी फिल्मों और सीरीज के संवाद भी वह हिंदी में ही भेजे जाने का पुरजोर दबाव बनाते रहते हैं। हिंदी सिनेमा में अमिताभ बच्चन की हिंदीप्रेमी विरासत को मनोज ने इस दौर में भी बहुत सहजता से संभाला है। वह हिंदी भाषी परिवारों के तो ‘फैमिली मैन’ ही बन चुके हैं।
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कुछ रंग कुछ कहानियां बुक लॉन्च कार्यक्रम - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
मनोज ने मुंबई विश्वविद्यालय परिसर में ढलती रविवार की शाम में अपनी सधी आवाज में ‘कुछ रंग, कुछ कहानियां’ के कुछ अंश जब पढ़े तो हर सुनने वाला मंत्रमुग्ध दिखा। मनोज के सस्वर वाचन और शब्दों के बहाव का अपना अनूठा अंदाज दिखा। और, मनोज जब बोले कि सुदर्शना जी की कहानियों में नारी की प्रधानता और उसके त्याग की पराकाष्ठा दिखाई देती है तो सब उनके भावों के प्रवाह में बहने से लगे। और, इस सरल बहाव में मनोज बाजपेयी का ये खुलासा एक नई ठांव बनकर आया कि सुदर्शना जी से उन्हें और गहराई से जोड़ने वाली एक दूसरी चीज है, ‘क्रिया योग’, जिसमें उन्हीं की तरह वह और उनका परिवार भी दीक्षित है।

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कुछ रंग कुछ कहानियां बुक लॉन्च कार्यक्रम - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
वरिष्ठ पत्रकार जयंती रंगनाथन ने इस मौके पर धर्मयुग में कार्य के दौरान अपने और सुदर्शना के बीच बने रिश्तों के बीच से निकलती गुरु शिष्य परंपरा की पवित्र धारा से श्रोताओं को विभोर किया और यह भी कहा, ‘सुदर्शना जी ने मुझे न सिर्फ जीवन जीना सिखाया, बल्कि कलम पकड़ना भी मैने उन्हीं से सीखा है। यह पुस्तक मेरी अपनी इस मां को गुरु दक्षिणा है।’ जयंती और इस कार्यक्रम की आयोजक रेखा बब्बल ने ही मिलकर इन कहानियों को तलाशा है और उन्हें एक संकलन का स्वरूप भी दिया है। इस मौके पर ढब्बूजी फेम वरिष्ठ लेखक व कार्टूनिस्ट आबिद सुरती ने भी धर्मयुग काल की स्मृतियां ताजा कीं।
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कुछ रंग कुछ कहानियां बुक लॉन्च कार्यक्रम - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
सुदर्शना द्विवेदी ने अपने आभार भाषण में मुंबई में लगी ठोकरें खोजीं और साथ ही वे साथी भी जिन्होंने उनका हर पाल साथ दिया। उन्होंने कहा, ‘इस शहर में आए मुझे 52 साल हो गए जिसमें से 45 साल मैं अकेली रही। लेकिन, इस शहर ने मुझे बेगाना नहीं समझा। झोली से ज्यादा और आंचल भरकर यहां मुझे प्यार मिला। आज आंखें गीली हैं, दिल भरा है, इतना प्यार मैं किस तरह संभालूं!’ कार्यक्रम का संचालन देवमणि पांडे तथा रेखा बब्बल ने किया।
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