चेतन आनंद, विजय आनंद और देव आनंद। तीनों भाइयों ने हिंदी सिनेमा का ऐसे नगीने दिए हैं, जिनकी चर्चा आज भी होती है। चेतन आनंद के बेटे केतन कहते हैं कि इन फिल्मों में से देव साहब की किसी भी फिल्म का रीमेक नहीं बन सकता। और न ही बनाना चाहिए। केतन आनंद फिर से सक्रिय हो रहे हैं। कैमरे के सामने और कैमरे के पीछे लंबा समय बिता चुके केतन आनंद की मंशा अपने चाचा देव आनंद के जीवन पर एक वेब सीरीज बनाने की भी है। इसके अलावा वह अपने पिता चेतन आनंद की कालजयी फिल्म ‘हकीकत’ का सीक्वल भी बनाना चाहते हैं। केतन आनंद से से ‘अमर उजाला’ की एक खास बातचीत।
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केतन आनंद, विजय आनंद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्मी पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों के लिए इंडस्ट्री में करियर बनाना कितना सहज होता है और आगे किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
एक तरह से इतने बड़े परिवार में पैदा होना वरदान होता है। लेकिन वरदान के साथ उसकी परछाई भी आती है। हम लोगों को उस परछाई को पार करके अपनी रोशनी चमकानी पड़ती है। जब तक परिवार के लोग जिंदा हैं तब तक आप उनके उजाले में रहते हैं। लेकिन उसके बाद अपना रास्ता बनाना बहुत बड़ी बात हो जाती है। मैंने विजय आनंद जी के लिए फिल्म 'हम रहे ना रहे हम' की थी। फिल्म अच्छी बनी थी, लेकिन रिलीज ठीक से नहीं हो पाई। परिवार से अलग एक फिल्म 'शर्त' बनाई थी वहां से मेरी अलग पहचान बनी। फिर गुलशन कुमार जी के लिए 'आजा मेरी जान' बनाई जिसमें उन्होंने अपने भाई किशन कुमार को लांच किया। उसके बाद मैंने पिताजी के साथ मिलकर धारावाहिक 'परमवीर चक्र' बनाया। इस धारावाहिक में हमारा पूरा परिवार शामिल था। सात एपिसोड का निर्देशन मैंने, सात एपिसोड का निर्देशन डैडी और एक एपिसोड का निर्देशन विजय आनंद साहब ने किया था। मेरे छोटे भाई विवेक आनंद इस धारावाहिक के कैमरामैन थे। दूरदर्शन पर यह सीरियल खूब चला।
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देव आनंद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आप अभिनय में भी सक्रिय रहे हैं, कब लगा अभिनय नहीं बल्कि कमरे के पीछे रहकर सिनेमा की विरासत को आगे बढ़ाना है?
हमारी पूरी फैमिली में यह बात रही है कि कुछ अलग करना है। देव साहब हर तरह की फिल्में करते थे। मुझे तो शुरू से ही निर्देशक ही बनना था। देव साहब की फिल्म 'तेरे मेरे सपने' में सहायक तौर पर जुड़ा। देव साहब ने पुछा कि क्या बनना चाहते हो, मैंने कहा कि मुझे तो डायरेक्टर बनना है। देव साहब बोले कि अगर डायरेक्टर बनाना है तो यह पता होना चाहिए कि कैमरे के सामने क्या होता है, मेरे साथ एक्टिंग करो। उन्होंने मुझे 'हरे रामा हरे कृष्णा' में एक छोटा सा रोल दिया। मैंने सभी काम किए। देव साहब से अभिनय की बारीकी और निर्देशन, गोल्डी साहब के साथ एडिटिंग, डैडी से पोस्ट प्रोडक्शन सीखा। प्रोफेशनल तौर पर 'हीर रांझा' मेरी पहली फिल्म थी जिसमे एसोसिएट प्रोड्यूसर और असिस्टेंट डायरेक्टर था। उसमें मैंने प्रोडक्शन का भी काम किया और निर्देशन भी सीखा।
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देव आनंद, विजय आनंद, चेतन आनंद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
बचपन में आपको कब लगा कि आपका परिवार फिल्मों में सक्रिय है और देव आनंद साहब बहुत बड़े सुपरस्टार हैं?
मेरे लिए यह कह पाना बहुत मुश्किल है। देव साहब तो हमारे चाचा थे। वह मुझे प्यार से घुसा गाय कहकर बुलाते थे। जब मैं बड़ा हुआ और उनकी फिल्म 'तेरे मेरे सपने' में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम किया तब मुझे अहसास हुआ कि मेरे चाचा बहुत बाद स्टार हैं। जिस तरह से लोग उनसे मिलते थे, लोगो का उनके प्रति दीवानगी देखकर मुझे पता चला कि मेरे चाचा बहुत बड़े स्टार हैं। पहली बार शूटिंग के दौरान उनकी ऊर्जा देखकर तो उसने काफी प्रभवित हुआ।
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देव आनंद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
पहली फिल्म देव आनंद साहब की कौन सी देखी?
याद नहीं आ रहा, क्योंकि हम सिनेमा देखते ही रहते थे। लेकिन यह कभी अहसास ही नहीं होता था कि हमारे चाचा इतने बड़े स्टार हैं। हमें ऐसा महसूस होता था कि चाचा बहुत अच्छे आदमी हैं हमेशा खुश रहते हैं और हमारे साथ खेलते रहते हैं। जब उनके साथ काम करना शुरू किया तब समझ में आया कि उनके अंदर काम के प्रति कितनी ऊर्जा है। आज मुझे 55 साल इंडस्ट्री में हो गए। देव साहब जैसी एनर्जी किसी के अंदर नहीं देखी। अंतिम समय तक उनके अंदर वहीं एनर्जी बरकरार रही।
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केतन आनंद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
स्कूल कॉलेज में जब लोगों को पता चला होगा कि आप देव साहब के भतीजे हैं, तो लोगो की किस तरह की प्रतिक्रिया होती थी?
कॉलेज में मेरी खूब रैंगिंग होती थी कि ये देव आनंद का भतीजा है, चलो परेशान करते हैं। मैं सोचता था कि ये मेरा कैसा चाचा कि जिसकी वजह से पिटाई हो रही है। हमारे परिवार में इतना सफल आदमी था और हमें पता ही नहीं था। एक कहावत है ना कि तालाब की मछली नहीं जानती है कि दूसरे तालाब की मछली कितनी बड़ी होती है। लेकिन जब मैंने देव साहब के साथ काम करना शुरू किया तब मुझे पता चला कि वह कितने बड़े स्टार हैं और पूरी दुनिया उनके अभिनय की दीवानी है।
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चेतन आनंद, केतन आनंद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
बचपन में देव आनंद साहब या फिर पिता चेतन आनंद की फिल्म की शूटिंग पर कब गए, उससे जुड़ी कुछ खास यादें?
डैडी की फिल्म 'फंटूश' थी। इस फिल्म को देव साहब ने ही प्रोड्यूस किया था। इस फिल्म में देव साहब और शीला रमानी की लीड भूमिका थी। उस समय मैं चौथी कक्षा में पढ़ रहा था। डैडी मेरे स्कूल आए और स्कूल से लेकर सीधे ताड़देव स्टूडियो गए जहां पर 'फंटूश' की शूटिंग चल रह थी। इस फिल्म में देव साहब और शीला रमानी पर एक गाना 'हमें आज कोई ना' फिल्माया गया था। देव साहब, शीला रमानी को ठेले पर बैठाकर यह गाना गाते हैं, उस गाने में ठेले के पीछे जो दो बच्चे भागते हैं, उनमें से एक मैं हूं। पहली बार इस फिल्म में मैंने कैमरा फेस किया था।
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केतन आनंद
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देव आनंद साहब की कौन कौन सी फिल्में आपको ज्यादा पसंद है?
फिल्म 'बाजी' को छोड़कर मैंने देव साहब की सभी फिल्में देखी है। 'बाजी' में गुरु दत्त साहब ने देव साहब को जैकेट में जो स्टाइल दिया था। उसे हमने बाद में कई फिल्मों में प्रयोग किया। जैकेट का फैशन बन गया। 'टैक्सी ड्राइवर' मुझे बहुत पसंद है। 'गाइड' तो ऐसी फिल्म थी जिसे सबने खूब पसंद किया। यह फिल्म तो देव साहब के करियर की मील का पत्थर साबित हुई थी। 'हम दोनो', 'काला बाजार' और 'आंधियां' मुझे बहुत पसंद है। 'आंधियां' डैडी ने बनाई थी। वह फिल्म कई फिल्म फेस्टिवल में सराही गई। लेकिन बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली थी क्योंकि उसका विषय थोड़ा गंभीर था। वह फिल्म एक सत्य घटना पर आधारित थी। वह फिल्म रूस, फ्रांस और चीन में भी रिलीज हुई थी। देव साहब ने जो भी किरदार निभाए पूरे रोमांस के साथ निभाए। उनका दिल हमेशा साफ रहता था। तीनों भाइयों में एक समानता यह थी कि कभी किसी के मुंह से गाली नहीं निकलती थी।
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केतन आनंद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
देव आनंद साहब की कौन सी फिल्मों का रीमेक बन सकता है और ऐसी कौन सी फिल्में हैं, जिसका रीमेक नहीं बनाया जा सकता है?
देव साहब की किसी भी फिल्म का रीमेक नहीं बन सकता है। देव साहब लिखकर गए हैं कि मेरी जितनी भी फिल्में नवकेतन में बनी हैं, उनका रीमेक नहीं बने। अभी जो सीरीज मैं बना रहा हूं। यह भी नहीं बन पाती। लेकिन, इसके लिए मैंने देव साहब के बेटे सुनील आनंद से रिक्वेस्ट की। मैंने कहा कि अपने अंकल और तुम्हारे पिता जी की सेलिब्रेशन कर रहा हूं। इसमें पूरी इंडस्ट्री आकर अपनी कहानी बताएगी। इसमें देव साहब के साथ काम करने वाले लोगों का कैसा अनुभव है, यह सब चीजें इसमें शामिल करेंगे। जहां जहां देव साहब गए हैं, जिनसे भी मिले हैं। उन सबसे मिलकर इस सीरीज में उनके अनुभव को शामिल करूंगा।
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केतन आनंद
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देव आनंद साहब पर सीरीज बनाने का ख्याल कब आया ?
यह आइडिया मुझे बहुत पहले पत्रार अली पीटर जॉन ने दिया था। वह हमारे परिवार के बहुत करीब और देव साहब के पसंदीदा जर्नलिस्ट थे। उन्होंने मुझे एक दिन देव साहब के 98वें जन्मदिन के एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया । वहां बैंकर, वकील, जज, बहुत सारे बिजनेसमैन देव साहब के गानों पर स्टेज पर परफॉर्म इतने प्रोफेशनल तरीके से कर रहे थे जिसे देखकर मैं दंग रह गया। मैंने कहा कि मैं बहुत खुश हूं कि आप लोग देव आनंद साहब का जन्मदिन मना रहे हो। लेकिन मैं रिक्वेस्ट करता हूं कि उनकी डेथ एनिवर्सरी नहीं मनाएंगे, क्योंकि वह लीजेंड हैं और लीजेंड कभी मरते नहीं है। अली ने कहा कि आप उनके 100 वे जन्मदिन पर कुछ करो। तब मैंने सोचा कि इस पर एक सीरीज बनाऊंगा।
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केतन आनंद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
किस तरह के घटनाक्रम होंगे इस सीरीज में?
इस सीरीज में देव आनंद साहब की झलकियां भी होंगी। उनके काम करने का स्टाइल,एटीट्यूड, उनकी ऊर्जा का भी जिक्र होगा। वह किस तरह से लोगों को से वह पेश आते थे, लोगो से कितना प्यार करते थे। देव आनंद साहब ऐसे शख्स रहे हैं जो पूरी जिंदगी खुद ही फोन उठाते थे। उनका कोई सेक्रेटरी नहीं रहा। पूरे करियर में उनकी मृत्यु तक कोई बॉडीगार्ड नहीं था। कहीं भी अपने ड्राइवर के साथ अकेले ही जाते थे। उनके अंदर किसी का डर नहीं था। सरकार से लड़कर उन्होंने नेशनल पार्क शुरू कराया। यह सारी बातें सीरीज में बताऊंगा। जब इमरजेंसी लगी तो देव साहब को पार्टी में बुलाया गया था लेकिन देव साहब और किशोर कुमार नहीं गए तो उन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इस सारी बातों का जिक्र इस सीरीज में होगा। इस सीरीज का थीम यही है कि 'जमाना बदलता गया,लेकिन देव आनंद चलता गया, जिंदगी का साथ निभाता चला गया।'
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केतन आनंद
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'हकीकत 2' को लेकर क्या तैयारियां चल रही हैं?
इस फिल्म को लेकर पूरी तैयारी चल रही है, इस फिल्म की शूटिंग देव साहब की सीरीज के बाद शुरू करेंगे। फिल्म 'हकीकत 2' वहीं से शुरू होगी जहां पर हकीकत खत्म हुई थी। इस फिल्म में डैडी ने एंड नहीं दिखया था, वह मुझे उसी समय बता दिए थे कि ये कम्बख्त एक दिन फिर वापस आएंगे। और, वैसा हुआ भी। गलवान का युद्ध इसका जीता जागता उदाहरण है।
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शर्त का पोस्टर
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डैडी चेतन आनंद के सिनेमा का आप पर कितना प्रभाव रहा है ?
डैडी बहुत ही अलग तरह के फिल्म मेकर रहे हैं। उनके अंदर बहुत ही गहराई थी। उन्होंने ज्यादा फिल्में बनाई नहीं है, लेकिन जो बनाई है उनमें अजीब गरीब गहराई रही है चाहे वह चले या ना चले। उनकी सिनेमा में एक जबरदस्त संदेश होता था। डैडी ने परिवार से अलग भी 'हकीकत' और 'हीर रांझा' जैसी फिल्में बनाई। मैंने भी 'शर्त' बनाई। यह फिल्म सीरियल किलर पर आधारित थी। उस समय नेगेटिव हीरो का दौर भी नहीं था। आज तो हर हीरो निगेटिव है। हम भी थोड़ा हटके चले हैं और आगे भी करेगे। लेकिन मुख्यधारा की सिनेमा को आप नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। अच्छा सिनेमा अच्छा हमेशा चलेगा। चाहे वह 'हीर रांझा', 'हकीकत', 'गाइड' या फिर कोई और फिल्में हो, सभी हिट रही हैं। इन्हें आप क्लासिक सिनेमा कह सकते हैं।
आपके डैडी की 'नीचा नगर' पहली फिल्म थी, इस फिल्म से जुड़ी कुछ खास यादें डैडी ने शेयर की हो ?
डैडी नहीं, उस फिल्म के बारे में मम्मी उमा आनंद बताती थी। वह फिल्म की लीड हीरोइन थी। वह बताती थी कि किस तरह से संघर्ष करके डैडी ने फिल्म बनाई थी। यह उस समय की फिल्म है जब हमें आजादी नहीं मिली थी। इसलिए उस फिल्म को एंटी ब्रिटिश फिल्म नहीं दिखा सकते थे। फिर भी इस फिल्म के माध्यम से यह संदेश सत्याग्रह आंदोलन को दिखाया गया था कि गांव के लोग हैजे से मर रहे हैं, लेकिन अपना इलाज करवाने ब्रिटिश के बनवाए अस्पताल में नहीं जाते हैं। शेखर कपूर की फिल्म 'पानी' इसी फिल्म से इंस्पायर थी, लेकिन वह फिल्म बनी। इस फिल्म से प्रभावित होकर सत्यजीत रे ने पिताजी को पत्र लिखा था कि आपकी फिल्म देखकर इतना प्रभावित हुआ हूं कि मैं नौकरी छोड़कर फिल्ममेकर बनने वाला हूं। फिर उन्होंने 'पाथेर पांचाली' बनाई।