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कंगना रणौत और शिवसेना का विवाद: राज ठाकरे की चुप्पी के क्या हैं मायने?

Mon, 14 Sep 2020 05:27 PM IST
shrilata biswas बीबीसी हिंदी
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राज ठाकरे, कंगना रनौत - फोटो : twitter@RajThackeray, instagram/kanganaranaut
"मुंबई से ठाकरे ब्रांड को नष्ट करके महाराष्ट्र पर कब्जा करने की साजिश अब सबके समझ में आई है। राज ठाकरे भी इसी ब्रांड का हिस्सा हैं और भविष्य में उन्हें भी इससे समस्या हो सकती है। शिवसेना के साथ उनके मतभेद हो सकते हैं, लेकिन महाराष्ट्र में ठाकरे ब्रांड ही चलना चाहिए।" शिवसेना नेता संजय राउत ने कंगना रणौत मसले पर राज ठाकरे के लिए ये शब्द लिखे। पिछले कुछ दिनों में अभिनेत्री कंगना रणौत बनाम शिवसेना का विवाद पूरे देश में छाया हुआ है। 
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कंगना रणौत (फाइल फोटो) - फोटो : Twitter @KanganaTeam
कंगना ने मुंबई पुलिस पर अविश्वास व्यक्त करने के बाद मुंबई को "पीओके" और "पाकिस्तान" तक की उपमा दे डाली, लेकिन महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष राज ठाकरे ने चुप्पी साध रखी है। कंगना ने शिवसेना को खुली चुनौती दी थी कि "मुंबई आने से मुझे रोकने वालों, मुंबई किसी के बाप की नहीं है।" उसके बाद संजय राउत ने उन्हें जवाब दिया कि "मुंबई मराठी मानुष के बाप की है।" भारतीय जनता पार्टी ने कंगना का पक्ष लिया है और महाराष्ट्र के सत्ताधारी शिवसेना-कांग्रेस-एनसीपी कंगना पर टिप्पणी करते आ रहे हैं।
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संजय राउत - फोटो : ANI
राज ठाकरे चुप क्यों
नए राजनीतिक समीकरण की वजह से राज ठाकरे शांत हैं और सोशल मीडिया पर चर्चा है कि मुंबई और मराठी मानुष के मसले पर अब तक चलने वाली मनसे मुंबई को "पीओके" और "पाकिस्तान" कहने के बाद भी कैसे शांत है। शिवसेना के मुख्यपत्र सामना में संजय राउत ने एक लेख लिखा है। इस लेख में उन्होंने राज ठाकरे का जिक्र करते हुए सवाल उठाया हैं कि मुंबई और महाराष्ट्र की बदनामी होने के समय वो शांत कैसे बैठे हैं।

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संजय राउत, कंगना रणौत - फोटो : twitter@rautsanjay61, instagram/kanganaranaut
संजय राउत ने लिखा है, "महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई को ग्रहण लगाने की कोशिश की जा रही है। ये ग्रहण बाहर के लोग लगा रहे हैं। मुंबई को पाकिस्तान और बाबर कहने वालों के पीछे भारतीय जनता पार्टी खड़ी है, ये दुखद है। सुशांत और कंगना के पीछे खड़े होकर भाजपा बिहार में चुनाव लड़ना चाहती है। बिहार में उच्चवर्णीय राजपूत और क्षत्रीय मतों को हासिल करने के लिए ये सब किया जा रहा है। उसके लिए महाराष्ट्र का अपमान हुआ तो भी उनको हर्ज नहीं। ठाकरे और पवार महाराष्ट्र के स्वाभिमान के ब्रांड हैं। मुंबई में से इस ब्रांड को नष्ट करने और महाराष्ट्र पर कब्जा करने की साजिश अब सबको समझ में आ रही है। राज ठाकरे भी इसी ब्रांड का हिस्सा हैं और भविष्य में उन्हें भी इससे समस्या होगी। शिवसेना के साथ उनके मतभेद हो सकते हैं, लेकिन महाराष्ट्र में ठाकरे ब्रांड का ही जोर होना चाहिए। जिस दिन ठाकरे ब्रांड खत्म हो जाएगा, उस दिन मुंबई खत्म होने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।"
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कंगना रणौत - फोटो : ANI
कंगना मसले पर राज ठाकरे दोनों तरफ से घिर गए हैं। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि संजय राउत ने इस मसले पर राज ठाकरे को घेर लिया है। कंगना की ओर से मुंबई को "पीओके" और "पाकिस्तान" कहने के बावजूद भी राज ठाकरे ने इस पर एक भी प्रतिक्रिया नहीं दी है। सवाल पूछा जा रहा है कि मुंबई पुलिस और मराठी मानुष के मुद्दे पर आक्रामक रुख रखने वाली मनसे चुप क्यों है? संजय राउत के लेख पर मनसे के नेता संदीप देशपांडे ने कहा कि जब मनसे को जरूरत थी, तब शिवसेना चुप थी।
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राज ठाकरे - फोटो : अमर उजाला
बीबीसी मराठी सेवा से बात करते हुए उन्होंने कहा, "मनसे का पक्ष राज ठाकरे जब पेश करेंगे, तब करेंगे। लेकिन 2008 में मनसे बाहर के लोगों के खिलाफ लड़ रही थी, तब राज ठाकरे के साथ बोलने के लिए शिवसेना के सांसद चुप थे। शिवेसना ने जब मनसे के छह पार्षद चुराए, तो किसी ने कुछ नहीं बोला। 2014 और 2017 में बाहर के लोगों के खिलाफ लड़ने के लिए राज ठाकरे ने आह्वान किया, तब शिवसेना शांत थी।" संदीप देशपांडे ने स्पष्ट किया कि ये उनकी व्यक्तिगत राय है। मनसे चित्रपट सेना के अध्यक्ष अमेय खोपकर ने कुछ दिन पहले कंगना के मुंबई पुलिस पर दिए बयान की निंदा करने वाला एक पत्र जारी किया था। लेकिन राज ठाकरे ने अब तक कुछ नहीं कहा है।
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राज ठाकरे - फोटो : ANI
राजनीतिक विश्लेषक प्रकाश अकोलकर कहते हैं, "इस पूरे मसले पर राज ठाकरे की चुप्पी का मतलब है कि कंगना का विरोध करने से लगेगा कि नरेंद्र मोदी और भाजपा का विरोध कर रहे हैं। इसलिए राज ठाकरे असमंजस में है। 2019 विधान सभा चुनाव में राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की भूमिका में बहुत बदलाव किए। लोक सभा चुनाव के वक्त जो मोदी-शाह के खिलाफ बोलते थे, वो अब मोदी-शाह का गुणगान कर रहे हैं।" मनसे की वर्षगांठ पर उन्होंने हिंदुत्ववाद का नारा दिया था और अपना झंडा आधिकारिक तौर पर भगवा कर दिया। कंगना रणौत के बयान के बाद भी भाजपा नेता उनके पीछे खड़े रहे हैं और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कंगना को वाई प्लस सुरक्षा दे दी।

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कंगना रणौत - फोटो : PTI
वरिष्ठ पत्रकार वैभव कुरेंदरे कहते हैं, "राज ठाकरे को अगर बोलना होता, तो वो अब तक बोल चुके होते, लेकिन वो अभी तक बोले नहीं है। इसका मतलब उनका ये कोई राजनीतिक कदम होगा। शिवसेना बदनाम हो रही हो और महाराष्ट्र के सत्ता पक्ष के खिलाफ लोग बोल रहे हैं, तो विपक्षी नेता के तौर पर मनसे को वो चाहिए। इसलिए वो अब तक चुप्पी साधे हुए है।" वैभव कुरेंदरे कहते हैं कि संजय राउत के राज ठाकरे को आह्वान करने के दो कारण हो सकते हैं। वे कहते हैं, "उद्धव ठाकरे पर कंगना की तरफ से जो टिप्पणियां की जा रही हैं, वो व्यक्तिगत नहीं है। बल्कि वो उनके काम करने के तरीके और निर्णय क्षमता पर है, इसलिए राज ठाकरे इस पर अभी विचार नहीं कर रहे होंगे। और दूसरा मुद्दा है कि शिवसेना को इस मसले में मनसे की वास्तव में जरूरत हो सकती है और व्यक्तिगत तौर पर भी उनकी अपेक्षा हो सकती है।"

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राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे - फोटो : पीटीआई
राज ठाकरे क्या असमंजस में हैं?
महाराष्ट्र की राजनीतिक परिस्थिति अभी अस्थिर है। एक दूसरे से अलग विचारधारा वाले तीन दल मिलकर सत्ता में आए हैं और जिसे सबसे ज्यादा सीटें मिली हैं, वो भाजपा सत्ता से बाहर है। इसी परिस्थिति में मनसे अपना अस्तित्व टटोलकर देख रही है। महाराष्ट्र में जब कोई सत्ता में नहीं आया था, तब देवेंद्र फडणवीस और राज ठाकरे एक दूसरे से मिल रहे थे और उसके बाद भी मनसे ने ठाकरे सरकार पर बार-बार टिप्पणियां की हैं। उद्धव ठाकरे की सरकार के काम का लेखा-जोखा देखने के लिए भी मनसे ने सर्वे किया था। अयोध्या में राम मंदिर का भूमि पूजन हुआ था, उसपर भी राज ठाकरे ने नरेंद्र मोदी की वाह-वाही की थी।

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राज ठाकरे - फोटो : ANI
इस बारे में पत्रकार सचिन परब कहते हैं, "ऐसा भी हो सकता है कि राज ठाकरे अभी कोई स्टैंड नहीं ले पा रहे हैं, क्योंकि उनको लगता है कि अगर वो कंगना के मसले में बोलेंगे तो भी मनसे को ज्यादा फायदा नहीं होगा। भविष्य में मनसे को भाजपा के साथ जाने का एक विकल्प है। कहा जाता है कि उसके लिए मनसे तैयारी कर रहा है। इस बात को हम नकार नहीं सकते कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मनसे भाजपा को मदद करेगा।" प्रकाश अकोलकर कहते हैं कि मनसे को फिर से जनता के करीब जाने के लिए किसी प्रभावी नैरेटिव की जरूरत है। मुंबई के मुद्दे पर मनसे का शांत रहना लोगों को अपेक्षित नहीं है। वो कहते हैं कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि मनसे का असमंजस की स्थिति में रहना उनके लिए ही नुकसानदायक है।

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राज ठाकरे - फोटो : ANI
राज अपने बड़े भाई के पीछे खड़े होंगे?
शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे के लाडले रहे राज ठाकरे ने 2005 में शिवसेना छोड़कर मनसे तैयार की।
मनसे और शिवसेना में कई बार टकराव भी दिखा। लेकिन राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे को राजकीय दृष्टि से एक रखने के लिए बहुत बार कोशिशें हुईं। इसलिए व्यक्तिग स्तर पर उनके एक साथ आने का भी उदाहरण है। मिसाल के तौर पर राज ठाकरे के शिवसेना छोड़ने के बाद बालासाहब ठाकरे ने अपील की थी कि उड़ चुका पंक्षी वापस आ जाए। राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे को फिर से मिलाने के लिए माई मूवमेंट नाम का आंदोलन शिवसैनिकों ने चलाया था और उसे भी बालासाहब ठाकरे ने कराया था।

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महाराष्ट्र सीएम उद्धव ठाकरे - फोटो : Twitter
2012 में लीलावती अस्पताल में एंजियोग्राफी के लिए उद्धव ठाकरे गए थे, तो उनके साथ राज ठाकरे गए थे। जब वापस आए तो खुद गाड़ी चलाकर राज ठाकरे ने उद्धव ठाकरे को छोड़ा था। 2013 में राज ठाकरे ने अपना एक हाथ आगे किया था, लेकिन उद्धव ठाकरे ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। 2014 में बालासाहब ठाकरे के जन्मदिन पर दोनों एक ही मंच पर थे। 2014 में राज ठाकरे की तबीयत पूछने के लिए उद्धव ठाकरे ने फन किया था और तब ऐसी चर्चा हो रही थी कि दोनों मिलकर चुनाव लड़ेगे। 2017 में जब शिवसेना और भाजपा का महानगरपालिका का चुनाव में गठबंधन टूट गया, तब फिर से शिवसेना और मनसे के एक होने की चर्चा शुरू हो गई थी। राज ठाकरे ने भरी सभा में कहा था कि जब मैंने उद्धव ठाकरे को फोन किया, तो उन्होंने फोन नहीं उठाया था। उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री पद के शपथग्रहण समारोह में राज ठाकरे मौजूद थे और राज ठाकरे के बेटे अमित ठाकरे की शादी में उद्धव ठाकरे परिवार समेत मौजूद थे।
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उद्धव ठाकरे, राज ठाकरे - फोटो : ANI
मनसे की महानगरपालिका चुनाव की तैयारी
लॉकडाउन से पहले विपक्षी भाजपा ने महाविकास अघाड़ी पर निशाना साधने का एक भी मौका नहीं छोड़ा और इसमें मनसे ने भी साथ दिया था। बिजली का बहुत ज्यादा बिल आना, मंदिर और जिम खोलना, स्कूल की फ़ीस कम करना, राज्य की बिगड़ी अर्थव्यवस्था समेत कई मुद्दों पर राज ठाकरे ने महाराष्ट्र सरकार को घेरा है। ऐसा लग रहा है कि अब पंचायत राज और महानगरपालिका के चुनाव आ रहे हैं, तो उसकी पूर्व तैयारी मनसे ने की है। इसलिए उन्होंने लोगों की भावना समझने के लिए सर्वे भी किए हैं। वरिष्ठ पत्रकार संदीप प्रधान कहते हैं कि कोरोना संकट में मनसे के चुनाव चिन्ह इंजन को ट्रैक पर लाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। वो कहते हैं कि आने वाले इन चुनावों में ये मनसे का प्रमुख लक्ष्य है। इसके लिए मनसे ने तैयारी शुरू की है और मनसे स्थानीय मुद्दों पर राजनीति कर रही है।
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