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Ajit Khan: जिसे सारा शहर ‘लॉयन’ के नाम से जानता था, उसे इस हीरो ने बनाया बॉलीवुड का खतरनाक विलेन

Wed, 27 Jan 2021 06:23 PM IST
विजयाश्री गौर अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
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अजीत खान - फोटो : फाइल
हामिद अली खान के नाम से हैदराबाद में जन्में दिग्गज अभिनेता को दुनिया अजीत के नाम से जानती है। लगभग चार दशक लंबे इनके फिल्मी करियर में इनके प्रशंसक अजीत के बोलने के अंदाज के कायल रहे। अजीत को याद तो एक नायक के रूप में किया जाता है लेकिन उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत एक नायक बनने से की थी। ये बात अलग है कि उनका नाम नायक के रूप में चल नहीं सका तो वह खलनायक बन गए। अजीत ने अपने फिल्मी करियर में बहुत ही बेहतरीन फिल्मों में काम किया है, उनके जन्मदिन पर इनमें से 10 दमदार किरदारों के बारे में आपको बताते हैं।
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बेकसूर - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
बेकसूर (1950)

अजीत जब अपनी किताबें बेचकर हैदराबाद से मुंबई अभिनेता बनने के लिए चले आए तो उन्हें यहां बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ा। उन्हें एक अभिनेता तो बनना ही था इसलिए वह एक मुख्य काम की तलाश में न रहते हुए जूनियर आर्टिस्ट ही बन गए। शुरुआती दौर में उन्होंने 'कुरुक्षेत्र', 'पतंगा', 'जीवनसाथी' जैसी फिल्मों में काम किया। इन फिल्मों में अजीत को हामिद अली खान के नाम से जाना गया। जब 1950 में आई फिल्म 'बेकसूर' में अजीत ने मशहूर फिल्मकार के. अमरनाथ के साथ काम किया तो अमरनाथ ने ही अजीत का नाम हामिद से बदलकर अजीत रख दिया। इस फिल्म में अजीत मधुबाला के साथ नजर आए और यह फिल्म साल की सबसे बड़ी हिट साबित हुई। फिल्म से मधुबाला तो चमक ही गई थीं, साथ ही अजीत भी इस फिल्म के साथ एक हीरो के रूप में लोगों की नजरों में आ गए।
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नास्तिक - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
नास्तिक (1954)

अजीत खान लगातार नायक बनकर फिल्मों में काम करते रहे और वर्ष 1954 में वह एक नायक की भूमिका निभाते हुए नजर आए क्राइम ड्रामा फिल्म 'नास्तिक' में। इस फिल्म का निर्देशन आई एस जौहर ने किया। इस फिल्म की कहानी देश के विभाजन के वक्त पर आधारित है। कहानी एक आदमी की है जो विभाजन के वक्त हुए दंगों में अपने माता पिता के मर जाने के बाद भगवान पर विश्वास करना बंद कर देता है। उसके भाई बहन भी रिफ्यूजी बनकर अपना दम तोड़ देते हैं। जब सब लोग उनकी सहायता करने से इंकार कर देते हैं तो वह आदमी बदला लेने की ठानता है। इस फिल्म का एक गीत मशहूर रहा जो आज भी बहुत लोकप्रिय है। उस गीत के बोल हैं, 'देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान'। यह गीत अजीत पर ही फिल्माया गया।

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बारादरी - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
बारादरी (1955)

अजीत को के. अमरनाथ के साथ एक बार फिर से काम करने का मौका मिला जब उन्होंने वर्ष 1955 में आई म्यूजिकल रोमांटिक ड्रामा फिल्म 'बारादरी' में उन्हें मुख्य भूमिका निभाने का मौका दिया। इस फिल्म में अजीत के साथ अभिनेत्री गीता बाली मुख्य भूमिका में हैं। इसके अलावा प्राण, चंद्रशेखर, मुराद, मुमताज बेगम आदि कलाकार भी अहम भूमिकाओं में नजर आए। यह कहानी एक विधवा की है जिसके पति का सिर राजा ने ही कटवा दिया। वह औरत अपने बेटे और राजा के बेटे को एक साथ बड़ा करती है। बड़े होकर दोनों लड़के एक ही लड़की से प्यार करने लगते हैं। 
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नया दौर - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
नया दौर (1957)

मुख्य अभिनेता के तौर पर अजीत का करियर बहुत ज्यादा दूर तक न जा सका। उनके पास अपनी जीविका को चलाने का कोई साधन भी नहीं था इसलिए उन्होंने फिल्मों में सह अभिनेता बन कर आना शुरू कर दिया। बी आर चोपड़ा की सुपरहिट फिल्म 'नया दौर' में अजीत दिखे दिलीप कुमार, वैजयंती माला और जीवन के साथ एक अहम भूमिका में। यह एक ड्रामा फिल्म है जिसमें मुकाबला इंसान का मशीन से मुकाबला होता है। इसी फिल्म से प्रेरित होकर आशुतोष गोवारिकर ने अभिनेता आमिर खान को लेकर वर्ष 2001 में फिल्म 'लगान' बनाई। इस फिल्म का गीत, 'ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का' आज भी बहुत मशहूर है।
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मुगल-ए-आजम - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
मुगल-ए-आजम (1960)

के. आसिफ के निर्देशन में बनी फिल्म मुगल-ए-आजम में भी अजीत ने सह कलाकार की भूमिका निभाई। इस फिल्म में पृथ्वीराज कपूर, मधुबाला, दिलीप कुमार, दुर्गा खोटे जैसे महान कलाकारों ने मुख्य भूमिकाएं निभाईं। वहीं, अजीत यहां दुर्जन सिंह के किरदार में नजर आए। आसिफ ने इस फिल्म को बनाने की शुरुआत काफी पहले कर दी थी लेकिन फिल्म के रिलीज होते होते लगभग 10 साल का समय बीता लेकिन जब फिल्म रिलीज हुई तो इसने समीक्षकों और दर्शकों दोनों के हिसाब से अव्वल काम किया। शुरुआत में तो यह फिल्म ब्लैक एंड वाइट रही लेकिन कुछ सालों पहले इस फिल्म को रंगीन बना कर भी रिलीज किया गया।
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सूरज - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
सूरज (1966)

अजीत सोच कर आए थे कि वह फिल्मों में नायक बनेंगे लेकिन समय ने उनका साथ नहीं दिया और उन्हें खलनायक बनना पड़ा। विलेन बन कर पहली बार वह राजेंद्र कुमार, वैजयंती माला, मुमताज और जॉनी वॉकर की फिल्म 'सूरज' में नजर आए। अजीत का करियर नायक बनकर नहीं चल पा रहा था इसलिए राजेंद्र कुमार ने ही अजीत से इस फिल्म में विलेन का किरदार निभाने की बात कही और उन्होंने मान भी ली। राजेंद्र कुमार ने अजीत की सिफारिश की और उन्हें अपना पहला खलनायक का किरदार मिल गया।

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जंजीर - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
जंजीर (1973)

अजीत का करियर एक खलनायक के रूप में चल पड़ा और उन्हें बोलने के अनोखे अंदाज से खूब लोकप्रियता मिली। जब उन्होंने वर्ष 1973 की ब्लॉकबस्टर फिल्म 'जंजीर' में काम किया तो उनका एक संवाद 'लिली डोंट बी सिली' बहुत मशहूर हुआ। अजीत के बारे में इस फिल्म के लेखक जावेद अख्तर ने कहा था, 'अमिताभ बच्चन की तरह अजीत ने भी 'जंजीर' से अपनी अलग छवि बनाई। यहां से उन्होंने अपने आप को एक विलेन के रूप में स्थापित कर दिया। वह एक ऐसे विलेन थे जो बहुत आराम से बोलते थे लेकिन उसका असर बहुत होता था। वह अपनी बातों से विलेन लेकिन बोलने के अंदाज से हीरो लगते थे।'

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यादों की बारात - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
यादों की बारात (1973)

अपने डायलॉग डिलीवरी के लिए मशहूर अजीत का एक संवाद 'मोना डार्लिंग' वर्ष 1973 की फिल्म 'यादों की बारात' में भी रहा। इसे तो आज भी लोग अपने हिसाब से कहीं न कहीं इस्तेमाल करते ही रहते हैं। नासिर हुसैन के निर्देशन में बनी यह एक मसाला फिल्म रही जिसमें धर्मेंद्र, जीनत अमान, तारिक खान, नीतू सिंह, विजय अरोरा और अजीत खान मुख्य भूमिकाओं में रहे। हिंदी सिनेमा में काफी समय से मसाला फिल्में बन रही हैं लेकिन इस फिल्म ने पहली बार एक मसाला फिल्म के रूप में पहचान बनाई जिसमें एक्शन ड्रामा रोमांस म्यूजिक क्राइम थ्रिलर जैसे सभी जॉनर शामिल रहे। फिल्म में आमिर खान ने भी एक बाल कलाकार बनकर काम किया है।

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कालीचरण - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
कालीचरण (1976)

फिल्मकार सुभाष घई ने निर्देशन में जब अपने करियर की शुरुआत की तो उन्होंने सबसे पहले फिल्म बनाई 'कालीचरण'। इस फिल्म में शत्रुघ्न सिन्हा, रीना रॉय, अजीत, मदन पुरी और डैनी डेंजोंगपा ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं। अजीत ने यहां दो प्रकार की छवि रखने वाले दीनदयाल की भूमिका निभाई। दुनिया दीनदयाल को एक साफ छवि वाले रईस आदमी के रूप में जानती है जबकि अपराध की दुनिया में दीनदयाल का नाम होता है लायन। इस फिल्म में अजीत का बोला हुआ संवाद, 'क्राइम की दुनिया में हमें लायन के नाम से जाना जाता है', बहुत मशहूर हुआ। उनके बोलने का अंदाज इसलिए भी निराला रहा क्योंकि वह है अपना नाम 'लायन' नहीं 'लाइन' कहते थे।
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चरस - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
चरस (1976)

अजीत अपने अभिनय के अनोखे अंदाज में हिंग्लिश का इस्तेमाल करते थे। उन्होंने हमेशा विलेन के रूप में खुद को रईस और इज्जतदार दिखाया। वह भले ही विलेन होते थे लेकिन गंदे काम उन्होंने अपने हाथ से फिल्मों में कभी नहीं किए। ज्यादातर उनके किरदार घपले बाजी और तस्करी वाले होते थे। उनके किरदारों ने खून खराबा बहुत कम किया। फिल्मों में उनके किरदार ज्यादातर सोने चांदी हीरे जवाहरात की तस्करी करते थे।अजीत के फिल्मों में देखा जाए तो उनके गुर्गे भी रॉबर्ट, माइकल, पीटर जैसे नामों से जाने जाते हैं। इनको भी बोलने का अंदाज अजीत का अनोखा ही होता। वह रॉबर्ट को राबर्ट कहकर पुकारते। रामानंद सागर की वर्ष 1976 में आई फिल्म 'चरस' में अजीत ने कालीचरण का किरदार निभाया।
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