फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Bioscope S2: शापित फिल्म साबित हुई ‘जय संतोषी मां’, निर्माता का निकला दिवाला, हीरोइन का ऐसे हुआ अंत

विज्ञापन
1 of 9
‘जय संतोषी मां’ - फोटो : अमर उजाला
टेलीविजन पर ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ की कथाओं पर बने धारावाहिकों की जय जयकार होने से पहले बड़े परदे पर लंबे अरसे तक धार्मिक फिल्मों का बोलबाला रहा है। लेकिन, जैसी कामयाबी फिल्म ‘जय संतोषी मां’ ने हिंदी सिनेमा में पाई, वैसी न उसके पहले किसी हिंदी फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर मिली और न ही उसके बाद में। 1970 से लेकर 1979 के बीच रिलीज हुई हिंदी फिल्मों में फिल्म ‘जय संतोषी मां’ कमाई के मामले में आठवें नंबर पर रही। सिर्फ साल 1975 की बात करें जिस साल ये फिल्म रिलीज हुई थी तो उस साल ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कमाई के मामले में रही थी नंबर दो पर। पहले नंबर जो फिल्म उस साल रही, उसका नाम तो आपको पता ही होगा! जी हां, ‘शोले’।

दशक की टॉप 10 फिल्मों में शामिल
आठवें दशक की टॉप 10 कमाई करने वाली फिल्मों में चार फिल्में अमिताभ बच्चन की रही हैं। इनके नाम हैं, ‘शोले’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘रोटी कपड़ा और मकान’, और ‘अमर अकबर एंथनी’। बाकी बची फिल्मों में मनोज कुमार की तीन फिल्में ‘रोटी कपड़ा और मकान’, ‘संन्यासी’ और ‘दस नंबरी’, धर्मेंद्र की एक फिल्म ‘धर्मवीर’, देव आनंद की एक फिल्म ‘जॉनी मेरा नाम’, ऋषि कपूर की एक फिल्म ‘बॉबी’ और ‘जय संतोषी मां’। 30 मई 1975 को रिलीज हुई फिल्म ‘जय संतोषी मां’।
Trending Videos
विज्ञापन

2 of 9
‘जय संतोषी मां’ फिल्म का एक दृश्य - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
फिल्म ने शुरू किया नया पंथ
फिल्म ‘जय संतोषी मां’ से ही पूरा एक नया पंथ हिंदू समुदाय में शुरू हो गया। संतोषी माता के मंदिर इस फिल्म के बनने से पहले पूरे देश में गिने चुने ही थे। लेकिन इस फिल्म की कामयाबी ने कई लोगों को संतोषी माता के नाम पर तरह तरह के व्यवसाय खोलने के मौके दे दिए। लेकिन, कम लोगों को ही पता होगा कि ये फिल्म शुरू से शापित रही। इस फिल्म को बनाने में शामिल रहे लोगों का जीवन बहुत कष्टमय बीता। जिन जिन लोगों ने भी ‘संतोषी माता’ के नाम पर दूसरों से कपट करने की कोशिश की, सबको ईश्वरीय न्याय का सामना करना पड़ा। फिल्म बनाने वाले सतराम वोहरा के आखिरी दिन तो बहुत ही कंगाली में बीते।
विज्ञापन

3 of 9
‘जय संतोषी मां’ फिल्म का एक दृश्य - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
बैलगाड़ी भर भर बंबई पहुंचे लोग
फिल्म ‘जय संतोषी मां’ की कामयाबी भी बस ईश्वरीय चमत्कार ही है। ये उन दिनों की बात है, जब बंबई दादर के आगे बांद्रा और जुहू तक भी बमुश्किल ही आ पाया था। अंधेरी तक आने में तो लोग दस बार सोचते थे। लेकिन, एक दिन लोगों ने देखा कि बैलगाड़ियों की लंबी कतारें वसई-विरार की तरफ से पश्चिम में और मध्य मुंबई में कल्याण औऱ ठाणे की तरफ से आती ही चली जा रही हैं। पता चला कि कोई फिल्म लगी है शहर में, नाम है, ‘जय संतोषी मां’। ये करिश्मा सोमवार को हुआ। फिल्म ‘जय संतोषी मां’ ने अपने रिलीज वाले शुक्रवार को पहले शो में कमाए थे 56 रुपये, दूसरे में 64, इवनिंग शो की कमाई रही 98 रुपये और नाइट शो का कलेक्शन बमुश्किल सौ रुपये छू पाया था। शनिवार और इतवार भी कुछ खास नहीं रहा लेकिन मिल मजदूरों ने रविवार को फिल्म को देखने के बाद इसका जो प्रचार किया तो दूर दराज तक इसके किस्से फैल गए और सोमवार की सुबह सुबह जो हलचल शुरू हुई तो महीनों तक जहां जहां फिल्म ‘जय संतोषी मां’ लगी थी वहां मेला लगा रहा। इन सिनेमाघरों के सफाई कर्मचारी करने वाले तक शो के दौरान उछाले गए सिक्के बीन बीनकर मालदार हो गए।

4 of 9
‘जय संतोषी मां’ - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
अनीता गुहा को मिली देवी सी प्रसिद्धि
ये उन दिनों की भी बात है जब जोधपुर में मंडोर के पास संतोषी मां का एक मंदिर हुआ करता था। लोगों को पता भी नहीं था कि ऐसी कोई देवी पुराणों में हैं भी। खुद इस फिल्म में संतोषी मां का किरदार करने वाली अभिनेत्री अनीता गुहा को नहीं पता था कि ऐसी कोई देवी हैं। साल 2006 में स्टार गोल्ड पर फिल्म ‘जय संतोषी मां’ का पहली बार सैटेलाइट प्रसारण हुआ था। अनीता गुहा ने उस दौरान फिल्म को लेकर खूब बातें की थीं। तब तो खैर वह हिंदी सिनेमा के नए सितारों के बीच गुमनाम ही हो चुकी थीं, लेकिन उनके मुताबिक बांद्रा के उनके फ्लैट के सामने किसी जमाने में लोगों का हुजूम उमड़ता था। लोग सुबह से उनके दर्शन करने के लिए उनके फ्लैट के सामने खड़े रहते। वह घर से निकलतीं तो लोग अपने बच्चे उनकी गोद में डाल दिया करते थे। लोगों का विश्वास था कि ‘संतोषी मां’ का स्पर्श हो जाने के बाद उनके बच्चों का अनिष्ट नहीं होगा।
विज्ञापन

5 of 9
‘जय संतोषी मां’ फिल्म का एक दृश्य - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
कहानी सोलह शुक्रवार की
फिल्म ‘जय संतोषी मां’ की कहानी सत्यवती नाम की एक महिला की है जिसको उसके ससुराल वाले बहुत कष्ट देते हैं और फिर संतोषी मां की कृपा से उसके जीवन में सब ठीक हो जाता है। सत्यवती के पति बिरजू का रोल करने वाले यानी कि फिल्म के हीरो आशीष कुमार की मानें तो उन्होंने ही इस फिल्म का आइडिया फिल्म के प्रोड्यूसर सतराम रोहरा को दिया था। आशीष के बच्चे नहीं थे। उनकी पत्नी ने संतोषी मां के सोलह शुक्रवार व्रत रखने शुरू किए। व्रत के बीच में ही आशीष की पत्नी गर्भवती हो गईं तो बाकी बचे उपवासों के दिन आशीष ने ही अपनी पत्नी को शुक्रवार व्रत कथा सुनाई। अपने घर में बिटिया का जन्म होने के बाद आशीष ने ये बात सतराम के गुरु और फाइनेंसर सरस्वती गंगाराम को सुनाई जिन्होंने फिल्म शुरू करने के लिए 50 हजार रुपये दिए थे।
विज्ञापन

6 of 9
‘जय संतोषी मां’ फिल्म का एक दृश्य - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
12 लाख में बनी फिल्म ने कमाए 25 करोड़
फिल्म ‘जय संतोषी मां’ से बाद में उस समय के चर्चित फिल्म वितरक केदारनाथ अग्रवाल जुड़े औऱ उन्होंने तब तक शूट हो चुकी फिल्म के अधिकार 11 लाख रुपये एडवांस देकर खरीद लिए। फिल्म कुल 12 लाख में बनी और इसने बॉक्स ऑफिस पर कमाए करीब 25 करोड़ रुपये। ये अलग बात है कि फिल्म के हिंदी सिनेमा के इतिहास की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर बनने के बाद भी न इसके वितरक के हाथ कुछ लगा और न ही इसके निर्माता के। यहां तक कि फिल्म के निर्माता सतराम वोहरा ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया था। फिल्म जब तक सिनेमाघरों में लगी रही तब तक खूब धूम से चली। गांवों से आने वाले चप्पल उताकर कर सिनेमाघरों में प्रवेश करते। अपने साथ वे फूल माला लेकर आते। और फिल्म शुरू होते ही जब दूसरे ही सीन में संतोषी मां की आरती होती तो सब अपनी अपनी आरती जलाकर आरती करना शुरू कर देते। फिल्म खत्म होने के बाद बाकायदा सिनेमाघरों के बाहर प्रसाद बंटता और पास में ही लंबी कतार दिखती संतोषी मां की फ्रेम की हुई फोटो के साथ शुक्रवार की व्रत कथा बेचने वाले दुकानदारों की।
विज्ञापन

7 of 9
‘जय संतोषी मां’ - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
रातोंरात स्टार बनीं अनीता गुहा
फिल्म ‘जय संतोषी मां’ में संतोषी मां का रोल करने वाली अनीता गुहा रातोंरात स्टार बन गईं। इससे पहले वह सीता मैया के रोल तीन फिल्मों में कर चुकी थीं। फिल्म ‘आराधना’ में वह राजेश खन्ना की मां बनी थीं। पूरी फिल्म में जब तक उन्होंने शूटिंग की, हमेशा व्रत रहकर ही काम किया। अनीता ने तब बताया था, “पहले दिन की शूटिंग बहुत अफरातफरी में हुई। हम सब लोग सुबह से मेकअप कराकर रेडी थे लेकिन पहला शॉट काफी देर से हुआ। इस चक्कर में पहले ब्रेकफास्ट और फिर लंच मिस हो गया। शाम को इसका एहसास हुआ औऱ निर्देशक विजय शर्मा ने कुछ खाने को कहा तो मुझे लगा कि खाने लगी तो चेहरे का मेकअप फिर से कराना होगा तो मैंने कहा कि अब काम खत्म करके ही खाती हूं। तो पूरा दिन उस दिन बिना कुछ खाए पीये ही निकल गया। फिर मैंने सोचा कि हो सकता है कि इसमें भी ईश्वर की कुछ इच्छा रही हो तो इसके बाद मैंने जितने दिन शूटिंग की, बिना कुछ खाए पीये ही शूटिंग की।”

8 of 9
‘जय संतोषी मां’ - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

चलते चलते...
फिल्म ‘जय संतोषी मां’ की कहानी बहुत अच्छी लिखी गई थी। गांव गरीब के संतोष की कहानी थी फिल्म ‘जय संतोषी मां’। गरीब इसी बात में खुश हो जाता कि कोई ऐसी भी देवी हैं जो सिर्फ गुड़ चने का प्रसाद पाकर ही खुश हो जाती हैं। फिल्म शुरू होती है रक्षा बंधन के त्योहार से जहां भगवान गणेश के दोनों बेटे एक बहन की जिद करते हैं। भगवान गणेश और उनकी पत्नियों ऋद्धि व सिद्धि की इस संतान का नाम नारद रखते हैं, संतोषी। फिल्म इसके बाद देवलोक से सीधे मर्त्यलोक आती है जहां सत्यवती मंदिर में मां संतोषी की आरती करते दिखती है। फिल्म की कहानी दोनों लोकों में समानांतर चलती रहती है। फिल्म को सबसे ज्यादा मदद मिली अपने संगीत से। कवि प्रदीप के लिखे गीतों को संगीतकार सी अर्जुन ने बहुत ही मौलिक और लोकगीतों के अनुरूप धुनें दीं। खुद कवि प्रदीप ने फिल्म में दो गाने गाए। मन्ना डे और महेंद्र कपूर की आवाजें फिल्म के किरदारों पर बिल्कुल फिट बैठीं और सोने पर सुहागा बनी उषा मंगेशकर की आवाज। फिल्म के गानों के लिए उषा मंगेशकर को फिल्मफेयर बेस्ट प्लेबैक सिंगर फीमेल का नॉमीनेशन भी मिला।

विज्ञापन

9 of 9
‘जय संतोषी मां’ - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
फिल्म ‘जय संतोषी मां’ के सामाजिक-आर्थिक असर पर बाकायदा लोगों ने शोध पत्र लिखे हैं। फिल्म का दुखद पहलू ये रहा कि इसके कलाकारों और इसे बनाने वालों ने बहुत दुख झेले। फिल्म में संतोषी माता बनीं अनीता गुहा को सफेद दाग की गंभीर बीमारी हुई। इसके चलते उनका अपने घर से बाहर आना कम हो गया। पति माणिक दत्त का असामयिक निधन होने के बाद वह बहुत ही गुमनाम सी जिंदगी जीते हुए 2007 में दुनिया छोड़ गईं। फिल्म निर्माता सतराम रोहरा दिवालिया होने के बाद बहुत मुसीबत में रहे। फिल्म के वितरक केदारनाथ अग्रवाल के पास भी फिल्म की कमाई की रकम नहीं पहुंची। उनके भाइयों पर आरोप लगा कि वे सारी रकम बीच में ही ले उड़े। बताते हैं कि उनको भी बाद में फालिज मार गया। फिल्म के हीरो आशीष कुमार और फिल्म वितरक केदारनाथ अग्रवाल के भागीदार संदीप सेठी के बीच फिल्म की कमाई को लेकर लंबा विवाद चला। आशीष ने फिल्म की कहानी पर नाटक बनाया, ‘कथा संतोषी मां’। ये नहीं चला। फिर फिल्म बनाई, ‘सोलह शुक्रवार’। ये भी फ्लॉप रही। ‘जय संतोषी मां’ की कहानी पर इसी नाम से ही साल 2006 में भी एक फिल्म आई जिसमें हीरोइन थीं नुसरत भरुचा। ये फिल्म भी फ्लॉप रही।

(‘बाइस्कोप’ कॉलम में प्रकाशित यह आलेख बौद्धिक संपदा अधिकारों के तहत संरक्षित हैं।)
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें