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कभी रफी से झगड़ा, कभी लता से दूरी, पहली बार लाख रुपये लेने वाले संगीतकार की 10 अनसुनी कहानियां

Thu, 16 Jan 2020 01:20 PM IST
anand anand अमित कुमार सिंह, मुंबई
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op nayyar - फोटो : social media
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सलमान खान और आमिर खान की फिल्म अंदाज अपना अपना में एक सीन है, जिसमें हीरोइन अपनी सहेलियों के साथ तांगों की सवारी कर रही है और गाना बज रहा है, ए लो जी सनम हम आ गए आज फिर दिल लेके। घोड़ों की टापों के साथ संगत करती गाने की धुन सुनकर पहली बार लोगों ने समझा कि ओ पी नैयर फिल्म के संगीतकार है, हालांकि फिल्म में संगीत तुषार भाटिया का है जिन्होंने नैयर की शैली की नकल इस गाने में की। 'आर-पार' , 'नया दौर', 'तुमसा नहीं देखा' और 'कश्मीर की कली' जैसी फिल्मों में नायाब संगीत देने वाले ओंकार प्रसाद नैयर यानी ओ. पी. नैयर अपने चुलबुले संगीत के लिए आज भी याद किए जाते हैं। 
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op nayyar - फोटो : social media
16 जनवरी 1926 को लाहौर में पैदा हुए ओ. पी नैयर ने साल 1952 में फिल्म 'आसमान' से अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की थी। 'आरपार', 'मिस्टर एंड मिसेज 55', 'सीआईडी' और 'तुम सा नहीं देखा' जैसी गुरुदत्त की फिल्मों से असल पहचान पाने वाले ओ.पी. नैयर की जिंदगी बड़ी रोचक रही। कहा जाता है कि जब तक वह जिंदा रहे उन्होंने अपनी शर्तो पर ही जिंदगी जी। चलिए आज आपको बताते हैं ओ.पी. नैयर की 10 अनसुनी कहानियां।
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OP Nayyar - फोटो : social media
संगीत के लिए छोड़ा घर
बचपन से ही ओ.पी नैयर का संगीत की तरफ रुझान था। हालांकि परिवार को यह बात कभी पसंद नहीं थी। इस वजह से ओ पी नैयर ने अपना घर छोड़ दिया और आकाशवाणी के एक केंद्र से जुड़ गए। उन्होंने शुरुआती दौर उस समय के मशहूर गायक सी एच आत्मा के लिए 'प्रीतम आन मिलो' गाने की धुन का निर्माण किया। यह गीत लोगों ने खूब पसंद किया और देखते ही देखते नैयर भी मशहूर होने की दिशा में बढ़ चले।

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op nayyar - फोटो : file photo
विभाजन में छोड़ा लाहौर
ओ पी नैयर का जन्म लाहौर में हुआ था लेकिन जब देश का विभाजन हुआ तो उन्हें सब कुछ छोड़ कर अमृतसर आना पड़ा। लेकिन इस दौरान उनका संगीत का सफर रुका नहीं बल्कि उन्होंने दिल्ली के आकाशवाणी केंद्र में नौकरी करना शुरू कर दिया और अपने संगीत के करियर को फिर एक बार संवारने में लग गए।
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op nayyar - फोटो : file photo
विद्रोही स्वभाव के नैयर
ओ पी नैयर अपने काम के साथ-साथ अपने स्वभाव के लिए काफी मशहूर रहे हैं।  वह अक्खड़पन और विद्रोही स्वभाव के व्यक्ति थे। माना जाता है कि यह व्यक्तित्व उनके पिता की वजह से उनके अंदर आया था। दरअसल बचपन में ओ पी नैयर ने अपने पिता से काफी मार खाई थी। इसका असर हमेशा उनके व्यक्तित्व में रहा और उनमें विद्रोही स्वभाव घर कर गया। इसी वजह से उन्होंने अपने मन का काम करने के लिए घर भी छोड़ दिया था।
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गुरु दत्त - फोटो : file photo
गुरुदत्त की फिल्मों से बदली किस्मत
दिल्ली में आल इंडिया रेडियो की नौकरी अधिक समय तक नैयर को रास नहीं आई। अपनी किस्मत बदलने के इरादे से वह मुंबई आ गए। यहां पर उन्होंने काफी फिल्मों में संगीत दिया लेकिन उनकी शुरुआती फिल्में कुछ खास नहीं कर सकी। नैयर ने इसे अपनी असफलता मान ली थी और वह इतने निराश हो गए थे कि उन्होंने अमृतसर वापस जाने का इरादा कर लिया था। हालांकि इसी बीच उनकी मुलाकात गुरुदत्त से हुई। वह उस समय 'आर-पार' बनाने की सोच रहे थे। इस फिल्म के संगीत के लिए का मौका नैयर को मिला। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा।
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op nayyar - फोटो : file photo
सबसे महंगे संगीतकार
ओपी नैयर अपने जमाने के सबसे महंगे संगीतकार थे। कहा जाता है कि वह सिर्फ एक ही फिल्म के लिए एक लाख रुपये फीस के तौर पर लेते थे। वह हिंदी फिल्म जगत के पहले लखटकिया संगीतकार बने। 1950 के दशक में यह बहुत ही बड़ी रकम थी। हालांकि इतनी अधिक फीस होने के बावजूद फिल्मकार उनसे अपनी फिल्म का हिस्सा बनाने के लिए उत्सुक रहते थे।

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लता मंगेशकर - फोटो : सोशल मीडिया
लता मंगेशकर से रही दूरी
ओ.पी नैयर का अपना ही अनोखा मिजाज था कि उन्हें कभी लता मंगेशकर की आवाज अपने संगीत के लिए मुफीद नहीं लगी। उन्होंने अपनी किसी भी फिल्म में उनसे गाना नहीं गवाया। वहीं दूसरी तरफ उन्होंने आशा भोसले के साथ काफी काम किया। उनका मानना था कि लता की आवाज में पाकीजगी थी जबकि उन्हें अपने गानों के लिए शोखी की जरूरत थी। यह शोखी उन्हें आशा भोसले से लेकर शमशाद बेगम और गीता दत्त की आवाज में मिलती थी।

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OP Nayyar - फोटो : social media
रफी से भी मनमुटाव
अपने रवैये के चलते नैयर से मनमुटाव होने वालों में एक बड़ा नाम मोहम्मद रफी का भी है। नैयर को सभी काम समय पर करना पसंद है। एक दफा नैयर को एक गाना रफी के साथ रिकॉर्ड करना था लेकिन उस दिन रफी करीब एक घंटा देर से पहुंचे। यह बात नैयर को पसंद नहीं आई और इसी बात से उनका रफी के साथ मनमुटाव हो गया। दोनों के बीच यह झगड़ा करीब तीन साल तक चला। हालांकि एक दिन मोहम्मद रफी, नैयर के घर पहुंच गए और नैयर ने उन्हें देखते ही भावुक होकर गले लगा लिया, जिसके बाद दोनों फिर से एक साथ हो गए।

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OP Nayyar - फोटो : amar ujala mumbai
ऑल इंडिया रेडियो ने किया बैन
1950 के दशक में आल इंडिया रोडियो ने ओ पी नैयर के संगीत को अधिक आधुनिक और पश्चिमी सभ्यता से प्रेरित करार देते हुए उनके गानों को बैन कर दिया। जिसके बाद से लंबे समय तक लोग उनके गाने रेडियो पर नहीं सुन सके। हालांकि इस बैन का भी नैयर पर रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ा और वह अपने ही अंदाज में लगातार संगीत का निर्माण करते गए।

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op nayyar with asha bhosle
होमियोपैथी के जानकार
ओ पी नैयर से जुड़ी एक रोचक बात कुछ ही लोगों को पता होगी कि वह होमियोपैथी के बहुत ही अच्छे जानकार थे। नब्बे के दशक में उनके पास काफी मरीज अपना इलाज कराने के लिए भी आते थे। इन मरीजों में से तो कुछ उनके प्रशंसक ही थे जो उनको देखने और मिलने के लिए मरीज बनकर आ जाते थे।

ये देश है वीर जवानों का
ओ पी नैयर का संगीतबद्ध किया दिलीप कुमार की फिल्म नया दौर का गाना 'ये देश है वीर जवानों' का हिंदी सिनेमा का कालजयी गीत है। साहिर लुधियानवी के लिखे इस गाने के संगीत के लिए नैयर को 1958 में फिल्मफेयर का बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर का अवार्ड भी मिला था। यह गाना आज छह दशक बाद भी उत्तर भारत में होने वाली तमाम शादियों में बजाया जाता है।
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