फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अमर उजाला विशेष: एवरेस्ट फतह कर चुके लेफ्टिनेंट कर्नल रोमिल बर्थवाल बोले- आगे बढ़ना है तो कंफर्ट जोन से बाहर निकलें

Thu, 16 Dec 2021 07:27 PM IST
देवेश शर्मा एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला

सार

Tips on Life Management: हमें खुद को मोटिवेट करते रहना होता है। अगर लीडर ही निराश हो जाएगा तो फिर टीम का क्या होगा। भले ही हम मल्टी टास्किंग न कर पाएं लेकिन सिंगल टास्क पर तो फोकस करना ही होगा।
विज्ञापन
1 of 7
लेफ्टिनेंट कर्नल रोमिल बर्थवाल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
अगर जिंदगी में आगे बढ़ना और ऊंचा मुकाम हासिल करना चाहते हैं तो आपको अपनी जिंदगी का कंफर्ट जोन छोड़ना होगा। कंफर्ट जोन छोड़े बिना आपके सारे प्रयास सफल नहीं हो सकते हैं। यह एक कड़वा सच है। यह कहना है दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह करने वाले लेफ्टिनेंट कर्नल रोमिल बर्थवाल का। 

लेफ्टिनेंट कर्नल रोमिल बर्थवाल गुरुवार को अमर उजाला के दफ्तर पहुंचे थे। यहां अमर उजाला के संवाद कार्यक्रम के दौरान उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर लाइफ मैनेजमेंट और सफलता के टिप्स साझा किए। 1994 में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, खड़कवासला में कैडेट के रूप में सेना में शामिल होने वाले रोमिल बर्थवाल ने 10 प्रमुख पर्वतारोहण अभियानों का नेतृत्व किया है। वे भारतीय सेना की पैराट्रूप्स, स्पेशल फोर्स से अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। अभी पर्वतारोहण को प्रोत्साहन देने और जागरूकता के लिए अपनी कंपनी चला रहे हैं।

रोमिल IIT खड़गपुर और IIM लखनऊ के पूर्व छात्र भी हैं। उन्होंने मई 2019 में अपनी टीम का नेतृत्व करते हुए दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह किया। लेफ्टिनेंट कर्नल रोमिल बर्थवाल न केवल एक कुशल वक्ता, धावक और साइकिलिस्ट हैं, बल्कि बोस्टन मैराथनर, हाफ आयरनमैन पोडियम फिनिशर, ला अल्ट्रा 111 किमी गैर लद्दाखी रिकॉर्ड धारक, 24 घंटे 185 किमी धावक के रिकॉर्ड होल्डर हैं।
अमर उजाला से संवाद के दौरान लेफ्टिनेंट कर्नल रोमिल बर्थवाल ने अपने पर्वतारोहण के कई रोमांचकारी अनुभव साझा किए और किस्से भी बताए। साथ ही सवालों के जबाव भी दिए। आइए जानते हैं -
Trending Videos
विज्ञापन

2 of 7
लेफ्टिनेंट कर्नल रोमिल बर्थवाल - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

स्कूल टाइम में औसत दर्जे के छात्र रहे

लेफ्टिनेंट कर्नल रोमिल बर्थवाल दिल्ली के लोधी एस्टेट स्थित सरदार पटेल विद्यालय से पढ़े हैं। वे कहते हैं कि स्कूल के समय तक वे औसत छात्र थे। उन्हें इस स्कूल से बहुत कुछ मिला। 10वीं तक की पढ़ाई अलग स्कूल से की थी। वहां में टॉप-3 में रहता था। जब सरदार पटेल विद्यालय पहुंचा था, तो यहां बहुत कॉम्पिटिशन था। मैं टॉप-3 में ही, बल्कि बॉटम-3 था। मैं अपने कंफर्ट जोन में रहता था, लेकिन यहां आया तो पता चला बहुत मेहनत करने की जरूरत है।
विज्ञापन

3 of 7
लेफ्टिनेंट कर्नल रोमिल बर्थवाल - फोटो : सोशल मीडिया

इंजीनियरिंग में कहीं एडमिशन नहीं मिला तो एनडीए पहुंचे

रोमिल ने बताया कि 12वीं पास करने के बाद जग कई जगह इंजीनियरिंग में दाखिले के लिए परीक्षा दी और कहीं दाखिला न मिला तो फिर एनडीए की ओर से रूख कर लिया। एनडीए में बहुत मेहनत करनी पड़ी। वहां सख्त अनुशासन, फिजिकल फिटनेस पर जोर, मानसिक तौर पर चुनौतियों के लिए तैयार रहना सीखा। लेकिन वहां भी तीसरी श्रेणी से पास हुआ। लेकिन जिंदगी में यही चीज खटकती रही। फिर मैंने आईआईटी खड़गपुर में मास्टर्स के लिए दाखिला लिया।  

4 of 7
लेफ्टिनेंट कर्नल रोमिल बर्थवाल - फोटो : सोशल मीडिया

माउंट एवरेस्ट से धरती की कर्विंग लाइन दिखती है

माउंट एवरेस्ट पर पहुंचने के अपने अनुभव के बारे में वे कहते हैं कि हमने वहां सूर्योदय का नजारा देखा। उस वक्त हमें पृथ्वी की कर्विंग लाइन दिखी, जो सामान्य तौर पर नहीं दिखती क्योंकि धरती सपाट नजर आती है। वहां ऑक्सीजन की बेहद कमी होती है इसलिए ज्यादा मूवमेंट नहीं करना चाहिए। एनर्जी बचाकर रखनी होती है। वहां सिर्फ फोटो लीजिए और दो-पांच मिनट बाद वापस आने की तैयारी शुरू करनी होती है। ज्यादा देर इन-एक्टिव रहना खतरनाक हो सकता है।
विज्ञापन

5 of 7
लेफ्टिनेंट कर्नल रोमिल बर्थवाल - फोटो : सोशल मीडिया

मानसिक और शारीरिक मजबूती जरूरी

वे बताते हैं कि पर्वतारोहण के लिए मानसिक और शारीरिक मजबूती जरूरी बेहद जरूरी है। दो ऑक्सीजन सिलेंडर, दो गॉगल्स और करीब 18-20 किलो का वजन साथ चलता है। रास्ते में आने वाली चुनौतियों और खतरों को देखकर हम मानसिक तौर पर परेशान हो जाते हैं। हमें खुद को मोटिवेट करते रहना होता है। अगर लीडर ही निराश हो जाएगा तो फिर टीम का क्या होगा। भले ही हम मल्टी टास्किंग न कर पाएं लेकिन सिंगल टास्क पर तो फोकस करना ही होगा।
विज्ञापन

6 of 7
लेफ्टिनेंट कर्नल रोमिल बर्थवाल - फोटो : सोशल मीडिया

कई बार एवलॉन्च का सामना किया, बाल-बाल बचे

पर्वतारोहण के दौरान आने वाली चुनौतियों और खतरों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि रास्ते में कई बार एवलॉन्च यानी हिमस्खलन का सामना करना पड़ा क्योंकि जिंदगी में कुछ आसानी से नहीं मिलता इसलिए सफलता के मार्ग में बाधाएं आती हैं। हमारे रास्ते में भी एवलॉन्च आए। 1998 के एक मिशन में एवलॉन्च के दौरान हमने एक साथी को खो दिया था। मैं टीम को लीड कर रहा था तो हिम्मत तो रखनी ही पड़ेगी। उस साथी को रेस्क्यू किया, हेलीकॉप्टर मंगवाया लेकिन बचा नहीं पाए।
विज्ञापन
विज्ञापन

7 of 7
लेफ्टिनेंट कर्नल रोमिल बर्थवाल - फोटो : सोशल मीडिया

मिशन पूरा करने के लिए जुनून जरूरी

रोमिल का मानना है कि मिशन पूरा करने के लिए जुनून होना जरूरी है। टीम लीडर के तौर पर कभी संशय की स्थिति नहीं बनने देनी चाहिए। बकौल रोमिल, सियाचिन वाले मिशन में, एवलॉन्च के दौरान मैं खुद भी बाल-बाल बचा था, पहले से बचा कि तुरंत दूसरा आ गया। मैं करीब 20 मीटर दूर तक बर्फ में दबा चला गया। लेकिन मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी। उस वक्त मैंने अपने दिमाग को एक्टिव रखा और बच निकला क्योंकि, वक्त से पहले भगवान भी किसी को नहीं बुलाता है। आखिरकार, हमने मिशन पूरा किया।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें