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गाजीपुर के 'रण' तक कैसे पहुंचा सिंघु बॉर्डर का 'संग्राम', 69 दिन में कितना बदल गया किसान आंदोलन?

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किसान आंदोलन - फोटो : अमर उजाला
26 नवंबर 2020...वह दिन, जब कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों ने मोर्चा खोल दिया और दिल्ली के सिंघु बॉर्डर से 'संग्राम' शुरू कर दिया। किसानों-सरकार के बीच एक-एक करके 11 दौर की बातचीत हुई। इस दौरान सरकार बैकफुट पर भी दिखी और डेढ़ साल तक कानून निलंबन का प्रस्ताव ले आई। हालांकि, किसान कानून वापसी की मांग पर डटे रहे। फिर 26 जनवरी के दिन दिल्ली में हुई हिंसा ने आंदोलन का रुख ही बदल दिया। किसान नेता राकेश टिकैत की धमकी, फिर हिंसा और आखिर में आंसुओं ने आंदोलन को नई धार दे दी। ...और सिंघु बॉर्डर पर शुरू हुआ यह संग्राम गाजीपुर के 'रण' तक पहुंच गया। इस दौरान क्या-क्या हुआ? शुरुआत में एक तरफ नजर आ रहे राकेश टिकैत कैसे इस आंदोलन के मुखिया बन गए और 69 दिन में यह आंदोलन कितना बदल गया...रूबरू होते हैं इस रिपोर्ट में...
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तीन दिन का कूच बना 'बड़ी जंग' 

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किसान आंदोलन - फोटो : अमर उजाला
किसानों के आंदोलन को भले ही 69 दिन बीत चुके हैं, लेकिन शुरुआत में किसी ने सोचा तक नहीं था कि यह लड़ाई इतनी लंबी हो जाएगी। दरअसल, किसान तो 26 से 28 नवंबर तक के लिए दिल्ली कूच पर निकले थे। जगह-जगह उन्हें रोकने का इंतजाम किया गया। फोर्स तैनात की गई। बैरिकेड लगाए गए। यहां तक कि हौसला तोड़ने के लिए वॉटर कैनन और आंसू गैस का भी इस्तेमाल किया गया। लेकिन कहते हैं न कि जय जवान के बाद जय किसान आता है। यानी बहादुरी के मामले में जवानों से किसी भी कीमत पर कम नहीं और हौसला उनसे भी कहीं ज्यादा। ....तो किसान डरे नहीं, बल्कि डट गए। 

 
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सिंघु बॉर्डर बना 'संग्राम' का मैदान

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सिंघु बॉर्डर पर पहुंचा वाहनों का काफिला - फोटो : अमर उजाला
26 नवंबर को शुरू हुआ दिल्ली कूच 27 नवंबर तक हिंसक झड़प में तब्दील हो गया। जगह-जगह किसानों ने पुलिस की घेराबंदी तोड़ दी और दिल्ली की ओर बढ़ना जारी रखा। धीरे-धीरे 35 हजार से ज्यादा किसान दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर पहुंच गए और डेरा डाल दिया। उन्होंने कहा कि अब प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से ही बात करेंगे। उनसे बात हुए बिना हम यहां से नहीं हटेंगे। इस दौरान पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान भी गाजीपुर बॉर्डर पर जम गए, लेकिन सिंघु बॉर्डर आंदोलन की मुख्य धुरी बना रहा।

'मिनी पंजाब' बना सिंघु बॉर्डर

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सिंघु बॉर्डर पर बैठे किसान - फोटो : amar ujala
दरअसल, किसान आंदोलन की शुरुआत पंजाब के किसानों ने की थी। सिंघु बॉर्डर पर जब उन्होंने पहली बार डेरा डाला तो करीब छह महीने तक टिके रहने का इंतजाम कर लिया। ऐसे में सिंघु बॉर्डर मिनी पंजाब जैसा नजर आने लगा। दरअसल, यहां किसान हर तरफ नगाड़े बजाते नजर आते। वहीं, लंगर और साथ में कृपाण के दर्शन आम हो गए थे। 
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पहली बैठक के बाद ऐसे थे हालात

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किसान नेताओं और सरकार की बैठक - फोटो : अमर उजाला
कृषि कानूनों को लेकर किसानों और केंद्र सरकार के बीच पहली बैठक एक दिसंबर 2020 को हुई थी। इस दौरान कई घंटे तक दोनों पक्षों के बीच दिल्ली के किसान भवन में बातचीत हुई, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। अहम बात यह थी कि उस बैठक को राकेश टिकैत ने सकारात्मक बताया था, जबकि पंजाब के किसान संगठनों ने निराशाजनक। 
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10वीं बैठक में बदल गया नजारा

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किसान नेताओं और सरकार की बैठक - फोटो : एएनआई
केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और किसानों के बीच जब 10वें दौर की बातचीत हुई तो हालात बदल चुके थे। पहले दौर में बैठक को सकारात्मक बताने वाले राकेश टिकैत सरकार के प्रस्ताव से नाखुश नजर आए। दरअसल, केंद्र सरकार ने एक-डेढ़ साल तक कृषि कानूनों को निलंबित करने का प्रस्ताव दिया था। साथ ही, एक समिति बनाने की बात भी कही थी, जिसमें किसानों के प्रतिनिधि भी शामिल होते। 
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26 जनवरी की हिंसा से कमजोर हुआ आंदोलन

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लाल किले पर प्रदर्शन करते किसान - फोटो : पीटीआई
दोनों पक्षों में 22 जनवरी को 11वें दौर की बातचीत हुई, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। हालांकि, उस दौरान किसानों ने 26 जनवरी को परेड निकालने की धमकी दी। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया, लेकिन अदालत ने ट्रैक्टर परेड की इजाजत देने का अधिकार दिल्ली पुलिस पर ही छोड़ दिया। 26 जनवरी के दिन किसान आंदोलन में शामिल उपद्रवियों ने लाल किले पर तिरंगे का अपमान किया, जिसके बाद किसान आंदोलन कमजोर होता नजर आया।

टिकैत के आंसुओं ने भड़का दी आग

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राकेश टिकैत (फाइल फोटो) - फोटो : Twitter
गणतंत्र दिवस की हिंसा के बाद 28 जनवरी तक अधिकतर किसान संगठन आंदोलन को अलविदा कह चुके थे। गाजीपुर बॉर्डर पर डटे किसान भी घर लौटने की तैयारी कर रहे थे। अचानक राकेश टिकैत के आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। उन्होंने मंच पर ही रोते-रोते कहा कि देश का किसान सीने पर गोली खाएगा, पर पीछे नहीं हटेगा। तीनों कृषि कानून वापस नहीं लिए गए तो आत्महत्या कर लूंगा, लेकिन धरनास्थल खाली नहीं करूंगा।
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गाजीपुर ऐसे बना आंदोलन का नया 'रण'

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गाजीपुर बॉर्डर पर पुलिस ने की बैरिकेडिंग - फोटो : अमर उजाला
टिकैत के आंसुओं ने आंदोलन की धीमी पड़ती आंच में घी का काम किया। घर लौट चुके किसानों ने दोबारा मैदान में डटने के लिए बोरिया-बिस्तर बांध लिया और गाजीपुर बॉर्डर पहुंच गए। दरअसल, 26 जनवरी की हिंसा के बाद सिंघु बॉर्डर पर 'संग्राम' कर रहे पंजाब के किसान शांत पड़ गए और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने गाजीपुर बॉर्डर को 'रण' बना लिया। 
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