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क्या है दशकों से अनसुलझे विवाद 'वन रैंक वन पेंशन' का मतलब

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दो दशक से भी ज्यादा समय से उलझा विवाद वन रैंक वन पेंशन आज फिर गर्मा गया जब जंतर मंतर पर इसे लेकर पिछले दो महीने से प्रदर्शन कर रहे पूर्व सैनिकों को वहां से हटाया जाने लगा। हालांकि बाद में पूर्व सैनिकों के विरोध के चलते उन्हें वहीं प्रदर्शन करने की अनुमति दे दी गई है।
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क्या है दशकों से अनसुलझे विवाद 'वन रैंक वन पेंशन' का मतलब

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वन रैंक वन पेंशन एक ऐसा मुद्दा है जिसे नरेंद्र मोदी ने अपने प्रचार अभियान के दौरान जोरों से उठाया था और पूर्व सैनिकों से वादा किया था कि उनकी सरकार बनी तो वो इसे लागू जरूर करेंगे। इसके बाद मोदी ने अपनी मन की बात में भी इस बात को कहा था लेकिन पिछले 60 दिनों से ये पूर्व सैनिक प्रदर्शन कर रहे हैं और सरकार का कोई नुमाइंदा इन्हें देखने तक नहीं गया।
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क्या है दशकों से अनसुलझे विवाद 'वन रैंक वन पेंशन' का मतलब

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जब दो फौजी एक पद पर, एक समय तक सर्विस कर के रिटायर होते हैं पर उनके रिटायरमेंट में कुछ सालों का अंतर होता है और इस बीच नया वेतन आयोग भी आ जाता है, तो बाद में रिटायर होने वाले की पेंशन नए वेतन आयोग के अनुसार बढ़ जाती है। लेकिन पहले रिटायर हो चुके फौजी की पेंशन उसी अनुपात में नहीं बढ़ पाती।

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फौजियों की पेंशन की तुलना सामान्य सरकारी कर्मचारियों से नहीं की जा सकती क्योंकि एक ओर जहाँ सामान्य सरकारी कर्मचारी को 60 साल तक तनख्वाह लेने की सुविधा मिलती है, वहीं फौजियों को 33 साल में ही रिटायर होना पड़ता है और उनकी सर्विस के हालात भी अधिक कठिन होते हैं।
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आजादी के पहले फौजियों की पेंशन तनख्वाह की करीब 80 प्रतिशत होती थी जबकि सामान्य सरकारी कर्मचारी की 33 प्रतिशत हुआ करती थी।
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भारत सरकार ने इसे सही नहीं माना और 1957 के बाद से फौजियों की पेंशन को कम की और अन्य क्षेत्रों की पेंशन बढ़ानी शुरू की।
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फौजियों की मांग है कि 1 अप्रैल 2014 से ये योजना छठे वेतन आयोग की शिफरिशों के साथ लागू हो। फौजियों का कहना है कि असली संतुलन लाना है तो हमें भी 60 साल पर रिटायर किया जाय।

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हमें तो 33 साल पे ही रिटायर कर दिया जाता है और उसके बाद सारा जीवन हम पेंशन से ही गुजारते हैं।

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जबकि अन्य कर्मचारी 60 साल तक पूरी तनख्वाह पाते हैं। ऐसे में हमारी पेंशन के प्रतिशत को कम नहीं करना चाहिए।

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हालांकि इस वक्त ये फौजी सिर्फ इतना ही चाहते हैं कि छठे वेतन आयोग को लागू करते हुए समान पद और समान समय तक सर्विस कर चुके फौजियों को एक समान पेंशन दी जाय, चाहे दोनों किसी भी साल में रिटायर हुए हों।

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अगर ये योजना लागू होती है तो करीब 25 लाख फौजियों या उनके परिवारों को लाभ होगा।

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इसके लिए हर साल सरकार को करीब 9 हज़ार करोण रुपये का अतिरिक्त भार सहना होगा।
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देखना है कि कल स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले के प्राचीर से प्रधानमंत्री इन पूर्व सैनिकों के लिए कोई खुशखबरी लाते हैं कि नहीं।
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