दिल्ली विश्विद्यालय छात्र संघ चुनाव मे इस बार एनएसयूआई का बड़ा करिश्मा देखने को मिला है। एनएसयूआई ने चार सीटों में से दो बड़ी सीटें जीतकर चुनाव में चार साल से जीत हासिल करती आ रही एबीवीपी को जबरदस्त पटखनी दी है। एनएसयूआई ने दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव-2017 में अध्यक्ष व उपाध्यक्ष पद पर जीत हासिल की है।
इन चुनावों में एबीवीपी की ऐसी दुर्गती क्यों हुई ये विषय समझना जरूरी है क्योंकि पिछले चार सालों से दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में एबीवीपी का जलवा कायम रहा है। अमर उजाला डॉटकॉम अपने पाठकों को भगवा रंग फीका पड़ने के पांच बड़े कारण बताने जा रहा है...
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डूसू चुनाव में भगवा रंग फीका पड़ने के 10 बड़े कारण...
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डूसू चुनाव
1. ऐसा माना जाता रहा है कि दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में जब-जब ज्यादा वोटिंग हुई है तो चुनाव का रिजल्ट हमेशा एनएसयूआई के फेवर में गया है। वहीं इसके उलट स्थिति में कम वोटिंग होने पर जीत एबीवीपी को मिलती रही है। देखा जाए तो इस बार दिल्ली विश्वविद्यालय चुनाव में वोटिंग प्रतिशत में इजाफा हुआ है। पिछले साल तकरीबन 39 फीसदी वोटों की तुलना में इस बार 45 फीसदी वोट डाले गए। इसका सीधा फायदा एनएसयूआई को मिला है।
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दिल्ली विश्वविद्यालय में पोस्टर हटाते हुए
- फोटो : अमर उजाला
2. बीते साल अध्यक्ष पद का चुनाव जीतने वाले एबीवीपी प्रेसिडेंट सतिंदर रवाना का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसने छात्रों के बीच पार्टी की छवी को धुमिल किया। इस वीडियों में सतींदर रवाना ने डीयू की एक टीचर से बदतमीजी की थी। माना जा रहा है कि इससे एबीवीपी को काफी नुकसान पहुंचा है।
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- फोटो : अमर उजाला
3. दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में जाट-गुर्जर फैक्टर बेहद काम करता है। माना जाता है कि छात्र इस आधार पर भी वोटिंग करते हैं। एनएसयूआई ने जाट कैंडिडेट रॉकी तुषीड को अध्यक्ष पद पर उतारा था जबकि एबीवीपी ने इस बार अध्यक्ष पद के लिए गुर्जर कैंडिडेट को चुना लेकिन एबीवीपी का गुर्जर फैक्टर एनएसयूआई के जाट फैक्टर के आगे फ्लॉप साबित हुआ।
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- फोटो : अमर उजाला
4. दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में ग्लैमर भी खूब काम करता है। चुनाव से पहले छात्रनेता सुंदर तस्वीरें खिंचवा कर छात्रों को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करते हैं। एनएसयूआई का अध्यक्ष पद का कैंडिडेट रॉकी तुषीड एबीवीपी के उम्मीदवार की अपेक्षा गुडलुकिंग है।
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- फोटो : अमर उजाला
5.छात्रसंघ चुनाव में एबीवीपी ने इस बार नए चेहरों को जंग लड़ने के लिए उतारा था। इसे लेकर पार्टी के कार्यकर्ता ने अपनी नाराजगी भी जाहिर की थी।
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6.परिषद् कार्यकर्ताओं में चुनाव से पहले ही रोष झलकने लगा था। इसका बड़ा कारण ये माना जा रहा है कि विद्यार्थी परिषद् ने खुद पुराने कार्यकर्ताओं को चुनाव के दौरान किनारे कर दिया था। इस कारण भीतरघात भी हुई।
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7.इन चुनावों में NOTA के वोट बहुत ज्यादा पड़े है। एबीवीपी के छात्रनेता इन वोटों को अपने फेवर में ला पाने में नाकामयाब साबित हुए। अगर ये वोट एबीवीपी को मिलते तो पूरा खेल बदल सकता था।
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8.रॉकी लंबे समय से छात्रो के बीच जाकर काम कर रहा था। उसे दिल्ली विश्विद्यालय के छात्र पहचानने लगे थे जबकि एबीवीपी कैंडिडेट पर पैराशूट से उतारा हुआ उम्मीदवार का ठप्पा लग चुका था। खुद एबीवीपी कार्यकर्ता इन उम्मीदवारों के लिए वोट मांगने से कतरा रहे थे। इसकी बड़ी वजह थी उनकी नाराजगी।
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9. एबीवीपी के अध्यक्ष पद की कद काठी बॉडी बिल्डर जैसी थी जिसके चलते छात्रों के बीच उसकी छवी नकारत्मक बन गई।
10. एबीवीपी के छात्र नेताओं की पहचान फ्रैशर स्टूडेंट के बीच कम रही। हर बार देखा जाता रहा है कि फ्रेशर स्टूडेंट ज्यादा वोटिंग के लिए आते हैं अगर उन्हें लुभाने में किसी छात्रनेता से कोई चूक हुई तो समझो उस नेता की चुनाव में लुटिया डूबनी तय है।