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बर्थडे स्पेशलः संजय गांधी के करीबियों ने उनके बारे में बताई 10 ऐसी बातें जिनसे अनजान हैं लोग

Fri, 15 Dec 2017 10:44 AM IST
रेहान फ़ज़ल/बीबीसी
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sanjay gandhi
संजय गांधी को भले ही ही भारतीय जनमानस में एक अड़ियल और जिद्दी नेता के रूप में जाना जाता हो लेकिन उनके करीबी उनके बारे में कुछ ऐसी बातें बताई हैं जिनसे आम लोग बहुत कम वाकिफ हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर रहे पुष्पेश पंत कहते हैं, 'कहीं न कहीं एक दिलेरी उस शख़्स में थी और कहीं न कहीं हिंदुस्तान की बेहतरी का सपना भी उनके अंदर था।'
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संजय की डेडलाइन एक दिन पहले की होती थी कुमकुम चड्ढा हिंदुस्तान टाइम्स से जुड़ी हुई वरिष्ठ पत्रकार हैं और उन्होंने बहुत नज़दीक से संजय गाँधी को कवर किया है। कुमकुम चड्ढा बताती हैं, 'किस तरह से उन्होंने अपने लोगों से पर‌िवार नियोजन को लेकर लक्ष्य पूरे करने के लिए कहा, ये मैं नहीं जानती, लेकिन इतना मुझे पता है कि उन्होंने ऐसा करने के लिए हर एक के लिए लक्ष्य निर्धारित किए थे। हर कोई चाहता था कि इस लक्ष्य को हर कीमत पर पूरा किया जाए।' वो कहती हैं, 'दूसरी तरफ़ संजय के पास जा कर कोई ये नहीं कह सकता था कि ये नहीं हुआ। वो लोग संजय से बहुत डरते थे। उनकी डेडलाइन हमेशा एक दिन पहले की हुआ करती थी। इसलिए संजय के निर्देश पर जो कुछ भी लोग कर रहे थे, वो बहुत जल्दबाज़ी में कर रहे थे, जिसकी वजह से उसके उलटे परिणाम आने शुरू हो गए।'
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चाय भी नहीं पीते थे संजय गांधी आम लोगों के मन में संजय गांधी की छवि एक 'मैन ऑफ़ एक्शन' वाले शख़्स की है, जिसके पास धीरज की कमी थी। आम धारणा के ख़िलाफ़ वो शराब सिगरेट तो दूर, चाय पीना तक पसंद नहीं करते थे। गहलोत बताते हैं, 'वो कैंपा कोला और पेप्सी तक पीना पसंद नहीं करते थे और लोगों से सवाल पूछा करते थे कि तुम पान क्यों खाते हो। मैं समझता हूं कि देश को नौजवानों को वो अलग रास्ते पर ले जाना चाहते थे।'

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sanjay gandhi - फोटो : sanjay gandhi
मुंहफट और स्पष्टवादी संजय गांधी की आम छवि कम बोलने वाले मुंहफट शख़्स की थी। लेकिन एक ज़माने में संजय गांधी के क़रीबी और युवा कांग्रेस के नेता रहे जनार्दन सिंह गहलोत बताते हैं, 'उनमें रफ़नेस कतई नहीं थी। वो स्पष्टवादी ज़रूर थे जिसे सही मायने में आज तक भारतवासी स्वीकार नहीं कर पाए हैं। आज जो चापलूसों का ज़माना है, हर राजनीतिज्ञ मीठी बातें करता है, मैं समझता हूं, वो उससे हट कर थे। इसलिए उनकी छवि बनती रहती थी कि वो रूखे हैं, जो कि वो बिल्कुल नहीं थे।'
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sanjay gandhi - फोटो : सोशल मीड‌िया
तेज रफ्तार में चलाते थे गाड़ी जनार्दन सिंह गहलोत कहते हैं, 'उनका एक शौक था कि वो गाड़ी बहुत तेज़ चलाते थे। एक बार हम, संजय गांधी और अंबिका सोनी तीनों पंजाब के टूर से आ रहे थे। उनकी आदत थी कि वो अपनी गाड़ी ख़ुद चलाते थे और हमारी ये हालत थी कि हमारे हाथ पैर फूल रहे थे कि कहीँ गाड़ी का एक्सीडेंट न हो जाए। जब हम उन्हें टोकते थे तो वो कहते थे, डरते हो क्या?' वो कहते हैं, 'जिस दिन वो प्लेन उड़ाने गए थे, मेनकाजी ने इंदिराजी से कहा था कि वो संजय से गोता न लगाने के लिए कहे और उन्हें रोक लें। लेकिन जब तक इंदिराजी बाहर पहुंचती, वो अपनी मैटाडोर ले कर निकल चुके थे। उसी दिन ये हादसा हो गया।'
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समय के पाबंद जगदीश टाइटलर कहते हैं, 'ठीक 8 बज कर 45 मिनट पर वो अपनी मेटाडोर में बैठ कर गुड़गांव में अपनी मारुति फ़ैक्ट्री के लिए रवाना हो जाते थे। वो समय के इतने पाबंद थे कि आप उनसे अपनी घड़ी मिला सकते थे। ठीक 12 बज कर 55 मिनट पर वो दोपहर का खाना खाने घर लौटते थे, क्योंकि इंदिरा गाँधी के आदेश थे कि दिन का खाना परिवार के सब लोग साथ खाएं।' टाइटलर आगे कहते हैं, 'दोपहर 2 बजे से उनका लोगों से मिलने का सिलसिला फिर से शुरू होता था इस बार उनसे मिलने वालों में केंद्रीय मंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री और यूथ कांग्रेस के नेता होते थे। उन्हें मिलने का जो वक्त दिया जाता था, वो कुछ इस तरह होता था... 4 बज कर 7 मिनट, 4 बज कर 11 मिनट या 4 बज कर 17 मिनट। जब कोई कमरे में घुसता था तो न ही वो उसके स्वागत में खड़े होते थे और न ही उससे हाथ मिलाते थे।'
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मारुति की नींव रखी नारायण दत्त तिवारी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री और आँध्र प्रदेश के राज्यपाल रह चुके हैं। तिवारी मानते हैं कि संजय गांधी को बिना वजह बदनाम किया गया और उनके योगदान को कम करके आंका गया। तिवारी कहते हैं, "संजय गांधी का जो 5 सूत्री कर्यक्रम था, आज सभी मानते हैं कि वो सही और व्यवहारिक था। वो मानते थे कि बिना परिवार नियोजन के भारत की ग़रीबी दूर नहीं हो सकती।' वो कहते हैं, 'इसी तरह पेड़ लगाने का आंदोलन और भारत में चीज़ों के बनने पर ज़ोर उनके कार्यक्रम का प्रमुख हिस्सा था। उन्होंने वर्कशॉप में मारुति का डिज़ाइन बनाने की कोशिश की। आज मारुति कार भारत में बन रही है और उसका निर्यात भी किया जा रहा है, लेकिन इसकी नींव संजय गाँधी ने ही डाली थी।'

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संजय गांधी और गुजराल की भिड़ंत जग्गा कपूर अपनी किताब 'व्हाट प्राइस परजरी- फ़ैक्ट्स ऑफ़ द शाह कमीशन' में लिखते हैं, 'संजय ने गुजराल को हुक्म दिया कि अब से प्रसारण से पहले आकाशवाणी के सारे समाचार बुलेटिन उन्हें दिखाए जाएं। गुजराल ने कहा ये संभव नहीं है। इंदिरा दरवाज़े के पास खड़ी संजय और गुजराल की ये बातचीत सुन रही थीं, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।' वो आगे लिखते हैं, 'अगली सुबह जब इंदिरा मौजूद नहीं थीं, संजय ने गुजराल से कहा कि आप अपना मंत्रालय ढंग से नहीं चला रहे हैं। गुजराल का जवाब था कि अगर तुम्हें मुझसे कुछ बात करनी है, तो तुम्हें सभ्य और विनम्र होना होगा। मेरा और प्रधानमंत्री का साथ तब का है, जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे। तुम्हें मेरे मंत्रालय में टांग अड़ाने का कोई हक नहीं है।'

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रुख़साना सुल्तान से संजय की नज़दीकी जो लोग संजय गांधी के क़रीब थे, उन्होंने इमरजेंसी के दौरान उनका पूरा फ़ायदा उठाया और लोगों के बीच उनकी छवि ख़राब करने में भी बहुत बड़ी भूमिका निभाई। इनमें से एक थी अभिनेत्री अमृता सिंह की मां रुख़साना सुल्तान। कुमकुम चडढ़ा बताती हैं, 'एक स्तर पर दोनों के बारे में काफ़ी अनर्गल बातें कही जाती थीं। इमरजेंसी के दौरान रुख़साना के पास बहुत ताकत थीं। इस ताक़त का उन्होंने बहुत बेजा इस्तेमाल किया, चाहे वो परिवार नियोजन हो या जामा मस्जिद का सौदर्यीकरण हो। अगर लोग संजय गांधी से नफ़रत करते थे, तो वो इसलिए कि वो उनके नाम पर ये कार्यक्रम चलाती थीं।'

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sanjay gandhi - फोटो : सोशल मीड‌िया
उनके इन तीन गुणों के लोग थे कायल संजय गांधी के सहयोगी रहे संजय सिंह अमेठी से एक बार सांसद रह चुके हैं और इस समय राज्यसभा के सांसद हैं। संजय सिंह कहते हैं, 'दो तीन गुण उनके मुझे बहुत अच्छे लगे। एक तो बड़ी साफ़ बात करते थे। स्पष्टवादिता थी। बड़े सौम्य थे। बहुत अच्छा व्यवहार था उनका और एक कोशिश करते थे कि कम से कम बात हो और संदेश ठीक से लोगों की समझ में आ जाए और सबसे बड़ी चीज़ थी कि जब वो स्वयं किसी चीज़ को हां कहते थे, तो उसको करने का पूरा प्रयास करते थे और उसी तरह आशा करते थे कि जो भी कोई बात करे, तो उसे पूरा ज़रूर करे।'
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कमलनाथ के ड्राइंग रूम में संजय की तस्वीर संजय गांधी के साथियों की ये कह कर आलोचना की जा सकती है कि वो सुसंस्कृत और बौद्धिक नहीं थे और शायद उनमें गांभीर्य भी नहीं था, लेकिन उनकी संजय के प्रति निष्ठा में कभी भी कमी नहीं आई, ख़ासतौर से तब जब सारा भारत उनके ख़िलाफ़ हो गया था। कुमकुम चड्ढ़ा बताती हैं, 'कमलनाथ ऐसे शख़्स हैं, जो इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री रहते और संजय की मौत के सालों बाद भी उनकी तस्वीर अपने ड्राइंग रूम में लगाते थे।' वो कहती हैं, "मैंने एक बार उनसे पूछा भी था कि अब उनका देहांत हो चुका है। कोई उनके बारे में बात तक नहीं करना चाहता और आपने उनकी तस्वीर लगा रखी है। उनका जवाब था, इंदिराजी मेरी प्रधानमंत्री हैं, लेकिन संजय मेरे नेता और मेरे दोस्त थे।'
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