कानून की पढ़ाई करने के लिए जम्मू से दिल्ली विश्वविद्यालय आई प्रियदर्शिनी मट्टू को उसके सीनियर संतोष सिंह ने परेशान करना शुरू कर दिया था। पुलिस अधिकारी जेपी सिंह का बेटा होने के नाते संतोष ने बिना डर भय के उसका पीछा करना, अशोभनीय प्रस्ताव रखना और परेशान करना जारी रखा।
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priyadarshini mattoo
कई बार शिकायत किए जाने के बाद प्रियदर्शिनी को पुलिस सुरक्षा दी गई। तृतीय वर्ष में पहुंच चुकी प्रियदर्शिनी अपने चाचा के घर में रहती थी। 23 जनवरी 1996 को संतोष यहां आया। उस समय घर के बाहर पुलिसकर्मी भी मौजूद नहीं थे।
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कैंडल मार्च
- फोटो : अमर उजाला
संतोष ने मौका देखकर प्रियदर्शिनी के साथ बर्बरता से दुष्कर्म किया और फिर बिजली के तार से गला दबाकर हत्या कर दी। उसने 14 बार हेलमेट से वार कर प्रियदर्शिनी का चेहरा भी विकृत कर दिया। इस खबर ने उस समय लोगों को अंदर तक झकझोर कर रख दिया था।
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संतोष सिंह
- फोटो : Social Media
प्रियदर्शिनी के पिता चमन लाल के लिए न्याय पाने का रास्ता आसान नहीं था। पुडुचेरी के आईजी रहे जेपी सिंह (आरोपी संतोष के पिता) निचली अदालत में सुनवाई के दौरान ही दिल्ली पुलिस में ज्वाइंट कमिशनर बन गए। नतीजा यह हुआ कि 1999 में कोर्ट ने संतोष को बरी कर दिया।
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delhi high court
- फोटो : PTI
जज जीपी थरेजा ने लिखा कि - "मैं जानता हूं कि तुमने अपराध किया है... लेकिन साक्ष्यों के अभावों के कारण मैं तुम्हें रिहा करने के लिए बाध्य हूं।" मतलब साफ है कि दिल्ली पुलिस ने साक्ष्य जमा करने में पक्षपात किया। आशंका थी कि ऐसा जेपी सिंह के दबाव में हुआ।
बाद में दिल्ली आईकोर्ट में अपील की गई। यहां छह साल बाद अक्तूबर 2006 में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर संतोष को दोषी मानते हुए फांसी की सजा दी गई। इसके खिलाफ हुई अपील में सुप्रीम कोर्ट ने संतोष को दोषी तो माना, लेकिन उसकी सजा को फांसी के बजाय उम्रकैद में तब्दील करने का आदेश दिया। मार्च 2011 में संतोष पहली बार पेरोल पर बाहर आया। इसके बाद समय-समय पर उसे कई पेरोल मिले। इस वर्ष भी मई में उसे एलएलएम परीक्षा के लिए तीन हफ्ते का पेरोल मिला।