बहुसंख्यक महिलाओं पर पथराव और फिर अल्पसंख्यक युवकों की पिटाई किसी साजिश का हिस्सा तो नहीं है? अटाली में दोबारा भड़की हिंसा से कई सवाल उठ रहे हैं। तकरीबन दो महीने से सांप्रदायिक तनाव का केंद्र बना अटाली गांव पुलिस की लापरवाही के चलते शांत नहीं हो सका है। आखिर क्या है हिंसा की वजह?
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PHOTOS: अटाली हिंसा दोबारा भड़काने के पीछे क्या है साजिश?
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करीब 700 पुलिस वालों की मौजूदगी में शांति और पवित्रता के माह रमजान के दौरान एक बार फिर तनाव साबित करता है कि पुलिस गांव में सिर्फ दिखावे के लिए है। मालूम हो कि धार्मिक स्थल निर्माण का विरोध कर रहे बहुसंख्यकों ने 24 मई की रात अटाली गांव में अल्पसंख्यकों के घरों पर हमला बोल दिया था।
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घटना में अल्पसंख्यकों के कई घर जला दिए गए थे और 15 से ज्यादा पुरुष, महिला व बच्चे जख्मी हुए थे। अल्पसंख्यकों ने सिटी बल्लभगढ़ थाना परिसर में बनाए गए राहत शिविर में दस दिन तक शरण ली थी। इस मामले में अल्पसंख्यकों की ओर से पच्चीस से अधिक लोगों के खिलाफ जानलेवा हमला, आगजनी और बलवा करने की नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई थी।
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इसमें करीब डेढ़ सौ अज्ञात लोगों पर भी मामला दर्ज है। पुलिस आयुक्त सुभाष यादव ने किसी भी कीमत पर आरोपियों की गिरफ्तारी किए जाने का दावा किया था। पुलिस आयुक्त का दावा कितना गंभीर था यह इससे ही साफ होता है कि नामजद आरोपियों के नाम तक गुप्त रखे गए। घटना के सवा माह बीतने के बावजूद पुलिस ने एक भी आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया है।
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घरों में आग लगाने और हथियारों से लोगों पर जानलेवा हमला करने के नामजद आरोपी आज भी गांव में खुलेआम घूम रहे हैं। शांति बहाली का प्रयास कर रहे लोगों का मानना है कि यदि पुलिस इन आरोपियों को गिरफ्तार कर लेती तो गांव का माहौल इतने दिन खराब नहीं होता और शायद आज दोबारा तनाव की नौबत नहीं आती।
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माईनॉरिटीज वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना जमालुद्दीन का कहना है कि अगर पुलिस कानून को कानून की तरह लागू करती तो सात सौ की जगह सात आठ पुलिस वाले ही आरोपियों में खौफ पैदा करने के लिए काफी होते।
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पुलिस पक्षपात कर रही है यदि बवाल के फौरन बाद गिरफ्तारी हो जाती तो में शांति बहाल हो चुकी होती। वहीं दूसरी ओर पुलिस आयुक्त का कहना है कि मामला दर्ज है तो गिरफ्तारी तो होगी ही, भले इसमें थोड़ी देर हो।
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बुधवार को बहुसंख्यक महिलाओं पर पथराव और फिर अल्पसंख्यक युवकों की पिटाई किसी साजिश का हिस्सा तो नहीं है। 24 मई को हुए दंगे में बहुसंख्यक वर्ग के युवकों के खिलाफ नामजद एफआईआर हुई थी।
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जानकारों की मानें तो अब क्रॉस केस बनाने के लिए इस तरह की उकसावे वाली कार्रवाई की जा रही है, ताकि दोनों ओर से बराबर नामजद हों तो समझौते का दबाव बनाया जा सके। मालूम हो कि अटाली बवाल के आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं किए जाने को लेकर वर्ग विशेष के लोगों की कुछ ही दिन पहले पलवल में महापंचायत हुई थी।