16 दिसंबर 2012 से लेकर 15 दिसंबर 2015 तक तीन वर्षों में कुछ बदला है तो सिर्फ मुनिरका का बस स्टॉप। क्योंकि तीन सालों में यहां सिर्फ दो दिन का लाइट, एक्शन और कैमरा होता है। मीडिया के इस जमावड़े के बीच खाकी दो दिन के लिए पहरा देती है, लेकिन क्या राजधानी में महज आईआईटी गेट से लेकर मुनिरका तक बस स्टॉप असुरक्षित हैं? यह सवाल आरके पुरम निवासी व बैंक कर्मी 15 दिसंबर के घटनास्थल पर मनीषा ने उठाया है। (सभी फोटो: विवेक निगम/अमर उजाला, नई दिल्ली)
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निर्भया रेप घटनास्थल लाइव: तीन साल बीते पर नहीं सुधरे हाल
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मुनिरका बस स्टॉप पर रात आठ बजे जब मनीषा से तीन सालों में क्या बदलाव दिखा पूछा तो तपाक से जवाब दिया कि महज दो दिन की सुरक्षा होती है। जबकि 17 दिसंबर से फिर मुनिरका का बस स्टॉप आम बस स्टॉप की तरह अंधेरे में डूब जाएगा। जहां बस मिलती नहीं है और ऑटो चालक या तो चलने को तैयार नहीं होंगे या फिर मनमाना किराया मांग कर परेशान करेंगे। अमर उजाला संवाददाता सीमा शर्मा व फोटोग्राफर विवेक निगम ने बिटिया की बरसी की पूर्व संध्या पर मुनिरका बस स्टॉप से लेकर राजधानी के विभिन्न इलाकों में महिलाओं की सुरक्षा व्यवस्था और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का जायजा लिया तो पाया कि व्यवस्था अभी भी बेहतर नहीं हुई है। पेश है लाइव रिपोर्ट:
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प्रधानमंत्री कार्यालय, सात रेस कोर्स : समय सात बजे बच्चियों की सुरक्षा पर सवाल, नहीं रूकते ऑटो शोक होटल बस स्टाप पर तीन बच्चियां हर आते-जाते ऑटो को देखकर रूकने के लिए हाथ दे रही थीं। करीब आधे घंटे से वे बस स्टॉप पर खड़ी थी।
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नेताजी नगर की रहने वाली योगिता, पायल व परमिता 11 वीं कक्षा में पढ़ती हैं और यहां विलि्ंगडन कैंप में अकाउंट की ट्यूशन पढ़ने आती हैं। बच्चियों ने बताया कि हर दिन बस नहीं मिलती है और ऑटो के लिए परेशान होना पड़ता है।
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मुनिरका बस स्टॉप : खाकी के पहरे में यात्री : समय आठ बजे से तीन सब इंस्पेक्टर, एक महिला सब इंस्पेक्टर, एक एएसआई, दो हेड कांस्टेबल व तीन सिपाही।
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यह खाकी का पहरा मुनिरका बस स्टॉप पर था, जहां से बिटिया ने उस सर्द रात अपने दोस्त के साथ घर जाने के लिए बस ली थी लेकिन परिवार की बजाय न खत्म होने वाले दर्दनाक सफर पर निकल गयी। यहां पुलिस अधिकारी व कर्मी हर आने जाने वाली बस की जांच कर रहे थे और महिला यात्रियों से पूछ रहे थे कि उन्हें कोई दिक्कत तो नहीं है। इसी बीच एक महिला अपने बच्चों संग ऑटो तलाश रही थी, जिसकी महिला अधिकारी ने मदद की।
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हालांकि यहां से गुजर रही महिला यात्री पुलिस से लेकर सरकार तक नाखुश दिखीं। उनका सवाल था कि मुनिरका के अलावा भी राजधानी में हजारों की तादाद में बस स्टॉप हैं, जहां सुरक्षा कर्मी तो दूर स्ट्रीट लाइट तक नहीं होती है। हालांकि दैनिक महिला यात्रियों का दावा है कि मीडिया के जमावडे़ के बीच दो-तीन दिनों तक पुलिस यहां पिछले दो सालों से सक्रिय रहती है, उसके बाद ढूंढे से कोई नहीं मिलता।
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मुनिरका से डीटीसी की रूट की गाड़ी संख्या डीएल व 1पी2 7829 गुजरी। ड्राइवर से पूछा कि महिला सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम हैं तो उसने बताया कि आज सुरक्षा कर्मी नहीं आया है। हालांकि यदि दिक्कत आती है तो फिर वे मोबाइल से सौ नंबर डायल करके पुलिस से ही मदद मांगेंगे।
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सरकार ने निर्भया कांड के बाद पब्लिक ट्रांसपोर्ट को सीसीटीवी में कैद करने की बात कही थी, लेकिन इस घोषणा के साढ़े तीन सालों के बाद महज दो सौ डीटीसी बसों में कैमरे लगे हैं। जबकि करीब डेढ़ हजार बसों में अभी तक जीपीएस नहीं लग पाए हैं।
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राजधानी के 40 फीसदी बस स्टॉप अंधेरे में डूबे नजर आए। महज नई दिल्ली और गैंगरेप वाले स्थल को छोड़कर अन्य में सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं दिखे। हालांकि डीटीसी प्रबंधन बस स्टॉप में उजाला करने के लिए डिम्ट्स तो वह पीडब्लयूडी के अधीन आने की बात कहकर पल्ला झाड़ रहा है।
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आउटर दिल्ली, ग्रामीण इलाके, पूवी दिल्ली, उत्तरी दिल्ली, मध्य दिल्ली, पुरानी दिल्ली, रोहिणी, द्वारका के इलाकों की सबसे अधिक शिकायतें यात्रियों ने डीटीसी हेल्पलाइन पर भेजी थी, जिसका कभी कोई हल नहीं निकला।