बकरा कारोबारी
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सोहना और बादशाहपुर निवासी कुछ कारोबारी सुबह घर में कुछ पैसे देकर वापस आ गए। नूंह, फिरोजपुर झिरका, मेवात वाले दूरी के कारण नहीं गए थे। जो रात में गए भी, वो भी सुबह इस उम्मीद में लौट आए कि शायद खरीदार आ जाएं तो काम बन जाए। इन सभी को परिजनों के साथ त्योहार नहीं मनाने का अफसोस भी था। बच्चों की याद भी आ रही थी।
आखिरी जुगाड़ में जब बचे कुए कुछ जानवर काट कर बेचे गए तो उमस में सड़ने के डर से मीट का रेट अचानक कम हो गया, क्योंकि फुटकर दुकानदार पहले से ही अपना माल खपाने में लगे थे। जी हां.. कुछ ऐसी ही गुजरी बकरा विक्रेताओं की बकरीद। मायूस कारोबारी बोले.. दशकों में ऐसा कभी नहीं हुआ था।