गाजियाबाद निवासी हरीश राणा को अंतिम विदाई में आशीष देने वाली ब्रह्माकुमारी बीके लवली दीदी से अमर उजाला ने खास बातचीत की। इस दौरान लवली दीदी ने कहा कि तकलीफ शरीर को होती है आत्मा को नहीं।
गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन की राज अंपायर सोसायटी निवासी हरीश राणा के अंतिम सफर को पीड़ारहित बनाने का आशीष देने वाली ब्रह्माकुमारी बीके लवली दीदी का कहना है कि आत्मा और शरीर अलग-अलग बातें हैं। तकलीफ शरीर को होती है आत्मा को नहीं। शरीर गाड़ी है और आत्मा ड्राइवर। गाड़ी जब पुरानी होती है तब कहा जाता है कि इसे छोड़ो और इससे बाहर आ जाओ।
लवली दीदी ने यह बातें सोमवार को अमर उजाला से बातचीत में कहीं। वह एक दिन पहले हरीश को... सबको माफ करते, सबसे माफी मांगते हुए सो जाने का संदेश देकर चर्चा में हैं।
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लवली दीदी से खास बातचीत
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
उन्होंने बताया कि करीब 18 वर्षों से हरीश राणा का परिवार ब्रह्माकुमारीज से जुड़ा है। पांच वर्ष पहले यह परिवार दिल्ली से राजनगर एक्सटेंशन शिफ्ट हुआ था। इससे पहले 13 वर्षों तक दिल्ली स्थित बीके केंद्र से जुड़ा रहा।
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हरीश राणा की फाइल फोटो
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
हरीश के पिता कई बार ब्रह्माकुमारीज के प्रमुख केंद्र माउंट आबू भी जाते रहे हैं। हर रोज करीब एक घंटे तक बेटे की शांति और कुशलता के लिए मेडिटेशन करते थे। उनके अनुसार मैं समझ सकती हूं कि माता-पिता ने बेटे के लिए इच्छामृत्यु मांगने का निर्णय बहुत कठोर मन से लिया होगा।
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बेटे हरीश के साथ मां
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
बेटे की पीड़ा देख मां ने मांगी थी मुक्ति
लवली दीदी ने बताया कि हरीश की मां निर्मला देवी 13 वर्षों तक अपने बेटे की पीड़ा देख दो साल पहले ही लड़ाई से हार गई थीं। उसे पल-पल तड़पता देख उन्होंने पहली बार ब्रह्मकुमारी केंद्र में आकर उसकी मुक्ति के लिए इच्छामृत्यु का विचार रखा था। इस बारे में बात करते हुए उनकी आंखों से आंसू छलक रहे थे। उन्होंने कहा था कि '... बस अब बहुत हो चुका... बेटे को इतने दुख में नहीं देख सकती। उसका शरीर अब बहुत पीड़ा में है और उसे मुक्ति दिला दीजिए।'
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बेटे हरीश के साथ माता-पिता
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
लवली दीदी ने कहा कि जब मां ने यह बात कही तो उन्होंने उन्हें ढांढस बंधाते हुए कहा कि शरीर को कष्ट हो सकता है, आत्मा को नहीं। इसलिए उन्होंने हरीश के लिए जो सोचा है वह काफी बेहतर है। इसके बाद इच्छा मृत्यु के लिए विशेषज्ञों से बातचीत की और प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया।
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हरीश राणा की फाइल फोटो
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
आर्किटेक्ट थीं, 29 वर्ष से साधना
बीके लवली दीदी करीब 29 वर्षों से ब्रह्माकुमारीज से जुड़ी हैं। वह प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय के राजनगर एक्सटेंशन व मोहननगर केंद्र की प्रभारी हैं। उन्होंने बताया कि वह बचपन से ही माता-पिता के साथ ब्रह्माकुमारी केंद्रों पर आती रहीं। वहां पर एक अलग तरह की शांति का अहसास हुआ।
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बेटे हरीश के साथ पिता
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
पढ़ाई-लिखाई कर इंजीनियर बनीं और आर्किटेक्ट के तौर पर नौकरी भी की। 21 वर्ष की आयु में उन्हें ब्रह्माकुमारी केंद्रों में बतौर आर्किटेक्ट सेवा का मौका मिला। बाद में उन्होंने संस्था से पूरी तरह जुड़ जाने का फैसला लिया। पिता से जब इसकी अनुमति मांगी तो उन्होंने भी बिना देर किए रजामंदी दे दी।
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Harish Rana Case
- फोटो : वीडियो ग्रैब
सबको माफ करते हुए और सबसे माफी मांगते हुए सो जाओ...
सबको माफ करते हुए और सबसे माफी मांगते हुए सो जाओ...ठीक है..। यह शब्द साहिबाबाद स्थित मोहन नगर में संचालित ब्रह्मकुमारी केंद्र के प्रभु मिलन भवन की प्रभारी लवली दीदी ने कोमा में चल रहे हरीश से कहते हुए अंतिम विदाई थी।
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हरीश राणा के पिता
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
सुप्रीम कोर्ट से इच्छा मृत्यु की स्वीकृति के बाद 13 मार्च को बीके लवली दीदी राजनगर एक्सटेंशन की राज अंपायर सोसायटी स्थित हरीश के घर पहुंची थीं। यहां उन्होंने हरीश को अंतिम विदाई दी।
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हरीश राणा का फ्लैट
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
13 वर्षों से जिंदगी की उम्मीद में दुख झेल रहे हरीश को इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया के लिए एम्स ले जाने से पहले बीके लवली दीदी उनके घर पहुंचीं। यहां उन्होंने सबसे पहले हरीश के माथे पर चंदन का तिलक लगाया। इसके बाद जीवन की डोर छूटने के इन अंतिम पलों में आत्मशांति के लिए मेडिटेशन किया।
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Harish Rana Case
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
अंतिम विदाई में उन्होंने हरीश से कहा कि सबको माफ करते हुए व सभी से माफी मांगते हुए जीवन की अंतिम यात्रा पूरी करो। बीके लवली दीदी ने बताया कि हरीश का परिवार पिछले कई वर्षों से ब्रह्मकुमारी केंद्र से जुड़ा है।
बीमारी के दौरान भी वह हरीश से मिलने जाती रहती थीं। इच्छा मृत्यु का पता चलने के बाद वह अंतिम बार उनसे मिलकर विदाई देने गई थीं। इस दौरान उन्होंने हरीश के माता-पिता को भी ढांढस बंधाया।