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इच्छा मृत्यु: कौन है हरीश को अंतिम विदाई देने वालीं लवली दीदी? क्यों बोलीं- उनकी आत्मा को नहीं शरीर को तकलीफ

Mon, 16 Mar 2026 10:41 PM IST
विकास कुमार समीर बिसारिया, अमर उजाला, गाजियाबाद

सार

एम्स के डॉ. बीआर आंबेडकर इंस्टीट्यूट रोटरी कैंसर अस्पताल (आईआरसीएच) के पैलिएटिव केयर यूनिट में शनिवार को भर्ती हुए हरीश राणा की निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) प्रक्रिया शुरू हो गई है। अस्पताल के विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम उनकी स्थिति की निगरानी करते हुए चरणबद्ध तरीके से जीवनरक्षक उपकरणों को हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है।
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हरीश को आखिरी विदाई देने वालीं लवली दीदी - फोटो : अमर उजाला
सुप्रीम कोर्ट से स्वीकृति मिलने के बाद इच्छा मृत्यु पाने वाले हरीश राणा को अंतिम विदाई देने से चर्चा में आईं बीके लवली दीदी प्रजापति ब्रह्माकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय के राजनगर एक्सटेंशन व साहिबाबाद के मोहन नगर स्थित केंद्र की प्रभारी हैं। हरीश को अंतिम विदाई देते समय उन्होंने कहा कि तुम एक पंछी हो लेकिन अभी दुख व पीढ़ा के एक पिंजड़े में कैद हो। इस पिंजड़े से अब तुम्हारे उड़ने का समय आ गया है। अमर उजाला से हुई खास बातचीत में उन्होंने हरीश और उनके परिवार के ब्रह्माकुमारी से जुड़े होने के बारे में भी कई बातें साझा कीं। 
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Harish Rana Case - फोटो : वीडियो ग्रैब
मां ने दो वर्ष पहले ही रखा था इच्छा मृत्यु का विचार
बीके लवली दीदी ने बताया कि करीब 18 वर्षों से हरीश राणा का परिवार ब्रह्माकुमारीज से जुड़ा था। पांच वर्ष पहले पूरा परिवार दिल्ली से राजनगर एक्सटेंशन शिफ्ट हुआ था। इससे पहले वह करीब 13 वर्षों तक परिवार दिल्ली स्थित बीके केंद्र से जुड़ा रहा। बताया कि 13 वर्षों तक हरीश की पीढ़ा जब उनकी मां निर्मला की सहनशीलता से बाहर हो गया, तब जाकर करीब दो-तीन वर्ष पहले उन्होंने बीके केंद्र में आकर इच्छा मृत्यु का विचार रखा था। यह बात कहते हुए छलकते आंसू और रुंधते गले से बेटे कहा कि बस बहुत हो चुका...बेटे को इतने दुख में नहीं देखा जा रहा। उसका शरीर अब बहुत पीढ़ा में है, बस उसे मुक्ति दिला दो। इसके बाद इच्छा मृत्यु के लिए विशेषज्ञों से बातचीत की और प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया।

 
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लवली दीदी - फोटो : अमर उजाला
तकलीफ शरीर को आत्मा को नहीं
बीके लवली दीदी ने बताया कि आत्मा और शरीर दोनों अलग-अलग बातें हैं। शरीर गाड़ी है और आत्मा ड्राइवर। जब गाड़ी पुरानी होती है या काम नहीं देती तब यह कहा जाता है कि इस गाड़ी को अब छोड़ो और इससे बाहर आ जाओ। इसलिए मैं यह समझती हूं कि हरीश के माता-पिता का यह निर्णय और याचिका दायर करने का फैसला बहुत अंत में उनके मन में आया। बहुत प्यार से उन्होंने बेटे की पालना की। हमेशा बेटे से बातें कीं, ठीक एक छोटे बच्चे की तरह। मां ने बहुत वेदना से इस इच्छा मृत्यु की संकल्पना ली।  
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बेटे हरीश के साथ माता-पिता - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
21 वर्ष की आयु से बह्माकुमारीज से जुड़ीं बीके लवली दीदी
बीके लवली दीदी ने बातचीत में बताया कि वह अपने बचपन से ही माता-पिता के साथ ब्रह्माकुमारी केंद्रों पर आती रहीं। तभी से एक अलग तरह की शांति का अहसास उन्हें हुआ। पढ़ाई लिखाई कर इंजीनियर बनीं और आर्केटेक्ट बतौर नौकरी भी की। 21 वर्ष की आयु में उन्हें ब्रह्माकुमारी केंद्रों में अलग-अलग स्थानों पर अर्केटेक्ट बतौर सेवा का मौका मिला। पिता से जब इसकी अनुमति मांगी तब उन्होंने भी बिना देर लगाए हामी भर दी। तभी से वह ब्रह्माकुमारीज से जुड़कर आध्यात्म का जीवन बिता रही हैं।

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