बबीता नागर रक्षाबंधन के त्योहार पर राखी बांधती नहीं, बल्कि बहनों से राखी बंधवाती हैं। वे अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित नहीं हैं, बल्कि बहनों और भाइयों की रक्षा करती हैं। उन्हें याद नहीं कि कब उन्होंने अपने भाइयों को राखी बांधी हो। सादुल्लापुर गांव में एक साधारण परिवार में जन्मी 30 वर्षीय बबीता पांच-सात वर्ष की उम्र में ही खेलकूद में भाग लेना शुरू कर दिया था। कक्षा पांच में आने पर खिलाड़ियों में नाम होने लगा था। उस शौक को अपना करियर बना लिया।
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बबीता नागर
- फोटो : लाल सिंह
शुरू में परिवार के लोग लड़कियों के कपड़े लाते थे तो बबीता कहती हैं कि वे लड़कियों के कपड़े मन मारकर पहनती थी। जब कक्षा आठ में पहुंची तो कुश्ती में स्टेट चैंपियनशिप बन गई। इसके बाद लड़कियों के कपड़े पहनने बंद कर दिए। बचपन में परिवार के लोग इसेनटखट बच्ची की हट मानकर उसे राखी बांध देते थे, लेकिन जैसे-जैसे बड़ी हुई तो खेलों में अपना नाम रोशन कर दिया। इसके बाद वे दिल्ली पुलिस में बतौर सब इंस्पेक्टर तैनात हो गई।
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बबीता नागर
- फोटो : लाल सिंह
इस बीच खेलों की प्रति रुझान बढ़ता ही गया। बबीता की मानें तो वह अपने आप को लड़कों से कम नहीं मानती। भाई अपनी बहनों से राखी बंधवाते हैं और उनकी रक्षा का वादा करते हैं। मगर वह स्वयं अपनी रक्षा कर सकती है तो इसी कारण राखी नहीं बांधती है। वहीं उसके बडे़ भाई आजाद नागर और योगेश नागर कुछ साल तक तो राखी बंधवाने की जिद करते थे लेकिन जब पहलवान बन गई तो वे अपनी बड़ी बहन देवी और संतोष से ही राखी बंधवा लेते हैं। हालांकि, बबीता अपनी दोनों बहनों से हर रक्षाबंधन पर राखी बंधवाती हैं। क्योंकि वह उनकी सुरक्षा कर सकती है।
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बबीता नागर
- फोटो : लाल सिंह
70 से अधिक लड़कियों को दिलाई नौकरी
बबीता ने एक प्रशिक्षण केंद्र खोल रखा है और उसके माध्यम से ग्रामीण क्षेत्र की लड़कियों को ट्रेनिंग देकर उनको सुरक्षा का हुनर सिखाती हैं। साथ ही पुलिस में भर्ती होने के लिए ट्रेनिंग भी देती हैं। उनके गांव सादुल्लापुर और आसपास की बेटियां ही नहीं बल्कि बहू भी दिल्ली पुलिस में तैनात हैं। इनकी संख्या 70 को भी पार कर गई है।
प्रशिक्षण केंद्र पर मनाती है रक्षाबंधन
रक्षाबंधन के त्योहार पर वह अपने ट्रेनिंग सेंटर पर सभी लड़कियों और लड़कों को बुलाती हैं। उस दिन वह हरेक लड़के को प्रशिक्षण पा रही हर लड़की से राखी बंधवाती हैं। इससे उनमें बहनों के प्रति रक्षा करने का जज्बा पैदा होता है। एक-एक लड़के के हाथ पर 50 से 60 राखियां तक हो जाती हैं।