महक उठती धरा स्पर्श से, छू लेते गगन जो चाह ले, लड़खड़ाते कदम गर बढ़ गए, समंदर भी इनको राह दे, विकलांग नहीं दिव्यांग है ये प्रसिद्ध शायर की यह चंद लाइन अजरानंद अंध विद्यालय के इन छात्रों पर सटीक बैठती है। जिनकी अंगुलियों के इशारे पर हारमोनियम, तबला, गिटार बजते हैं और कंप्यूटर का की बोर्ड चलता है।
चुनौतियां कितनी भी हों, मगर जुनून और हौसला है तो नामुमकिन कुछ भी नहीं है। इसका बेमिसाल उदाहरण हैं दिव्यांग प्रतिभाएं, जिन्होंने शारीरिक कष्ट व आर्थिक तंगी के सामने हार नहीं मानी। उन्होंने हर मुश्किल हालात का सामना करते हुए खुद को साबित किया।
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आज ये प्रतिभाएं किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। दिव्यांग दिवस पर अजरानंद अंध विद्यालय में पढ़ाई कर रहे इन बच्चों से आज आपका परिचय कराते हैं। विद्यालय में छात्रों के लिए अलग-अलग कक्ष बने हुए हैं।
इसके साथ ही छात्र यहां पर कंप्यूटर की शिक्षा भी ग्रहण करते हैं। कंप्यूटर में टोकन सॉफ्टवेयर यूएसए से आया है। जिससे छात्रों को कंप्यूटर क्लास लेने में दिक्कत नहीं होती है। वहीं ब्रेल प्रेस स्वीडन से लाकर लगाई गई है।