उत्तर प्रदेश से अलग होकर खुशहाली का सपना देखने वाले उत्तराखंड के पहाड़ आज भी कड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों से जूझ रहे हैं। दावों और वादों की चकाचौंध के बीच हकीकत यह है कि दुर्गम क्षेत्रों में गर्भवती महिलाएं हों या बीमारी की चपेट में आया कोई व्यक्ति, उसे नजदीकी अस्पताल से पर्याप्त सुविधाओं वाले जिला अस्पताल या मेडिकल कॉलेज तक पहुंचने में दो दिन से भी अधिक समय लग जाता है।
मजबूरी में महिलाओं के प्रसव घर की दहलीज के अंदर ही हो रहे हैं। जिस पौड़ी ने देश को प्रथम सीडीएस, केंद्रीय मंत्री और उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड को कई मुख्यमंत्री दिए आज वही जिला बुनियादी इलाज के लिए तड़प रहा है।
विडंबना ये है कि गैरसैंण के जिस सारकोट गांव को खुद मुख्यमंत्री ने संवारने के लिए गोद लिया, वहां की तस्वीर भी नहीं बदली। कमोबेश रुद्रप्रयाग, टिहरी, उत्तरकाशी में भी यही स्थिति है। पहाड़ में सिस्टम की संवेदनहीनता की सबसे डरावनी कहानी पर पेश है स्वास्थ्य संवाददाता अंकित यादव की विस्तृत ग्राउंड रिपोर्ट ...