देश-दुनिया से आने वाले पर्यटकों को बर्फ की चादर ओढ़े पहाड़ भले ही रोमांच का अहसास करवाते हों लेकिन यहां रहने वाले स्थानीय लोगों, आईटीबीपी और आपदा प्रबंधन के जवानों की आंखों की रोशनी को धीरे-धीरे अंधकार में धकेल रही है। नेत्र रोग विशेषज्ञ इसे स्नो-ब्लाइंडनेस की संज्ञा देते हैं। उत्तरकाशी, चमोली, पौड़ी और टिहरी समेत कई बर्फीले इलाकों से आंखों की परेशानी से जूझ रहे बड़ी संख्या में मरीज सामने आ रहे हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक बर्फीले इलाकों में जैसे-जैसे धूप तीव्र होती है, पराबैंगनी किरणों का प्रभाव और अधिक तेज हो जाता है। इसके सीधे संपर्क में आने से रेटिना की भीतरी परतों को क्षति पहुंचती है और अंदर ही अंदर रक्तस्राव शुरू हो जाता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे ‘रेटिनल हेमरेज’ कहते हैं। इस तरह के मामले वर्षभर सामने आते हैं। स्वास्थ्य संवाददाता अंकित यादव ने कई बर्फीले इलाकों का दौरा किया। इस दौरान स्नो ब्लाइंडनेस की चपेट में आए कई मरीजों ने अपनी पीड़ा बयां की। पेश है विस्तृत ग्राउंड रिपोर्ट...