उत्तराखंड सरकार रामायण और पुराण का अध्ययन कर आयुष विभाग की मदद से संजीवनी बूटी की तलाश में जुटी है। प्रदेश के चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं आयुष मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी ने कहा कि हमारा लक्ष्य संजीवनी बूटी को तलाशने का है। वेदों में भी यह वर्णन किया गया है कि चमोली जनपद के द्रोणगिरी पर्वत पर संजीवनी बूटी है।
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द्रोणगिरि पर्वत का जिक्र रामायण में संजीवनी बूटी के संदर्भ में तब आता है जब घायल लक्ष्मण को मूर्छा से जगाने के लिए हनुमान जी पूरा पर्वत उखाड़ लाये थे।
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हनुमान जी ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह संजीवनी बूटी पहचान नहीं पा रहे थे और बूटी शीघ्र ही लक्ष्मण तक पहुंचना आवश्यक थी। इसलिए वह पर्वत ही उखाड़कर लेते गये थे।
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सुरेंद्र सिंह नेगी।
- फोटो : अमर उजाला
कैबिनेट मंत्री नेगी विधानसभा स्थित अपने कार्यालय में आयुर्वेद निदेशालय (आयुष) के अधिकारियों, संजीवनी शोध संस्थान के अध्यक्ष, सदस्यों के साथ बैठक में संजीवनी बूटी की तलाश तेज करने को कहा। उन्होंने कहा कि विभाग संजीवनी परिवार की अज्ञात वनौषधियों की पहचान, परिचय, स्थान, द्रव्यों आदि का संग्रहण कर हर्बेरियम तैयार करे।
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इसके अलावा संजीवनी को लेकर रामायण, पुराण आदि में वर्णित संदर्भ स्थलों की जानकारी ले। आयुष निदेशक डॉ. एके त्रिपाठी को इसका ब्ल्यू प्रिंट तैयार करने का निर्देश देते हुए उन्होंने कहा कि विलुप्त हो रहे औषधीय पौधों को खोज कर संरक्षित किया जाए।
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सुरेंद्र सिंह नेगी
- फोटो : amarujala
उन्होंने यह भी कहा कि जड़ी-बूटियों के क्षेत्र में जो लोग और संस्थाएं कार्य कर रही हैं, उनको बुलाकर बृहद सम्मेलन कराया जाए। नेगी ने कहा कि हमारे प्रदेश की 65 फीसदी भूमि पर वन हैं जिनमें अनेक दुर्लभ औषधीय पौधे मौजूद हैं।
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कहा अधिकारी इनको लेकर मिशन के रूप में काम करें। इससे प्रदेश की कई समस्याओं का समाधान होगा। प्रदेश में उद्योगों की स्थापना होगी, लोगों को रोजगार मिलेगा। यहां बढ़ रहे पलायन को रोकने में मदद मिलेगी।
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गौरतलब है कि रामायण और पुराणों में उत्तराखंड में संजीवनी बूटी का जिक्र है। उत्तराखंड के चमोली स्थित द्रोणागिरि गांव के पास स्थित पर्वत को रामायण में वर्णित द्रोणागिरि पर्वत के नाम से जाना जाता है।
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कहा गया है कि जब लक्ष्मण मूर्छित हुए थे तो हनुमान जी संजीवी बूटी ले जाने के लिए द्रोणागिरी पर्वत उखाड़कर ले गये थे।
यही वजह है कि पूरे विश्व में हिंदुओं के आराध्य देव हनुमान की द्रोणागिरि गांव में पूजा नहीं होती है। गांव वाले आज भी हनुमान जी के पर्वत उखाड़कर ले जाने से नाराज हैं।