शनिवार की दोपहर तक लोक गायक पप्पू कार्की की मौत की खबर पूरे उत्तराखंड में आग की तरह फैल गई थी। जिसने भी यह खबर सुनी उसका दिल भर आया।
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Pappu Karki Wife
वक्त ने ऐसी करवट बदली कि एक पल में सब कुछ बिखर गया। पप्पू कार्की के लालसिंह कालोनी (बिठौरिया) के घर में जहां गीतों के स्वर सजते थे, वहां पर सिसकियां और नम आंखें हर तरफ थीं। (पप्पू कार्की की बीवी)
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Pappu Karki death
पप्पू के साथ लंबे समय से गायकी कर रही दीपा नगरकोटी कहती हैं कि आखिरी बार मई में ही एमबी पीजी कालेज हल्द्वानी में आयोजित कार्यक्रम में शामिल हुई थी। पप्पू कार्की की आवाज और यादें हमारे दिल में रहेंगी। लेकिन, पप्पू जैसा गायक शायद ही कोई अब हो। शांति तिवारी कहती हैं कि उनके बेटे लोकेश तिवारी ने पप्पू कार्की की शागिर्दी में ही आगे बढ़ा है। उसकी कमी हमेशा बनी रहेगी।
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Pappu Karki Son
.. आप मेरे पापा का जानते हैं? वह सिंगर हैं उनका नाम पप्पू कार्की है। हम जैसे ही पप्पू कार्की के लाल सिंह कालोनी के मकान में कदम रखते हैं, तो घर के बाहर बैठा सात साल का दक्ष कार्की तपाक से गर्व से भरा सवाल करता है? नन्हा दक्ष इस बात से बिल्कुल अनजान है कि उसकी दुनिया बदल गई है, पापा अब कभी नहीं आएंगे। दक्ष बताता है कि वह यूनिवर्सल स्कूल में कक्षा दो में पढ़ता है, उसके पापा बड़े सिंगर हैं। .. वह मोबाइल में यू-ट्यूब पर पप्पू कार्की के गीतों के वीडियो भी दिखाता है। पापा का कौन सा गीत सबसे ज्यादा पसंद है? इस सवाल पर सीधा जवाब आता है। पहले नंबर मधुली.... सबसे ज्यादा पसंद है। इसके बाद डीडीहाट की छमना छोरी... और तीसरे नंबर पर ऐजा रे चैत बैशाख मेरो मुनस्यारा पसंद है। क्या तुम गाना सीख रहे हो? तुम भी सिंगर बनोगे। इस सवाल के जवाब के साथ वह फिर मोहक मुस्कान के साथ बताता है अभी तो डांस सीखने जा रहा हूं... उसके बाद अपनी दुनिया में खो जाता है। यही बचपन है ... उसे अहसास भी नहीं है कि एक क्रूर पल ने उसके सिंगर पिता को उससे हमेशा के लिए दूर कर दिया है।
पप्पू कार्की के चाचा हनुमान कार्की और चाची देवकी देवी सेलावन गांव से किसी काम के लिए प्रेमनगर आए थे। पप्पू की मां कमला देवी चार दिन पहले अपने पोते का जन्मदिन मनाकर हल्द्वानी से गांव लौटी थीं। पूरे इलाके में आग की तरह फैली इस खबर को उसकी मां को बताने का साहस कोई नहीं कर पाया। बाद में पप्पू की चाची और अन्य ग्रामीणों से अपने कलेजे के टुकड़े की मौत की जानकारी मिलने पर वह बेसुध हो गईं। होश में आने पर वह बार-बार प्रमेंद्र को याद कर दहाड़ें मारकर रोने लगतीं। ग्रामीण उन्हें ढाढ़स बंधाने का प्रयास कर रहे थे।